Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- فَلَا وَرَبِّكَ – नहीं, तुम्हारे रब की क़सम!
- يُحَكِّمُوكَ – आपको हक़म (निर्णायक) बनाएँ
- شَجَرَ – झगड़ा हुआ, विवाद हुआ
- حَرَجًا – तंगी, संकोच, दिल में कोई गुंजाइश या नाराज़गी
- قَضَيْتَ – आपने फ़ैसला किया
- يُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا – पूरी तरह से सर झुकाकर आज्ञाकारी हों
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपनी क़सम खाकर फ़रमा रहा है कि ऐ मेरे नबी! आपके पास जो लोग आते हैं और दावा करते हैं कि हम ईमान लाए हैं, वे वास्तव में मोमिन नहीं हैं, जब तक कि वे आपको अपने हर झगड़े और विवाद में हक़म न बनाएँ। यानी जब उनमें कोई मामला पेश आए, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, तो वे आपके पास आएँ और आपके फ़ैसले को बिना किसी हिचकिचाहट के मान लें।
यह सिर्फ़ आपकी ज़िंदगी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आपके बाद आपकी सुन्नत और आपके लाए हुए क़ुरआन को भी हर मामले में मरजा (संदर्भ) बनाना होगा। फिर अल्लाह फ़रमाता है कि उनके दिलों में आपके फ़ैसले के बारे में कोई तंगी, कोई नाराज़गी, कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। और सबसे बड़ी शर्त यह कि वे पूरी तरह से, खुशी-खुशी, अपने दिल और दिमाग़ से उस फ़ैसले के आगे सर झुका दें।
यह ईमान की असली पहचान है — कि इंसान का दिल, उसकी ज़ुबान और उसके अमल तीनों अल्लाह और उसके रसूल के हुक्म के सामने पूरी तरह से समर्पित हों। जिस व्यक्ति के दिल में रसूलुल्लाह ﷺ के फ़ैसले के खिलाफ़ कोई बात हो, या वह उसे मानने में झिझक महसूस करे, तो समझ लीजिए कि उसका ईमान अधूरा है।
प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी का हर पहलू — चाहे वह घर का मामला हो, व्यापार का, शादी-तलाक़ का, या समाज का कोई भी विवाद — सब कुछ क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार ही तय होना चाहिए। जब हम किसी मसले में उलझन में पड़ें, तो सबसे पहले अल्लाह की किताब और रसूल ﷺ की सुन्नत की तरफ़ रुजू करें। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।
और देखिए, अल्लाह ने कितनी प्यारी बात कही — "और वे पूरी तरह से सर झुका दें।" यानी सिर्फ़ ज़ुबान से "हाँ, ठीक है" कहना काफ़ी नहीं, बल्कि दिल से, पूरी रज़ामंदी के साथ, बिना किसी दबाव के उसे क़बूल करना है। यही वह मक़ाम है जहाँ इंसान को सुकून मिलता है, क्योंकि जब इंसान अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले पर भरोसा कर लेता है, तो उसका दिल हर तरह की परेशानी से आज़ाद हो जाता है।
आओ, हम सब अपनी ज़िंदगी में इस आयत को अपनाएँ, और हर मामले में रसूलुल्लाह ﷺ के फ़ैसले को दिल से क़बूल करें। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है। अल्लाह हमें इसकी तौफ़ीक़ दे। आमीन।
📜 आयत 63-67 — सूरा अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 65
सूरा अन-निसा आयत 65 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : पस (ऐ रसूल) तुम्हारे परवरदिगार की क़सम ये लोग सच्चे…सूरा आयत 65/176 — सूरा अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-निसा सुनें, सूरा अन-निसा अनुवाद, सूरा अन-निसा mp3, सूरा अन-निसा pdf. आयत 63–67. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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