अल-अहज़ाब · 15/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْأَدْبَارَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ اللَّهِ مَسْئُولًا ۝١٥
Wa laqad kaanoo `aahadul laaha min qablu laa yuwal loonal adbaar; wa kaana `ahdul laahi mas`oolaa
📖 हिंदी अर्थ
और (उस वक्त) अपने घरों में भी बहुत कम तवक्क़ुफ़ करेंगे (मगर ये तो जिहाद है) हालाँकि उन लोगों ने पहले ही खुदा से एहद किया था कि हम दुश्मन के मुक़ाबले में (अपनी) पीठ न फेरेंगे और खुदा के एहद की पूछगछ तो (एक न एक दिन) होकर रहेगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يُوَلُّونَ الْأَدْبَارَ: वे पीठ नहीं फेरेंगे, अर्थात युद्ध के मैदान से भागेंगे नहीं।
  • عَهْدُ اللَّهِ مَسْئُولًا: अल्लाह से किया गया वचन (अहद) एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में ज़रूर पूछा जाएगा और उस पर हिसाब लिया जाएगा।

तफ़सीर:

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से पहले वादा किया था कि अगर वे किसी जंग में शामिल होंगे तो मैदान से नहीं भागेंगे और दुश्मन के सामने पीठ नहीं दिखाएँगे। यह वादा उन्होंने उहुद के दिन से भागने के बाद किया था, या फिर ग़ज़वा-ए-ख़ंदक़ से पहले किया था, जब उन्होंने अल्लाह से अहद किया था कि अगर अल्लाह उन्हें कोई जंग दिखाएगा तो वे साबित क़दम रहेंगे और डटे रहेंगे।

लेकिन जब असली वक़्त आया और जंग की घड़ी आई, तो उन्होंने अपना वादा तोड़ दिया, पीठ फेर ली और भाग खड़े हुए। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह अहद कोई मामूली बात नहीं थी, बल्कि अल्लाह से किया गया वचन एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, और क़यामत के दिन उनसे इसके बारे में ज़रूर पूछा जाएगा। यह उनके लिए एक सख्त तनबीह (चेतावनी) और धमकी है।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि अल्लाह से किया गया हर वादा और अहद बहुत बड़ी अमानत है। मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह से किए गए वादे को पूरा करे, चाहे वह नमाज़, रोज़ा, जिहाद, या किसी और नेक काम का हो। अल्लाह तआला उन लोगों से मुहब्बत करता है जो अपने अहद को पूरा करते हैं, और जो लोग अहद तोड़ते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास सख्त अज़ाब है।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि मुसलमान की ज़िंदगी में सच्चाई और वफ़ादारी बहुत अहम है। अगर हमने अल्लाह से कोई वादा किया है, तो उसे निभाना हमारा फ़र्ज़ है। अल्लाह तआला हमें सच्चे दिल से अपने वादों पर क़ायम रहने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 13-17 — अल-अहज़ाब

13وَإِذْ قَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْهُمْ يَا أَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُوا ۚ وَيَسْتَأْذِنُ فَرِيقٌ مِّنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًا
और अब उनमें का एक गिरोह कहने लगा था कि ऐ मदीने वालों अब (दुश्मन के मुक़ाबलें में ) तुम्हारे कहीं ठिकाना नहीं तो (बेहतर है कि अब भी) पलट चलो और उनमें से कुछ लोग रसूल से (घर लौट जाने की) इजाज़त माँगने लगे थे कि हमारे घर (मर्दों से) बिल्कुल ख़ाली (गैर महफूज़) पड़े हुए हैं - हालाँकि वह ख़ाली (ग़ैर महफूज़) न थे (बल्कि) वह लोग तो (इसी बहाने से) बस भागना चाहते हैं
14وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَآتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَا إِلَّا يَسِيرًا
और अगर ऐसा ही लश्कर उन लोगों पर मदीने के एतराफ से आ पड़े और उन से फसाद (ख़ाना जंगी) करने की दरख्वास्त की जाए तो ये लोग उसके लिए (फौरन) आ मौजूद हों
15وَلَقَدْ كَانُوا عَاهَدُوا اللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ الْأَدْبَارَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ اللَّهِ مَسْئُولًا
और (उस वक्त) अपने घरों में भी बहुत कम तवक्क़ुफ़ करेंगे (मगर ये तो जिहाद है) हालाँकि उन लोगों ने पहले ही खुदा से एहद किया था कि हम दुश्मन के मुक़ाबले में (अपनी) पीठ न फेरेंगे और खुदा के एहद की पूछगछ तो (एक न एक दिन) होकर रहेगी
16قُل لَّن يَنفَعَكُمُ الْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ الْمَوْتِ أَوِ الْقَتْلِ وَإِذًا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) कह दो कि अगर तुम मौत का क़त्ल (के ख़ौफ) से भागे भी तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ कुछ भी मुफ़ीद न होगा और अगर तुम भागकर बच भी गए तो बस यही न की दुनिया में चन्द रोज़ा और चैनकर लो
17قُلْ مَن ذَا الَّذِي يَعْصِمُكُم مِّنَ اللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةً ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि अगर खुदा तुम्हारे साथ बुराई का इरादा कर बैठे तो तुम्हें उसके (अज़ाब) से कौन ऐसा है जो बचाए या भलाई ही करना चाहे (तो कौन रोक सकता है) और ये लोग खुदा के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 15

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Tuesday, August 18, 2026

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