अल-फुरकान · 42/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ آلِهَتِنَا لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا ۝٤٢
In kaada la yudillunaa `an aalihatinaa law laaa an sabarnaa `alaihaa; wa sawfa ya`lamoona heena yarawnal `azaaba man adallu sabeela
📖 हिंदी अर्थ
अगर बुतों की परसतिश पर साबित क़दम न रहते तो इस शख्स ने हमको हमारे माबूदों से बहका दिया था और बहुत जल्द (क़यामत में) जब ये लोग अज़ाब को देखेंगें तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि राहे रास्त से कौन ज्यादा भटका हुआ था

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا: वह (मुहम्मद ﷺ) तो हमें बहका ही देते
  • عَنْ آلِهَتِنَا: हमारे पूज्यों (देवताओं) से
  • لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا: अगर हम उन (देवताओं) पर जमे न रहते
  • مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا: कौन अधिक पथभ्रष्ट है

विस्तृत तफ़सीर:

जब ये काफ़िर और मुशरिक लोग आपको (ऐ नबी ﷺ) देखते थे, तो आपका मज़ाक उड़ाते थे और ताने मारते थे। वे कहते थे: "क्या यही वह शख्स है जो दावा करता है कि अल्लाह ने इसे हमारी ओर रसूल बनाकर भेजा है?" फिर वे अपनी नादानी और हठधर्मी में कहते थे: "यह तो अपनी दलीलों और तर्कों के ज़ोर से हमें हमारे देवताओं की पूजा से भटकाने ही वाला था, अगर हम अपने देवताओं पर साबित क़दम न रहते और उनकी इबादत पर ज़िद न करते।"

यानी वे अपनी गुमराही को सब्र और पक्के इरादे का नाम दे रहे थे, जबकि हक़ीक़त में यह उनकी जिद और अंधी पैरवी थी। वे समझते थे कि हमने अपने बुज़ुर्गों के दीन पर सब्र किया, लेकिन असल में वे सच्चाई से भाग रहे थे।

फिर अल्लाह तआला ने उन्हें धमकी दी: "और जब ये लोग अज़ाब को अपनी आँखों से देख लेंगे — चाहे वह क़ब्र का अज़ाब हो या क़यामत के दिन का — तो उन्हें ख़ुद पता चल जाएगा कि असल में सबसे ज़्यादा पथभ्रष्ट कौन है। क्या वे जो अपने हाथों के बनाए पत्थरों की पूजा कर रहे हैं, या वह नबी ﷺ जो उन्हें अल्लाह की तौहीद की तरफ बुला रहा है?"

उस दिन हर शख्स पर सच्चाई वाज़ेह हो जाएगी, और उन्हें मालूम होगा कि कौन सी राह सीधी थी और कौन सी गुमराही की। मगर अफ़सोस, यह जानकारी उस वक़्त किसी काम न आएगी जब अज़ाब आ चुका होगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई पर क़ायम रहना और अल्लाह की राह में मुश्किलों को सहना कितनी बड़ी फज़ीलत है। जब नबी ﷺ ने तौहीद का पैग़ाम पहुँचाया, तो मुशरिकों ने उसे बहकाना कहा, लेकिन अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि असली कामयाबी उसी की है जो अल्लाह की राह पर चले। आज भी जब कोई इंसान हक़ की तरफ बुलाता है, तो उसे तानों और मज़ाक का सामना करना पड़ता है, लेकिन अल्लाह का वादा है कि आख़िरत में सच्चाई ज़ाहिर होगी और हक़ पर चलने वालों को कामयाबी मिलेगी। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान पर मज़बूती से जमे रहें, क्योंकि अल्लाह की मदद सब्र करने वालों के साथ है।



📜 आयत 40-44 — अल-फुरकान

40وَلَقَدْ أَتَوْا عَلَى الْقَرْيَةِ الَّتِي أُمْطِرَتْ مَطَرَ السَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ نُشُورًا
हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों ईमान लाएँ)
41وَإِذَا رَأَوْكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا الَّذِي بَعَثَ اللَّهُ رَسُولًا
और (ऐ रसूल) ये लोग तुम्हें जब देखते हैं तो तुम से मसख़रा पन ही करने लगते हैं कि क्या यही वह (हज़रत) हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है (माज़ अल्लाह)
42إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ آلِهَتِنَا لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا
अगर बुतों की परसतिश पर साबित क़दम न रहते तो इस शख्स ने हमको हमारे माबूदों से बहका दिया था और बहुत जल्द (क़यामत में) जब ये लोग अज़ाब को देखेंगें तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि राहे रास्त से कौन ज्यादा भटका हुआ था
43أَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا
क्या तुमने उस शख्स को भी देखा है जिसने अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश को अपना माबूद बना रखा है तो क्या तुम उसके ज़िम्मेदार हो सकते हो (कि वह गुमराह न हों)
44أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَالْأَنْعَامِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا
क्या ये तुम्हारा ख्याल है कि इन (कुफ्फ़ारों) में अक्सर (बात) सुनते या समझते है (नहीं) ये तो बस बिल्कुल मिसल जानवरों के हैं बल्कि उन से भी ज्यादा राह (रास्त) से भटके हुए
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अनुवाद — अल-फुरकान 42

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Tuesday, August 18, 2026

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