सबा · 45/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
وَكَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَا آتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُلِي ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ ۝٤٥
Wa kazzabal lazeena min qablihim wa maa balaghoo mi`shaara maaa aatainaahum fakazzaboo Rusulee; fakaifa kaana nakeer
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग उनसे पहले गुज़र गए उन्होंने भी (पैग़म्बरों को) झुठलाया था हालॉकि हमने जितना उन लोगों को दिया था ये लोग (अभी) उसके दसवें हिस्सा को (भी) नहीं पहुँचे उस पर उन लोगों न मेरे (पैग़म्बरों को) झुठलाया था तो तुमने देखा कि मेरा (अज़ाब उन पर) कैसा सख्त हुआ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • مِعْشَارَ: दसवाँ हिस्सा, दस में से एक भाग।
  • نَكِيرِ: मेरा इनकार, मेरी सज़ा, मेरा क्रोध और प्रकोप।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ और उनकी उम्मत को तसल्ली देते हुए बताते हैं कि ऐ नबी! आप अकेले नहीं हैं जिन्हें झुठलाया गया। आपसे पहले भी कई उम्मतें थीं—आद, समूद, क़ौमे लूत, क़ौमे इब्राहीम और अन्य—जिन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया। उन उम्मतों को अल्लाह ने ज़बरदस्त क़ुव्वत, बेशुमार माल, लंबी उम्र और ढेरों नेमतें दी थीं। मगर जब उन्होंने हक़ को नकारा और रसूलों की नाफ़रमानी की, तो अल्लाह का अज़ाब उन पर आ पड़ा और उन्हें तबाह कर दिया गया।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि मक्का के काफ़िरों ने भी तुम्हें झुठलाया है, लेकिन उन्हें उन पिछली उम्मतों का दसवाँ हिस्सा भी नहीं दिया गया था—ना उनकी क़ुव्वत, ना उनका माल, ना उनकी तादाद। फिर भी उन्होंने रसूलों को झुठलाया। जब पिछली उम्मतें अपनी ताक़त और सामर्थ्य के बावजूद अल्लाह के अज़ाब से नहीं बच सकीं, तो इन कमज़ोर लोगों का क्या हाल होगा?

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं: "देखो, मेरा इनकार और मेरी सज़ा कैसी थी!" यानी जब मैंने उन पर अपना प्रकोप उतारा, तो ना उनकी ताक़त काम आई, ना उनका माल, ना उनकी फ़ौजें। सब कुछ तबाह हो गया। यह एक सख़्त तनबीह (चेतावनी) है कि ऐ काफ़िरों! अगर तुम भी अपनी ज़िद और इनकार पर अड़े रहे, तो तुम्हारा अंजाम भी उन्हीं जैसा होगा।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की ताक़त के आगे किसी की भी ताक़त नहीं चलती। जो लोग सच्चाई को झुठलाते हैं और हक़ के दुश्मन बनते हैं, उनका अंजाम हमेशा बुरा रहा है। इतिहास गवाह है कि जिन उम्मतों ने अपने नबियों को नकारा, वे मिटा दी गईं। मगर अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खुला है—जो कोई भी अपनी ग़लती से तौबा करके सच्चाई की तरफ़ लौट आए, अल्लाह उसे माफ़ कर देता है और उसे कामयाबी देता है।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हम अपने नबी ﷺ की सुन्नत पर चलें, उनके बताए रास्ते पर क़दम बढ़ाएँ, और कभी भी अपनी ताक़त या माल पर घमंड न करें। क्योंकि असली ताक़त अल्लाह की है, और वही सबसे बड़ा मददगार है। जो लोग अल्लाह के दीन की मदद करते हैं, अल्लाह उनकी मदद करता है और उन्हें इज़्ज़त देता है। आइए, हम उन लोगों में से बनें जो सच्चाई को क़बूल करते हैं और अल्लाह के फ़रमान के आगे सर झुकाते हैं, ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।



📜 आयत 43-47 — सबा

43وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا رَجُلٌ يُرِيدُ أَن يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُكُمْ وَقَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا إِفْكٌ مُّفْتَرًى ۚ وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
और जब उनके सामने हमारी वाज़ेए व रौशन आयतें पढ़ी जाती थीं तो बाहम कहते थे कि ये (रसूल) भी तो बस (हमारा ही जैसा) आदमी है ये चाहता है कि जिन चीज़ों को तुम्हारे बाप-दादा पूजते थे (उनकी परसतिश) से तुम को रोक दें और कहने लगे कि ये (क़ुरान) तो बस निरा झूठ है और अपने जी का गढ़ा हुआ है और जो लोग काफ़िर हो बैठो जब उनके पास हक़ बात आयी तो उसके बारे में कहने लगे कि ये तो बस खुला हुआ जादू है
44وَمَا آتَيْنَاهُم مِّن كُتُبٍ يَدْرُسُونَهَا ۖ وَمَا أَرْسَلْنَا إِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِن نَّذِيرٍ
और (ऐ रसूल) हमने तो उन लोगों को न (आसमानी) किताबें अता की तुम्हें जिन्हें ये लोग पढ़ते और न तुमसे पहले इन लोगों के पास कोई डरानेवाला (पैग़म्बर) भेजा (उस पर भी उन्होंने क़द्र न की)
45وَكَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَا آتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُلِي ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
और जो लोग उनसे पहले गुज़र गए उन्होंने भी (पैग़म्बरों को) झुठलाया था हालॉकि हमने जितना उन लोगों को दिया था ये लोग (अभी) उसके दसवें हिस्सा को (भी) नहीं पहुँचे उस पर उन लोगों न मेरे (पैग़म्बरों को) झुठलाया था तो तुमने देखा कि मेरा (अज़ाब उन पर) कैसा सख्त हुआ
46۞ قُلْ إِنَّمَا أَعِظُكُم بِوَاحِدَةٍ ۖ أَن تَقُومُوا لِلَّهِ مَثْنَىٰ وَفُرَادَىٰ ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا ۚ مَا بِصَاحِبِكُم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ لَّكُم بَيْنَ يَدَيْ عَذَابٍ شَدِيدٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तुमसे नसीहत की बस एक बात कहता हूँ (वह) ये (है) कि तुम लोग बाज़ खुदा के वास्ते एक-एक और दो-दो उठ खड़े हो और अच्छी तरह ग़ौर करो तो (देख लोगे कि) तुम्हारे रफीक़ (मोहम्मद स0) को किसी तरह का जुनून नहीं वह तो बस तुम्हें एक सख्त अज़ाब (क़यामत) के सामने (आने) से डराने वाला है
47قُلْ مَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
(ऐ रसूल) तुम (ये भी) कह दो कि (तबलीख़े रिसालत की) मैंने तुमसे कुछ उजरत माँगी हो तो वह तुम्हीं को (मुबारक) हो मेरी उजरत तो बस खुदा पर है और वही (तुम्हारे आमाल अफआल) हर चीज़ से खूब वाक़िफ है
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अनुवाद — सबा 45

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Tuesday, August 18, 2026

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