यासीन · 37/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
وَآيَةٌ لَّهُمُ اللَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ ۝٣٧
Wa Aayatul lahumul lailu naslakhu minhun nahaara fa-izaa hum muzlimoon
📖 हिंदी अर्थ
और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक्त ये लोग अंधेरे में रह जाते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَةٌ: निशानी, प्रमाण, सबूत।
  • نَسْلَخُ: हम खींच लेते हैं, निकाल देते हैं (जैसे खाल खींची जाती है)।
  • مُظْلِمُونَ: अंधेरे में डूबे हुए, अंधकार में प्रवेश करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपनी कुदरत और एकता की एक और स्पष्ट निशानी बयान कर रहा है। वह फ़रमाता है कि रात और दिन का आना-जाना, उनका बदलना, यह सब उसकी कुदरत की ज़बरदस्त दलील है। जब अल्लाह चाहता है तो दिन की रोशनी को रात से खींच लेता है, जैसे किसी जानवर की खाल उतारी जाती है। यानी जैसे खाल उतारते ही शरीर बेनकाब हो जाता है, उसी तरह जब सूरज डूबता है तो रोशनी छिन जाती है और पूरी दुनिया अंधेरे में डूब जाती है।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि अल्लाह ने दिन को रात से "निकालने" की बजाय "खींचने" का शब्द इस्तेमाल किया है। इससे पता चलता है कि असल चीज़ रात (अंधेरा) है और दिन उसके ऊपर चढ़ा हुआ एक पर्दा है। जब अल्लाह चाहता है, वह यह पर्दा हटा देता है और अंधेरा छा जाता है। यही वजह है कि आयत के आखिर में फ़रमाया: "फिर अचानक वे अंधेरे में होते हैं" यानी लोगों को पता भी नहीं चलता और पूरी दुनिया अंधकार में डूब जाती है।

यह निशानी हमें सिखाती है कि जिस तरह अल्लाह दिन और रात को बदलता है, उसी तरह वह इंसान की ज़िंदगी के हालात भी बदलता है। कभी खुशी और रोशनी का दौर होता है, तो कभी ग़म और अंधेरे का। मगर जिस तरह रात के बाद सुबह ज़रूर आती है, उसी तरह मुसीबत के बाद आसानी भी ज़रूर आती है। यह आयत हमें अल्लाह की कुदरत पर ग़ौर करने की दावत देती है। जो इंसान इन निशानियों पर ग़ौर करता है, उसका ईमान मज़बूत होता है और वह अल्लाह की बड़ाई को दिल से स्वीकार करता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें याद दिलाती है कि यह कायनात अपने आप नहीं चल रही, बल्कि एक ताकतवर और हिकमत वाला अल्लाह इसे चला रहा है। जिस अल्लाह ने रात और दिन का यह निज़ाम बनाया है, वही हमारी ज़िंदगी के हर मामले का मालिक है। इसलिए हमें चाहिए कि हम उसी की इबादत करें, उसी से मदद माँगें और उसी के दिए हुए हुक्मों पर अमल करें। यही हमारी कामयाबी की कुंजी है, दुनिया में भी और आख़िरत में भी।

🎧 सुनें

📜 आयत 35-39 — यासीन

35لِيَأْكُلُوا مِن ثَمَرِهِ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खुदा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते
36سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنبِتُ الْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खुद उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए
37وَآيَةٌ لَّهُمُ اللَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ
और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक्त ये लोग अंधेरे में रह जाते हैं
38وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَّهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ
और (एक निशानी) आफताब है जो अपने एक ठिकाने पर चल रहा है ये (सबसे) ग़ालिब वाक़िफ (खुदा) का (बाँद्दा हुआ) अन्दाज़ा है
39وَالْقَمَرَ قَدَّرْنَاهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَالْعُرْجُونِ الْقَدِيمِ
और हमने चाँद के लिए मंज़िलें मुक़र्रर कर दीं हैं यहाँ तक कि हिर फिर के (आख़िर माह में) खजूर की पुरानी टहनी का सा (पतला टेढ़ा) हो जाता है
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अनुवाद — यासीन 37

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सूरा आयत 37/83 — यासीन يس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यासीन सुनें, यासीन अनुवाद, यासीन mp3, यासीन pdf. आयत 35–39. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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