यासीन · 10/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
وَسَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ۝١٠
Wa sawaaa`un `alaihim `a-anzartahum am lam tunzirhum laa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) उनके लिए बराबर है ख्वाह तुम उन्हें डराओ या न डराओ ये (कभी) ईमान लाने वाले नहीं हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَسَوَاءٌ عَلَيْهِمْ – उनके लिए बराबर है, एक समान है।
  • أَأَنذَرْتَهُمْ – क्या तुमने उन्हें डराया (सचेत किया)।
  • أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ – या तुमने उन्हें डराया नहीं।
  • لَا يُؤْمِنُونَ – वे ईमान नहीं लाएँगे।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को उन काफ़िरों और हठधर्म लोगों के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने सत्य को जानते हुए भी उसे ठुकरा दिया और अपने कुफ्र और अहंकार पर अड़े रहे। अल्लाह फ़रमाता है कि ऐ नबी! इन लोगों के लिए आपका डराना और न डराना बराबर है — यानी चाहे आप उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराएँ या न डराएँ, वे किसी भी सूरत में ईमान नहीं लाएँगे। इसका कारण यह है कि उन्होंने अपने दिलों पर मुहर लगवा ली है, सत्य के प्रति इतनी अधिक दुश्मनी और अहंकार अपना लिया है कि अब उनके दिलों में हिदायत की कोई गुंजाइश नहीं बची।

यह आयत उन लोगों के बारे में है जिनका कुफ्र और इनकार उनकी फ़ितरत (स्वभाव) का हिस्सा बन चुका है — जिन्होंने नबी ﷺ की दावत को सुनकर भी जानबूझकर उसे रद्द किया और मज़ाक उड़ाया। ऐसे लोगों के लिए दावत और तबलीग़ का कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि उनके दिल बंद हो चुके होते हैं।

लेकिन इस आयत का यह मतलब हरगिज़ नहीं कि दावत और नसीहत छोड़ दी जाए। बल्कि यह एक सच्चाई की खबर है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हिदायत क़बूल नहीं करते। यह अल्लाह की सुन्नत (कायदा) है कि जब बंदा हक़ को जानबूझकर ठुकराता है, तो अल्लाह उसके दिल को और सख्त कर देता है।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें अपने ईमान की हिफाज़त करनी चाहिए और अपने दिलों को सख्त नहीं होने देना चाहिए। जो व्यक्ति जितनी देर सत्य को सुनकर भी उस पर अमल नहीं करता, उसका दिल उतना ही सख्त होता जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि जब हमारे पास हिदायत आए, तो हम उसे खुशी से क़बूल करें और अल्लाह की रहमत के दरवाज़े से खुद को दूर न करें। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि दावत का काम करने वालों को मायूस नहीं होना चाहिए — अगर कुछ लोग न मानें, तो भी उनका फर्ज़ दावत पहुँचाना है, और हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है। अल्लाह तआला से दुआ करें कि वह हमारे दिलों को नरम रखे और हमें सच्चे ईमान पर साबित क़दम रखे। आमीन।



📜 आयत 8-12 — यासीन

8إِنَّا جَعَلْنَا فِي أَعْنَاقِهِمْ أَغْلَالًا فَهِيَ إِلَى الْأَذْقَانِ فَهُم مُّقْمَحُونَ
हमने उनकी गर्दनों में (भारी-भारी लोहे के) तौक़ डाल दिए हैं और ठुड्डियों तक पहुँचे हुए हैं कि वह गर्दनें उठाए हुए हैं (सर झुका नहीं सकते)
9وَجَعَلْنَا مِن بَيْنِ أَيْدِيهِمْ سَدًّا وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّا فَأَغْشَيْنَاهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
हमने एक दीवार उनके आगे बना दी है और एक दीवार उनके पीछे फिर ऊपर से उनको ढाँक दिया है तो वह कुछ देख नहीं सकते
10وَسَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
और (ऐ रसूल) उनके लिए बराबर है ख्वाह तुम उन्हें डराओ या न डराओ ये (कभी) ईमान लाने वाले नहीं हैं
11إِنَّمَا تُنذِرُ مَنِ اتَّبَعَ الذِّكْرَ وَخَشِيَ الرَّحْمَٰنَ بِالْغَيْبِ ۖ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍ وَأَجْرٍ كَرِيمٍ
तुम तो बस उसी शख्स को डरा सकते हो जो नसीहत माने और बेदेखे भाले खुदा का ख़ौफ़ रखे तो तुम उसको (गुनाहों की) माफी और एक बाइज्ज़त (व आबरू) अज्र की खुशख़बरी दे दो
12إِنَّا نَحْنُ نُحْيِي الْمَوْتَىٰ وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا وَآثَارَهُمْ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُّبِينٍ
हम ही यक़ीनन मुर्दों को ज़िन्दा करते हैं और जो कुछ लोग पहले कर चुके हैं (उनको) और उनकी (अच्छी या बुरी बाक़ी माँदा) निशानियों को लिखते जाते हैं और हमने हर चीज़ का एक सरीह व रौशन पेशवा में घेर दिया है
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अनुवाद — यासीन 10

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Tuesday, August 18, 2026

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