अन-नमल · 65/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ ۝٦٥
Qul laa ya`lamu mman fis sammaawaati wal ardil ghaiba illal laah; wa maa yash`uroona aiyaana yub`asoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल इन से) कह दो कि जितने लोग आसमान व ज़मीन में हैं उनमे से कोई भी गैब की बात के सिवा नहीं जानता और वह भी तो नहीं समझते कि क़ब्र से दोबारा कब ज़िन्दा उठ खडे क़िए जाएँगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْغَيْبَ: छिपी हुई बातें, वे चीज़ें जो इंसानों की नज़रों से छिपी हों।
  • أَيَّانَ: कब, किस समय।
  • يُبْعَثُونَ: उठाए जाएँगे (क़ब्रों से जीवित करके)।

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप इन लोगों से कह दीजिए कि आसमानों और ज़मीन में जितनी भी मख़लूक़ात हैं—फ़रिश्ते हों, इंसान हों या जिन्न—उनमें से कोई भी ग़ैब (छिपी हुई बातों) का इल्म नहीं रखता। ग़ैब का इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को ही है। वही अकेला है जो हर छिपी हुई चीज़ को जानता है, चाहे वह आसमानों में हो या ज़मीन में। यहाँ तक कि क़यामत का समय भी ग़ैब में से है, जिसे सिर्फ़ अल्लाह ही जानता है।

जब मुशरिकीन ने आपसे पूछा कि क़यामत कब आएगी, तो अल्लाह ने यह आयत उतारी। इसमें अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि क़यामत का वक़्त कोई नहीं जानता—न कोई फ़रिश्ता, न कोई नबी, न कोई इंसान। सिर्फ़ अल्लाह ही इसका इल्म रखता है। यह बात सिर्फ़ क़यामत तक सीमित नहीं, बल्कि हर ग़ैबी चीज़ पर लागू होती है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि ये लोग यह भी नहीं जानते कि वे कब उठाए जाएँगे। उन्हें इस बात का कोई शऊर (एहसास) नहीं है कि क़यामत किस घड़ी आएगी। वे इस दुनिया में ग़ाफ़िल हैं, लेकिन जब वह दिन आएगा, तो उन्हें अपनी ग़फ़लत का अहसास होगा। उस दिन उनका इल्म मुकम्मल हो जाएगा और वे आख़िरत के मंज़र देखकर यक़ीन कर लेंगे, जबकि दुनिया में वे इस पर शक करते थे और उनकी बसीरत (दिल की आँखें) अंधी हो गई थीं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी ज़िंदगी में उन चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए जो हमारे बस में हैं—अच्छे काम, नेकी, तक़वा और अल्लाह की इबादत। क़यामत का समय जानने की कोशिश करना बेकार है, क्योंकि यह इल्म सिर्फ़ अल्लाह के पास है। हमारा काम है कि हम उस दिन के लिए तैयारी करें, क्योंकि वह दिन ज़रूर आने वाला है। जो लोग आज उस दिन को भूलकर ग़ाफ़िल रहते हैं, वे उस वक़्त पछताएँगे जब पछतावा किसी काम न आएगा। अल्लाह ने हमें इस दुनिया में मौक़ा दिया है कि हम अपने आख़िरत के सफ़र के लिए ज़ाद-ए-राह (सफ़र का सामान) इकट्ठा कर लें। यही असली कामयाबी है।



📜 आयत 63-67 — अन-नमल

63أَمَّن يَهْدِيكُمْ فِي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَن يُرْسِلُ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ تَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
भला वह कौन है जो तुम लोगों की ख़़ुश्की और तरी की तारिक़ियों में राह दिखाता है और कौन उसकी बाराने रहमत के आगे आगे (बारिश की) ख़ुशखबरी लेकर हवाओं को भेजता है-क्या ख़ुदा के साथ कोई और माबूद भी है (हरगिज़ नहीं) ये लोग जिन चीज़ों को ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं ख़ुदा उससे बालातर है
64أَمَّن يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ وَمَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۗ أَإِلَٰهٌ مَّعَ اللَّهِ ۚ قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
भला वह कौन हैं जो ख़िलकत को नए सिरे से पैदा करता है फिर उसे दोबारा (मरने के बाद) पैदा करेगा और कौन है जो तुम लोगों को आसमान व ज़मीन से रिज़क़ देता है- तो क्या ख़ुदा के साथ कोई और माबूद भी है (हरग़िज़ नहीं) (ऐ रसूल) तुम (इन मुशरेकीन से) कहा दो कि अगर तुम सच्चे हो तो अपनी दलील पेश करो
65قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الْغَيْبَ إِلَّا اللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ
(ऐ रसूल इन से) कह दो कि जितने लोग आसमान व ज़मीन में हैं उनमे से कोई भी गैब की बात के सिवा नहीं जानता और वह भी तो नहीं समझते कि क़ब्र से दोबारा कब ज़िन्दा उठ खडे क़िए जाएँगें
66بَلِ ادَّارَكَ عِلْمُهُمْ فِي الْآخِرَةِ ۚ بَلْ هُمْ فِي شَكٍّ مِّنْهَا ۖ بَلْ هُم مِّنْهَا عَمُونَ
बल्कि (असल ये है कि) आख़िरत के बारे में उनके इल्म का ख़ात्मा हो गया है बल्कि उसकी तरफ से शक में पड़ें हैं बल्कि (सच ये है कि) इससे ये लोग अंधे बने हुए हैं
67وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَإِذَا كُنَّا تُرَابًا وَآبَاؤُنَا أَئِنَّا لَمُخْرَجُونَ
और कुफ्फार कहने लगे कि क्या जब हम और हमारे बाप दादा (सड़ गल कर) मिट्टी हो जाएँगें तो क्या हम फिर निकाले जाएँगें
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अनुवाद — अन-नमल 65

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Tuesday, August 18, 2026

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