अल-मोमिनुन · 46/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَالِينَ ۝٤٦
Ilaa Fir`awna wa mala`ihee fastakbaroo wa kaanoo qawman `aaleem
📖 हिंदी अर्थ
तो उन लोगो ने शेख़ी की और वह थे ही बड़े सरकश लोग

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فِرْعَوْنَ (फ़िरऔन): मिस्र का शासक, जो अत्याचार और घमंड में अपनी हद पार कर चुका था।
  • مَلَئِهِ (मलइही): उसके दरबार के बड़े-बड़े सरदार, रईस और सलाहकार, जो उसके अत्याचारों में साथ देते थे।
  • فَاسْتَكْبَرُوا (फ़स्तक्बरू): उन्होंने घमंड किया और सच्चाई को मानने से इनकार कर दिया।
  • عَالِينَ (आलीन): सरकश, अत्याचारी और दूसरों पर ज़ुल्म करने वाले, जो लोगों को अपने से नीचा समझते थे।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपने दो महान पैग़म्बरों — हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनके भाई हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) — को नौ स्पष्ट चमत्कारों (मोजिज़ों) के साथ भेजा। ये चमत्कार इतने सशक्त और स्पष्ट थे कि किसी भी सच्चे दिल वाले इंसान के लिए उन्हें झुठलाना नामुमकिन था। इन्हीं निशानियों के साथ उन्हें फ़िरऔन और उसके दरबार के सरदारों की ओर भेजा गया, ताकि वे उन्हें सच्चाई की राह दिखाएँ और अल्लाह की इबादत की ओर बुलाएँ।

लेकिन फ़िरऔन और उसके सरदारों ने घमंड और अहंकार में आकर इन स्पष्ट चमत्कारों को देखने के बावजूद ईमान लाने से इनकार कर दिया। वे सच्चाई के सामने झुकना नहीं चाहते थे, क्योंकि उनके दिलों में दुनिया की बड़ाई और सत्ता का नशा भरा हुआ था। वे ऐसे लोग थे जो हमेशा दूसरों पर ज़ुल्म करते थे, लोगों को अपने से नीचा समझते थे, और अपनी ताकत और ऐशो-आराम के कारण खुद को बड़ा और दूसरों को छोटा मानते थे।

यह आयत हमें सिखाती है कि घमंड और अहंकार इंसान को सच्चाई से दूर कर देता है। जब इंसान के दिल में घमंड आ जाता है, तो वह साफ-साफ सच्चाई देखकर भी उसे नहीं मानता, क्योंकि उसे अपनी बड़ाई खोने का डर होता है। अल्लाह तआला ने इस क़िस्से से हमें सबक़ दिया है कि हमें हमेशा विनम्र (नम्र) रहना चाहिए, क्योंकि अल्लाह घमंडियों को पसंद नहीं करता। फ़िरऔन जैसे ताकतवर शासक को भी अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से नीचा दिखाया और उसे डुबो दिया। यह हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम कभी भी अपनी ताकत, धन, या ओहदे पर घमंड न करें, बल्कि हमेशा अल्लाह के आगे झुकें और उसकी राह पर चलें। अल्लाह तआला उन्हीं को कामयाबी देता है जो उसके सामने अपने आप को छोटा बनाते हैं और उसकी इबादत में विनम्रता दिखाते हैं।



📜 आयत 44-48 — अल-मोमिनुन

44ثُمَّ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَىٰ ۖ كُلَّ مَا جَاءَ أُمَّةً رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُ ۚ فَأَتْبَعْنَا بَعْضَهُم بَعْضًا وَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ ۚ فَبُعْدًا لِّقَوْمٍ لَّا يُؤْمِنُونَ
फिर हमने लगातार बहुत से पैग़म्बर भेजे (मगर) जब जब किसी उम्मत का पैग़म्बर उन के पास आता तो ये लोग उसको झुठलाते थे तो हम थी (आगे पीछे) एक को दूसरे के बाद (हलाक) करते गए और हमने उन्हें (नेस्त व नाबूद करके) अफसाना बना दिया तो ईमान न लाने वालो पर ख़ुदा की लानत है
45ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَارُونَ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
फिर हमने मूसा और उनके भाई हारुन को अपनी निशानियों और वाज़ेए व रौशन दलील के साथ फिरऔन और उसके दरबार के उमराओ के पास रसूल बना कर भेजा
46إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَالِينَ
तो उन लोगो ने शेख़ी की और वह थे ही बड़े सरकश लोग
47فَقَالُوا أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَ
आपस मे कहने लगे क्या हम अपने ही ऐसे दो आदमियों पर ईमान ले आएँ हालाँकि इन दोनों की (क़ौम की) क़ौम हमारी ख़िदमत गारी करती है
48فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَكِينَ
गरज़ उन लोगों ने इन दोनों को झुठलाया तो आख़िर ये सब के सब हलाक कर डाले गए
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 46

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Tuesday, August 18, 2026

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