अन-निसा · 28/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُخَفِّفَ عَنكُمْ ۚ وَخُلِقَ الْإِنسَانُ ضَعِيفًا ۝٢٨
Yureedul laahu ai yukhaffifa `ankum; wa khuliqal insaanu da`eefaa
📖 हिंदी अर्थ
करे और जो लोग नफ़सियानी ख्वाहिश के पीछे पडे हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग (राहे हक़ से) बहुत दूर हट जाओ और ख़ुदा चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُرِيدُ: चाहता है।
  • يُخَفِّفَ: हल्का करे, आसान बनाए।
  • ضَعِيفًا: कमज़ोर, निर्बल।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों पर असीम रहमत और मेहरबानी रखता है। वह अपने दीन को हमेशा आसान और सहज बनाता है, और उसने अपनी शरीअत में ऐसे आसान नियम बनाए हैं जो इंसान की ताकत और हैसियत के मुताबिक हैं। वह बंदों पर ऐसा कोई बोझ नहीं डालता जिसे वे उठा न सकें। यह इसलिए है क्योंकि अल्लाह इंसान की फ़ितरत को खूब जानता है—इंसान को कमज़ोर पैदा किया गया है। यह कमज़ोरी शारीरिक भी है और नैतिक भी: उसका बदन थकान और मुश्किलों को बर्दाश्त नहीं कर सकता, और उसका नफ्स शहवतों और ख्वाहिशों के आगे जल्दी झुक जाता है। इसी कमज़ोरी के मद्देनज़र अल्लाह ने अपने अहकाम में नरमी रखी है। मसलन, निकाह के मामले में जब आज़ाद औरत से निकाह की ताक़त न हो, तो दीनदार लौंडी से निकाह की इजाज़त दी गई, ताकि इंसान गुनाह में न पड़े। इसी तरह रोज़े, नमाज़ और दूसरे फ़राइज़ में भी बीमारी, सफर और मजबूरी की हालत में छूट दी गई है। यह सब अल्लाह की रहमत का तकाज़ा है कि वह अपने बंदों से आसानी का बर्ताव करे, सख्ती का नहीं।

फ़ायदे (सबक):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इस्लाम आसानी और नरमी का दीन है। अल्लाह ने किसी भी बंदे पर वह बोझ नहीं डाला जो उसकी ताकत से बाहर हो। इसलिए हमें दीन को सख्ती और मुश्किल से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसकी आसानियों को अपनाना चाहिए।
  2. इंसान की कमज़ोरी का एहसास हमें अल्लाह के सामने अक्सर झुकना और उससे मदद मांगना सिखाता है। जब हम जानते हैं कि हम कमज़ोर हैं, तो हमें अपनी ताकत पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
  3. अल्लाह की रहमत की कोई हद नहीं है। वह नहीं चाहता कि उसके बंदे दीन में मुश्किल में पड़ें। यह बात हमारे दिलों में अल्लाह की मुहब्बत पैदा करती है और हमें उसकी इबादत की तरफ रागिब करती है।
  4. हमें अपनी कमज़ोरियों का इलाज शरीअत के आसान रास्तों से करना चाहिए, न कि गुनाह और हराम की तरफ भागना चाहिए। अल्लाह ने हर मुश्किल में हलाल का रास्ता निकाल दिया है।


📜 आयत 26-30 — अन-निसा

26يُرِيدُ اللَّهُ لِيُبَيِّنَ لَكُمْ وَيَهْدِيَكُمْ سُنَنَ الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ وَيَتُوبَ عَلَيْكُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
ख़ुदा तो ये चाहता है कि (अपने) एहकाम तुम लोगों से साफ़ साफ़ बयान कर दे और जो (अच्छे) लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनके तरीक़े पर चला दे और तुम्हारी तौबा कुबूल करे और ख़ुदा तो (हर चीज़ से) वाक़िफ़ और हिकमत वाला है
27وَاللَّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيْكُمْ وَيُرِيدُ الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الشَّهَوَاتِ أَن تَمِيلُوا مَيْلًا عَظِيمًا
और ख़ुदा तो चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़ुबूल
28يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُخَفِّفَ عَنكُمْ ۚ وَخُلِقَ الْإِنسَانُ ضَعِيفًا
करे और जो लोग नफ़सियानी ख्वाहिश के पीछे पडे हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग (राहे हक़ से) बहुत दूर हट जाओ और ख़ुदा चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है
29يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُم بَيْنَكُم بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَن تَكُونَ تِجَارَةً عَن تَرَاضٍ مِّنكُمْ ۚ وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا
ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन (हॉ) तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो (और उसमें एक दूसरे का माल हो तो मुज़ाएक़ा नहीं) और अपना गला आप घूंट के अपनी जान न दो (क्योंकि) ख़ुदा तो ज़रूर तुम्हारे हाल पर मेहरबान है
30وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ عُدْوَانًا وَظُلْمًا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और जो शख्स जोरो ज़ुल्म से नाहक़ ऐसा करेगा (ख़ुदकुशी करेगा) तो (याद रहे कि) हम बहुत जल्द उसको जहन्नुम की आग में झोंक देंगे यह ख़ुदा के लिये आसान है
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अनुवाद — अन-निसा 28

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Tuesday, August 18, 2026

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