अल-अहज़ाब · 14/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَآتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَا إِلَّا يَسِيرًا ۝١٤
wa law dukhilat `alaihim min aqtaarihaa summa su`ilul fitnata la aatawhaa wa maa talabbasoo bihaaa illaa yaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और अगर ऐसा ही लश्कर उन लोगों पर मदीने के एतराफ से आ पड़े और उन से फसाद (ख़ाना जंगी) करने की दरख्वास्त की जाए तो ये लोग उसके लिए (फौरन) आ मौजूद हों

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَقْطَارِهَا: उसके किनारों, चारों ओर से।
  • الْفِتْنَةَ: यहाँ अर्थ है कुफ्र (अविश्वास) और शिर्क की ओर लौटना।
  • لَآتَوْهَا: वे उसे (फित्ने को) दे देते, यानी उसकी माँग पूरी कर देते।
  • تَلَبَّثُوا: देर करते, रुकते।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है, जिन्होंने अहज़ाब (सहयोगी सेनाओं) के हमले के दौरान कमज़ोरी दिखाई थी। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि अगर दुश्मन की फ़ौजें मदीना के चारों ओर से घुस आतीं, और फिर उन मुनाफ़िक़ीन से कहा जाता कि वे इस्लाम छोड़कर कुफ्र और शिर्क की तरफ लौट जाएँ, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसा कर देते। वे इस फित्ने (कुफ्र की ओर लौटने) में बिल्कुल देर न करते, बल्कि तुरंत उसे क़बूल कर लेते। यह उनके दिलों की सच्ची हालत बयान कर रही है — कि उनका ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी था, दिल से वे कुफ्र से चिपके हुए थे।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि दिल का यक़ीन और अमल का सबूत है। जब मुश्किलें आती हैं, तो सच्चे और झूठे ईमान का इम्तिहान होता है। अल्लाह तआला हमें उन लोगों की तरह न बनाए जो आसान वक़्त में मुसलमान बनते हैं और मुश्किल वक़्त में अपने ईमान को बेच देते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान को मज़बूत करें, अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर पक्का भरोसा रखें, और हर हालत में साबित-क़दम रहें। याद रखें, दुनिया की कोई ताक़त हमें अल्लाह की राह से नहीं हटा सकती, अगर हमारा दिल सच्चे ईमान से भरा हो। अल्लाह तआला हमें सच्चे ईमान, स्थिरता और उसकी राह पर क़ुर्बानी देने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 12-16 — अल-अहज़ाब

12وَإِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ مَّا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ إِلَّا غُرُورًا
और जिस वक्त मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में (कुफ्र का) मरज़ था कहने लगे थे कि खुदा ने और उसके रसूल ने जो हमसे वायदे किए थे वह बस बिल्कुल धोखे की टट्टी था।
13وَإِذْ قَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْهُمْ يَا أَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُوا ۚ وَيَسْتَأْذِنُ فَرِيقٌ مِّنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًا
और अब उनमें का एक गिरोह कहने लगा था कि ऐ मदीने वालों अब (दुश्मन के मुक़ाबलें में ) तुम्हारे कहीं ठिकाना नहीं तो (बेहतर है कि अब भी) पलट चलो और उनमें से कुछ लोग रसूल से (घर लौट जाने की) इजाज़त माँगने लगे थे कि हमारे घर (मर्दों से) बिल्कुल ख़ाली (गैर महफूज़) पड़े हुए हैं - हालाँकि वह ख़ाली (ग़ैर महफूज़) न थे (बल्कि) वह लोग तो (इसी बहाने से) बस भागना चाहते हैं
14وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَآتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَا إِلَّا يَسِيرًا
और अगर ऐसा ही लश्कर उन लोगों पर मदीने के एतराफ से आ पड़े और उन से फसाद (ख़ाना जंगी) करने की दरख्वास्त की जाए तो ये लोग उसके लिए (फौरन) आ मौजूद हों
15وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْأَدْبَارَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ اللَّهِ مَسْئُولًا
और (उस वक्त) अपने घरों में भी बहुत कम तवक्क़ुफ़ करेंगे (मगर ये तो जिहाद है) हालाँकि उन लोगों ने पहले ही खुदा से एहद किया था कि हम दुश्मन के मुक़ाबले में (अपनी) पीठ न फेरेंगे और खुदा के एहद की पूछगछ तो (एक न एक दिन) होकर रहेगी
16قُل لَّن يَنفَعَكُمُ الْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ الْمَوْتِ أَوِ الْقَتْلِ وَإِذًا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) कह दो कि अगर तुम मौत का क़त्ल (के ख़ौफ) से भागे भी तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ कुछ भी मुफ़ीद न होगा और अगर तुम भागकर बच भी गए तो बस यही न की दुनिया में चन्द रोज़ा और चैनकर लो
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 14

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Wednesday, August 19, 2026

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