अल-मोमिनुन · 62/118
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मोमिनुन
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنطِقُ بِالْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ ۝٦٢
Wa laa nukallifu nafsan illaa wus`ahaa wa ladainaa kitaabuny yantiqu bilhaqqi w ahum la yuzlamoon
📖 हिंदी अर्थ
और हम तो किसी शख्स को उसकी क़ूवत से बढ़के तकलीफ देते ही नहीं और हमारे पास तो (लोगों के आमाल की) किताब है जो बिल्कुल ठीक (हाल बताती है) और उन लोगों की (ज़र्रा बराबर) हक़ तलफी नहीं की जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وُسْعَهَا: उसकी क्षमता, ताकत और सामर्थ्य के अनुसार।
  • كِتَابٌ يَنطِقُ بِالْحَقِّ: वह लेखा-पुस्तक (अमलनामा) जो सच बोलता है, यानी उसमें दर्ज हर बात सत्य होती है।
  • لَا يُظْلَمُونَ: उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा, न उनके अच्छे कर्म कम किए जाएँगे और न बुरे कर्म बढ़ाए जाएँगे।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों पर असीम रहमत और इंसाफ़ का मालिक है। वह किसी भी व्यक्ति पर वह बोझ नहीं डालता जो उसकी ताकत से बाहर हो। यह अल्लाह का पूरा न्याय और कृपा है कि उसने हर इंसान को उसकी क्षमता के अनुसार ही ज़िम्मेदारी दी है। जो व्यक्ति खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकता, वह बैठकर पढ़े; जो रोज़ा नहीं रख सकता, वह दूसरे दिनों में रखे या फ़िद्या दे। इस्लाम में कोई ऐसा हुक्म नहीं जो इंसान की ताकत से बाहर हो। यही अल्लाह की रहमत है कि उसने दीन को आसान बनाया है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि हमारे पास एक किताब (लौह-ए-महफ़ूज़ और अमलनामा) है जो सच बोलती है। उसमें हर इंसान के अच्छे और बुरे कर्म दर्ज हैं। फ़रिश्ते हर पल उन्हें लिखते रहते हैं। क़यामत के दिन यही किताब गवाही देगी, और उसमें कोई कमी या ज़्यादती नहीं होगी। वह पूरी तरह सच्ची और न्यायपूर्ण होगी।

अल्लाह ने वादा किया है कि किसी पर ज़ुल्म नहीं होगा। न किसी के अच्छे कर्म कम किए जाएँगे, न बुरे कर्म बढ़ाए जाएँगे। हर इंसान को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला मिलेगा। यह अल्लाह का इंसाफ़ है कि वह किसी के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करता।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह हमारी क्षमता से ज़्यादा हमसे माँग नहीं करता। इसलिए हमें निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी ताकत के अनुसार अच्छे कर्म करते रहना चाहिए। अल्लाह हमारी छोटी-छोटी कोशिशों को भी क़बूल करता है और उसका पूरा इनाम देता है। यह हमारे लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है कि हमारा रब न्यायी और रहम करने वाला है। हमें चाहिए कि हम उसकी रहमत पर भरोसा रखें और उसके हुक्मों पर अमल करने की पूरी कोशिश करें। अल्लाह कभी किसी का हक़ नहीं मारता, और यही उसका वादा है जो क़यामत तक कायम रहेगा।



📜 आयत 60-64 — सूरा अल-मोमिनुन

60وَالَّذِينَ يُؤْتُونَ مَا آتَوا وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَاجِعُونَ
और जो लोग (ख़ुदा की राह में) जो कुछ बन पड़ता है देते हैं और फिर उनके दिल को इस बात का खटका लगा हुआ है कि उन्हें अपने परवरदिगार के सामने लौट कर जाना है
61أُولَٰئِكَ يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَهُمْ لَهَا سَابِقُونَ
(देखिये क्या होता है) यही लोग अलबत्ता नेकियों में जल्दी करते हैं और भलाई की तरफ (दूसरों से) लपक के आगे बढ़ जाते हैं
62وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَابٌ يَنطِقُ بِالْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और हम तो किसी शख्स को उसकी क़ूवत से बढ़के तकलीफ देते ही नहीं और हमारे पास तो (लोगों के आमाल की) किताब है जो बिल्कुल ठीक (हाल बताती है) और उन लोगों की (ज़र्रा बराबर) हक़ तलफी नहीं की जाएगी
63بَلْ قُلُوبُهُمْ فِي غَمْرَةٍ مِّنْ هَٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَالٌ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَامِلُونَ
उनके दिल उसकी तरफ से ग़फलत में पडे हैं इसके अलावा उन के बहुत से आमाल हैं जिन्हें ये (बराबर किया करते है) और बाज़ नहीं आते
64حَتَّىٰ إِذَا أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِالْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ
यहाँ तक कि जब हम उनके मालदारों को अज़ाब में गिरफ््तार करेंगे तो ये लोग वावैला करने लगेंगें
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीअवतरण स्थान
62आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 62

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Friday, October 2, 2026

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