यासीन · 45/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّقُوا مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ۝٤٥
Wa izaa qeela lahumuttaqoo maa baina aideekum wa maa khalfakum la`allakum turhamoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उन कुफ्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اتَّقُوا (अत्तक़ू): डरो, बचो, सावधान रहो।
  • مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ (मा बैना अयदीकुम): जो तुम्हारे सामने है, यानी आख़िरत के मामले और उसकी कठिनाइयाँ।
  • وَمَا خَلْفَكُمْ (वमा ख़ल्फ़कुम): जो तुम्हारे पीछे है, यानी दुनिया के मामले और उसके फ़ितने (परीक्षण)।
  • لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (लअल्लकुम तुरहमून): ताकि तुम पर रहम किया जाए, यानी अल्लाह की रहमत के हक़दार बनो।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन मुशरिकों (बहुदेववादियों) से कहा जाता है कि "उस चीज़ से डरो जो तुम्हारे सामने है"—यानी आख़िरत का दिन, उसके हौलनाक मंज़र, हिसाब की सख़्ती, जहन्नम का अज़ाब—और "उस चीज़ से भी डरो जो तुम्हारे पीछे है"—यानी दुनिया की ज़िंदगी, जो ग़ाफ़िल (लापरवाह) लोगों के लिए धोखे का सामान है, जिसमें लोग अपने अमल (कर्मों) से भटक जाते हैं और अल्लाह की नाफ़रमानी में डूब जाते हैं—तो वे इस नसीहत को कानों पर नहीं डालते। उन्हें कहा जाता है कि "ऐसा करो ताकि तुम पर रहम किया जाए"—यानी अल्लाह की रहमत तुम्हें ढक ले, वह तुम्हारे गुनाह माफ़ कर दे और तुम्हें जन्नत में दाख़िल कर दे—लेकिन वे इस दावत (पुकार) से मुँह मोड़ लेते हैं, उसे गंभीरता से नहीं लेते, और अपनी ज़िद और अहंकार में ही डूबे रहते हैं।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह का डर (तक़वा) ही वह चाबी है जो इंसान को दुनिया की फ़ितनों से बचाती है और आख़िरत की सख़्तियों से निजात दिलाती है। जो इंसान अल्लाह से डरता है, वह दुनिया में सही रास्ते पर चलता है और आख़िरत में अल्लाह की रहमत का हक़दार बनता है। यह नसीहत आज भी हमारे लिए है—हमें चाहिए कि जब हमें अच्छी बात कही जाए, तो उसे सुनें और उस पर अमल करें, क्योंकि यही हमारी भलाई का रास्ता है। अल्लाह की रहमत उन्हीं पर होती है जो उसके डर से अपनी ज़िंदगी को सँवारते हैं और उसकी इबादत में मशग़ूल रहते हैं।



📜 आयत 43-47 — यासीन

43وَإِن نَّشَأْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ يُنقَذُونَ
जिन पर ये लोग सवार हुआ करते हैं और अगर हम चाहें तो उन सब लोगों को डुबा मारें फिर न कोई उन का फरियाद रस होगा और न वह लोग छुटकारा ही पा सकते हैं
44إِلَّا رَحْمَةً مِّنَّا وَمَتَاعًا إِلَىٰ حِينٍ
मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है
45وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّقُوا مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और जब उन कुफ्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए
46وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ آيَةٍ مِّنْ آيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे
47وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ أَنفِقُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ قَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا أَنُطْعِمُ مَن لَّوْ يَشَاءُ اللَّهُ أَطْعَمَهُ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
और जब उन (कुफ्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खुदा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खुदा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख्याल के मुवाफ़िक़) खुदा चाहता तो उसको खुद खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो
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अनुवाद — यासीन 45

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Tuesday, August 18, 2026

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