यासीन · 46/83
अनुवाद उच्चारण — सूरा यासीन
وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ آيَةٍ مِّنْ آيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ ۝٤٦
Wa maa taateehim min aayatim min ayataati Rabbihim illaa kaanoo `anhaa mu`rideen
📖 हिंदी अर्थ
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَةٍ: निशानी, चमत्कार, प्रमाण या सबूत।
  • مُعْرِضِينَ: मुँह मोड़ने वाले, उपेक्षा करने वाले, ध्यान न देने वाले।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की दयनीय स्थिति का वर्णन करती है जो सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। अल्लाह तआला फरमाता है कि जब भी इन काफिरों और मुशरिकों के पास उनके रब की ओर से कोई निशानी आती है — चाहे वह कोई चमत्कार हो, कोई आयत हो, या कोई सबूत जो उन्हें सत्य की राह दिखाए — तो वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं और उस पर ध्यान नहीं देते।

ये लोग ऐसे थे कि उनके पास जो भी प्रमाण आता था, वे उसे ठुकरा देते थे। उन्होंने अपने दिलों पर अहंकार और हठधर्मिता की परत चढ़ा ली थी, जिससे सत्य की रोशनी उनके दिलों तक नहीं पहुँच पाती थी। वे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सच्चाई की गवाही देने वाली हर निशानी से विमुख हो जाते थे, क्योंकि उन्होंने झूठ पर चलने की आदत बना ली थी और सत्य को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ा सबक देती है कि इंसान का दिल जब सत्य से मुँह मोड़ने का आदी हो जाता है, तो वह हर सबूत के बावजूद हिदायत नहीं पाता। अल्लाह की निशानियाँ हर तरफ बिखरी हुई हैं — आसमान में, ज़मीन में, इंसान की पैदाइश में, और कुरआन की आयतों में — लेकिन जो दिल इन पर गौर नहीं करता, वह कभी हिदायत नहीं पा सकता।

प्यारे भाइयों और बहनों! हमें चाहिए कि हम अल्लाह की हर निशानी पर ध्यान दें, उससे सबक लें और अपने दिलों को सत्य के लिए खुला रखें। अल्लाह की आयतें हमारे लिए रहमत और हिदायत हैं — वे हमें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाती हैं। जो इनसे मुँह मोड़ता है, वह खुद को नुकसान में डालता है, क्योंकि ये आयतें उसके लिए क़ियामत के दिन गवाह बनेंगी। आइए, हम उन लोगों में से न बनें जो सत्य से मुँह मोड़ते हैं, बल्कि उन लोगों में से बनें जो हर निशानी पर गौर करते हैं और अपने रब की इबादत में लगे रहते हैं। अल्लाह हमें सत्य को स्वीकार करने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 44-48 — सूरा यासीन

44إِلَّا رَحْمَةً مِّنَّا وَمَتَاعًا إِلَىٰ حِينٍ
मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है
45وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّقُوا مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और जब उन कुफ्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए
46وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ آيَةٍ مِّنْ آيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे
47وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ قَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا أَنُطْعِمُ مَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ أَطْعَمَهُ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
और जब उन (कुफ्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खुदा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खुदा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख्याल के मुवाफ़िक़) खुदा चाहता तो उसको खुद खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो
48وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और कहते हैं कि (भला) अगर तुम लोग (अपने दावे में सच्चे हो) तो आख़िर ये (क़यामत का) वायदा कब पूरा होगा
यासीनकुरान सूची
83आयत
मक्कीअवतरण स्थान
46आयत

अनुवाद — यासीन 46

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Monday, September 28, 2026

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