अल-क़सस · 14/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ ۝١٤
Wa lammaa balagha ashuddahoo wastawaaa aatai naahu hukmanw wa `ilmaa; wa kazaalika najzil muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और (हाथ पाँव निकाल के) दुरुस्त हो गए तो हमने उनको हिकमत और इल्म अता किया और नेकी करने वालों को हम यूँ जज़ाए खैर देते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अशुद्दहु (أَشُدَّهُ): पूर्ण शक्ति और शारीरिक परिपक्वता की अवस्था, जो आमतौर पर तीस वर्ष की आयु के आसपास होती है।
  • इस्तवा (اسْتَوَىٰ): शक्ति का पूर्ण रूप से संतुलित और स्थिर हो जाना, यानी चालीस वर्ष की आयु तक पहुँचना।
  • हुक्म (حُكْمًا): समझ, बुद्धि, और सही निर्णय लेने की क्षमता; इसे हिक्मत और फ़िक़्ह (धार्मिक समझ) भी कहा जाता है।
  • इल्म (عِلْمًا): ज्ञान, विशेष रूप से धार्मिक और व्यावहारिक ज्ञान जो जीवन के सही मार्ग दिखाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) अपनी पूर्ण युवावस्था और शारीरिक परिपक्वता को पहुँचे, और उनकी शक्ति संतुलित हो गई — यानी वे तीस से चालीस वर्ष की आयु के बीच पहुँचे, जो नबुव्वत (पैग़म्बरी) का समय होता है — तो अल्लाह तआला ने उन्हें हुक्म (हिक्मत और गहरी समझ) और इल्म (धार्मिक और व्यावहारिक ज्ञान) प्रदान किया। यह ज्ञान और समझ उन्हें नबुव्वत से पहले ही दी गई थी, ताकि वे सत्य को समझ सकें, असत्य का खंडन कर सकें, और लोगों को सही रास्ते की ओर बुला सकें। इससे पहले कि वे पैग़म्बर बनते, वे सच बोलते थे, बुराई का विरोध करते थे, और अपनी क़ौम के बीच एक नेक और समझदार व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।

यह अल्लाह का नियम और सुन्नत (रीति) है कि वह अपने नेक और मुहसिन (भलाई करने वाले) बंदों को उनके अच्छे कर्मों और ईमानदारी का बदला देता है। जिस प्रकार अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को उनकी नेकी और ईमानदारी के कारण हिक्मत और इल्म से नवाज़ा, उसी प्रकार वह हर उस व्यक्ति को, जो अपने कर्मों को शुद्ध करता है, अपने रब की इबादत में सच्चा होता है, और लोगों के साथ भलाई करता है, उसे भी विशेष ज्ञान, समझ और सफलता प्रदान करता है। यह अल्लाह की रहमत है कि वह अपने नेक बंदों को दुनिया में भी सम्मान देता है और आख़िरत में भी उनके लिए बड़ा इनाम तैयार करता है।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता केवल शारीरिक शक्ति या सांसारिक साधनों में नहीं है, बल्कि असली कामयाबी अल्लाह की ओर से मिलने वाली हिक्मत और इल्म में है। जो व्यक्ति अपने जीवन को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालता है, वही सच्चा मुहसिन है, और अल्लाह ऐसे लोगों को कभी निराश नहीं करता। यह आयत हमें प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन में नेकी, ईमानदारी और अच्छे आचरण को अपनाएँ, क्योंकि अल्लाह की मदद और रहमत उन्हीं के साथ होती है जो भलाई करते हैं और अपने रब की ओर झुकते हैं।



📜 आयत 12-16 — अल-क़सस

12۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ الْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُ لَكُمْ وَهُمْ لَهُ نَاصِحُونَ
और हमने मूसा पर पहले ही से और दाईयों (के दूध) को हराम कर दिया था (कि किसी की छाती से मुँह न लगाया) तब मूसा की बहन बोली भला मै तुम्हें एक घराने का पता बताऊ कि वह तुम्हारी ख़ातिर इस बच्चे की परवरिश कर देंगे और वह यक़ीनन इसके खैरख्वाह होगे
13فَرَدَدْنَاهُ إِلَىٰ أُمِّهِ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
ग़रज़ (इस तरकीब से) हमने मूसा को उसकी माँ तक फिर पहुँचा दिया ताकि उसकी ऑंख ठन्डी हो जाए और रंज न करे और ताकि समझ ले ख़ुदा का वायदा बिल्कुल ठीक है मगर उनमें के अक्सर नहीं जानते हैं
14وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और (हाथ पाँव निकाल के) दुरुस्त हो गए तो हमने उनको हिकमत और इल्म अता किया और नेकी करने वालों को हम यूँ जज़ाए खैर देते हैं
15وَدَخَلَ الْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِ ۖ فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِن شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ فَوَكَزَهُ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُّضِلٌّ مُّبِينٌ
और एक दिन इत्तिफाक़न मूसा शहर में ऐसे वक्त अाए कि वहाँ के लोग (नींद की) ग़फलत में पडे हुए थे तो देखा कि वहाँ दो आदमी आपस में लड़े मरते हैं ये (एक) तो उनकी क़ौम (बनी इसराइल) में का है और वह (दूसरा) उनके दुश्मन की क़ौम (क़िब्ती) का है तो जो शख्स उनकी क़ौम का था उसने उस शख्स से जो उनके दुश्मनों में था (ग़लबा हासिल करने के लिए) मूसा से मदद माँगी ये सुनते ही मूसा ने उसे एक घूसा मारा था कि उसका काम तमाम हो गया फिर (ख्याल करके) कहने लगे ये शैतान का काम था इसमें शक नहीं कि वह दुश्मन और खुल्लम खुल्ला गुमराह करने वाला है
16قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(फिर बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की परवरदिगार बेशक मैने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया (कि इस शहर में आया) तो तू मुझे (दुश्मनों से) पोशीदा रख-ग़रज़ ख़ुदा ने उन्हें पोशीदा रखा (इसमें तो शक नहीं कि वह बड़ा पोशीदा रखने वाला मेहरबान है)
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अनुवाद — अल-क़सस 14

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Tuesday, August 18, 2026

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