ग़ाफिर · 60/85
अनुवाद उच्चारण — ग़ाफिर
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ ۝٦٠
Wa qaala Rabbukumud `ooneee astajib lakum; innal lazeena yastakbiroona an `ibaadatee sa yadkhuloona jahannama daakhireen
📖 हिंदी अर्थ
और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं माँगों मैं तुम्हारी (दुआ) क़ुबूल करूँगा जो लोग हमारी इबादत से अकड़ते हैं वह अनक़रीब ही ज़लील व ख्वार हो कर यक़ीनन जहन्नुम वासिल होंगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ادْعُونِي — मुझे पुकारो, मेरी इबादत करो, मुझसे माँगो।
  • أَسْتَجِبْ لَكُمْ — मैं तुम्हारी पुकार सुनूँगा, तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा।
  • يَسْتَكْبِرُونَ — घमंड करते हैं, अहंकार करते हैं।
  • عَنْ عِبَادَتِي — मेरी इबादत से (मुझे अकेला पूजने से)।
  • دَاخِرِينَ — अपमानित, ज़लील, छोटे होकर।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला अपने बंदों से बड़ी मुहब्बत और करम के साथ फ़रमा रहा है: "मेरे बंदो! मुझे पुकारो, मुझसे दुआ करो, मुझी से माँगो। मैं तुम्हारी दुआ सुनने और क़बूल करने के लिए तैयार हूँ।" यह अल्लाह का बेपनाह फज़ल है कि उसने अपने बंदों को खुद बुलाया है कि वे उससे माँगें। वह कहता है: "मुझसे माँगो, मैं दूँगा। मुझे पुकारो, मैं सुनूँगा।" यह कितनी बड़ी ख़ुशख़बरी है! जो बंदा अल्लाह की तरफ रुजू करता है, उसकी दुआ कभी बेकार नहीं जाती। अल्लाह या तो उसे वही देता है जो वह माँगता है, या उससे बेहतर उसके हक में फ़ैसला करता है, या उसकी दुआ को उसकी आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया बना देता है।

लेकिन इसके बाद अल्लाह ने एक सख़्त चेतावनी भी दी: "जो लोग मेरी इबादत से घमंड करते हैं, मुझे पुकारने से अहंकार करते हैं, वह क़यामत के दिन ज़लील और अपमानित होकर जहन्नम में दाखिल होंगे।" यानी जो लोग अल्लाह की इबादत को अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं, या अपनी ज़रूरत ही महसूस नहीं करते, वह उस दिन बड़ी रुसवाई के साथ जहन्नम की आग में झोंके जाएँगे। आज वह अल्लाह के सामने सजदा करने में शर्म महसूस करते हैं, कल वहीं सिर झुकाकर ज़लील होंगे।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें दो चीज़ें सिखाती है: पहली, हमें हर हाल में अल्लाह से जुड़े रहना चाहिए। दुआ हमारी इबादत की रूह है। जब हम अल्लाह से माँगते हैं, तो हम अपनी कमज़ोरी और उसकी ताक़त का इक़रार करते हैं। दूसरी, हमें कभी भी अल्लाह की इबादत से शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। नमाज़, दुआ, ज़िक्र — यह सब हमारी इज़्ज़त है, रुसवाई नहीं। जो लोग इनसे दूर भागते हैं, वह असल में अपनी ही रुसवाई की तरफ भाग रहे हैं।

आओ, हम आज ही अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत से रौशन करें। उससे दुआ करें, उससे माँगें, उसी पर भरोसा रखें। यक़ीनन, वह सुनने वाला, क़बूल करने वाला और बड़ा करम करने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 58-62 — ग़ाफिर

58وَمَا يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَلَا الْمُسِيءُ ۚ قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ
और अंधा और ऑंख वाला (दोनों) बराबर नहीं हो सकते और न मोमिनीन जिन्होने अच्छे काम किए और न बदकार (ही) बराबर हो सकते हैं बात ये है कि तुम लोग बहुत कम ग़ौर करते हो, कयामत तो ज़रूर आने वाली है
59إِنَّ السَّاعَةَ لَآتِيَةٌ لَّا رَيْبَ فِيهَا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ
इसमें किसी तरह का शक नहीं मगर अक्सर लोग (इस पर भी) ईमान नहीं रखते
60وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ
और तुम्हारा परवरदिगार इरशाद फ़रमाता है कि तुम मुझसे दुआएं माँगों मैं तुम्हारी (दुआ) क़ुबूल करूँगा जो लोग हमारी इबादत से अकड़ते हैं वह अनक़रीब ही ज़लील व ख्वार हो कर यक़ीनन जहन्नुम वासिल होंगे
61اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ख़ुदा ही तो है जिसने तुम्हारे वास्ते रात बनाई ताकि तुम उसमें आराम करो और दिन को रौशन (बनाया) तकि काम करो बेशक ख़ुदा लोगों परा बड़ा फज़ल व करम वाला है, मगर अक्सर लोग उसका शुक्र नहीं अदा करते
62ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
यही ख़ुदा तुम्हारा परवरदिगार है जो हर चीज़ का ख़ालिक़ है, और उसके सिवा कोई माबूद नहीं, फिर तुम कहाँ बहके जा रहे हो
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अनुवाद — ग़ाफिर 60

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Tuesday, August 18, 2026

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