अल-मोमिनुन · 47/118
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मोमिनुन
فَقَالُوا أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَ ۝٤٧
Faqaaloo annu`minu libasharaini mislinaa wa qawmuhumaa lanaa `aabidoon
📖 हिंदी अर्थ
आपस मे कहने लगे क्या हम अपने ही ऐसे दो आदमियों पर ईमान ले आएँ हालाँकि इन दोनों की (क़ौम की) क़ौम हमारी ख़िदमत गारी करती है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا: हमारे जैसे दो इंसानों पर (विशेष रूप से मूसा और हारून अलैहिस्सलाम पर)
  • وَقَوْمُهُمَا: उन दोनों की क़ौम (बनी इसराईल)
  • لَنَا عَابِدُونَ: हमारे लिए आज्ञाकारी, विनम्र और सेवकों की तरह झुके हुए

तफ़सीर:

यह आयत फ़िरऔन और उसकी क़ौम के उस घमंड भरे रवैये को बयान करती है जब अल्लाह ने हज़रत मूसा और हारून अलैहिस्सलाम को उनके पास पैग़म्बर बनाकर भेजा। फ़िरऔन और उसके सरदारों ने अहंकार और घमंड के साथ कहा: "क्या हम अपने जैसे दो इंसानों पर ईमान लाएँ? ये तो हमारी ही तरह इंसान हैं, इनमें कोई ऐसी ख़ास बात नहीं जो इन्हें हमसे बेहतर बनाए। और देखो, इनकी क़ौम (बनी इसराईल) तो हमारी ग़ुलाम हैं, हमारे आगे झुकी हुई हैं, हमारी आज्ञा मानती हैं। फिर ये कैसे हमारे पैग़म्बर बन सकते हैं?"

यह वही घमंड और अहंकार है जो हर ज़माने में सच्चाई को क़बूल करने से रोकता है। फ़िरऔनियों ने यह भूल दिखाई कि पैग़म्बरी का सम्बन्ध ख़ून, माल या दुनियावी रुतबे से नहीं, बल्कि अल्लाह की पसन्द और चुनाव से है। अल्लाह जिसे चाहता है, अपना पैग़म्बर बनाकर भेजता है, चाहे वह ग़रीब हो या अमीर, चाहे उसकी क़ौम कमज़ोर हो या ताक़तवर।

इस आयत से हमें सबक़ मिलता है कि हमें कभी भी लोगों को उनके दुनियावी रुतबे, जाति, रंग या माल की बिना पर नहीं आँकना चाहिए। सच्चाई की कसौटी यह नहीं है कि कहने वाला कौन है, बल्कि यह है कि वह क्या कह रहा है। अल्लाह के दीन की दावत को क़बूल करने में यह देखना कि दावत देने वाला हमारे बराबर का है या हमसे बड़ा है, शैतानी चाल है। हमें चाहिए कि हक़ को हक़ समझकर क़बूल करें, चाहे वह किसी भी इंसान के ज़रिये हम तक पहुँचे।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की राह में आने वाली रुकावटों में सबसे बड़ी रुकावट घमंड है। घमंड इंसान को अंधा बना देता है और वह साफ़ सच्चाई को भी नहीं देख पाता। अल्लाह हमें घमंड से बचाए और हमारे दिलों में विनम्रता पैदा करे, ताकि हम हक़ को क़बूल करने में देर न करें। आमीन।



📜 आयत 45-49 — सूरा अल-मोमिनुन

45ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَارُونَ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
फिर हमने मूसा और उनके भाई हारुन को अपनी निशानियों और वाज़ेए व रौशन दलील के साथ फिरऔन और उसके दरबार के उमराओ के पास रसूल बना कर भेजा
46إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا عَالِينَ
तो उन लोगो ने शेख़ी की और वह थे ही बड़े सरकश लोग
47فَقَالُوا أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَابِدُونَ
आपस मे कहने लगे क्या हम अपने ही ऐसे दो आदमियों पर ईमान ले आएँ हालाँकि इन दोनों की (क़ौम की) क़ौम हमारी ख़िदमत गारी करती है
48فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا مِنَ الْمُهْلَكِينَ
गरज़ उन लोगों ने इन दोनों को झुठलाया तो आख़िर ये सब के सब हलाक कर डाले गए
49وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
और हमने मूसा को किताब (तौरैत) इसलिए अता की थी कि ये लोग हिदायत पाएँ
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीअवतरण स्थान
47आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 47

सूरा अल-मोमिनुन आयत 47 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : आपस मे कहने लगे क्या हम अपने ही ऐसे दो…

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Thursday, October 1, 2026

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