अल-माइदा · 8/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ ۝٨
Yaaa aiyuhal lazeena aamaanoo koonoo qawwaa meena lillaahi shuhadaaa`a bilqist, wa laa yajrimannakum shana aanu qawmin `alaaa allaa ta`diloo; i`diloo; huwa aqrabu littaqwaa wattaqul laah; innal laaha khabeerum bimaa ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा (की ख़ुशनूदी) के लिए इन्साफ़ के साथ गवाही देने के लिए तैयार रहो और तुम्हें किसी क़बीले की अदावत इस जुर्म में न फॅसवा दे कि तुम नाइन्साफी करने लगो (ख़बरदार बल्कि) तुम (हर हाल में) इन्साफ़ करो यही परहेज़गारी से बहुत क़रीब है और ख़ुदा से डरो क्योंकि जो कुछ तुम करते हो (अच्छा या बुरा) ख़ुदा उसे ज़रूर जानता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • قَوَّامِينَ: अर्थात सदैव क़ायम रहने वाले, हर हाल में अडिग रहने वाले।
  • شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ: न्याय और इंसाफ़ पर गवाह बनने वाले।
  • لَا يَجْرِمَنَّكُمْ: तुम्हें कभी प्रेरित न करे, तुम पर हावी न हो।
  • شَنَآنُ: किसी से दुश्मनी, नफ़रत, या बैर।
  • أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى: परहेज़गारी और अल्लाह के डर के अधिक निकट।

तफ़सीर:

ऐ ईमान लाने वालों! तुम अल्लाह के लिए सदैव सत्य और न्याय पर क़ायम रहने वाले बनो। तुम्हारा उद्देश्य केवल अल्लाह की रज़ा और उसका प्रतिफल होना चाहिए, न कि कोई सांसारिक लाभ। तुम न्याय के साथ गवाही दो — चाहे वह गवाही तुम्हारे अपने विरुद्ध ही क्यों न हो, या तुम्हारे माता-पिता और रिश्तेदारों के विरुद्ध। न्याय को कभी अपने स्वार्थ या भावनाओं से प्रभावित न होने दो।

फिर अल्लाह तआला एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात सिखाता है: किसी क़ौम या समुदाय के प्रति तुम्हारी नफ़रत और दुश्मनी तुम्हें कभी न्याय छोड़ने पर मजबूर न करे। यानी जिससे तुम्हारा बैर हो, उसके साथ भी पूरा इंसाफ़ करो। नफ़रत कभी तुम्हारे फ़ैसले को ख़राब न करे, और न ही तुम्हें सच बोलने से रोके। यह एक बहुत बड़ी परीक्षा है — कि इंसान अपने दुश्मन के साथ भी न्याय करे।

अल्लाह तआला स्पष्ट आदेश देता है: "न्याय करो!" यह न्याय सभी के साथ समान रूप से हो — चाहे वह मित्र हो या शत्रु। यही न्याय परहेज़गारी के अधिक निकट है। जब तुम न्याय करोगे, तो तुम्हारे दिल में अल्लाह का डर और बढ़ेगा, और तुम गुनाहों से बचते रहोगे। जो व्यक्ति न्याय छोड़ता है, वह अल्लाह की नाराज़गी के करीब पहुँचता है।

अंत में अल्लाह तआला डराता है: "अल्लाह से डरो!" यानी उसके आदेशों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो। निश्चय ही अल्लाह उन सब कामों से पूरी तरह अवगत है जो तुम करते हो — कोई छोटा या बड़ा काम उससे छिपा नहीं है। वह तुम्हें तुम्हारे सभी कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा।


दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम न्याय और इंसाफ़ का धर्म है। अल्लाह तआला ने हमें आदेश दिया है कि हम हर हाल में न्याय करें — चाहे हमारी भावनाएँ हमें किसी और ओर ले जाएँ। यही वह उच्च चरित्र है जो इस्लाम ने अपने अनुयायियों को दिया है। जब एक मुसलमान अपने दुश्मन के साथ भी न्याय करता है, तो यह उसके ईमान की सच्चाई का प्रमाण है। यही वह सुंदरता है जो लोगों को इस्लाम की ओर आकर्षित करती है। आइए हम इस आयत पर अमल करें और अपने जीवन को न्याय, सच्चाई और परहेज़गारी का प्रतीक बनाएँ — ताकि हम अल्लाह की रहमत और उसकी जन्नत के हक़दार बन सकें।



📜 आयत 6-10 — सूरा अल-माइदा

6يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قُمْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ فَاغْسِلُوا وُجُوهَكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ إِلَى الْمَرَافِقِ وَامْسَحُوا بِرُءُوسِكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ إِلَى الْكَعْبَيْنِ ۚ وَإِن كُنتُمْ جُنُبًا فَاطَّهَّرُوا ۚ وَإِن كُنتُم مَّرْضَىٰ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَاءَ أَحَدٌ مِّنكُم مِّنَ الْغَائِطِ أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا فَامْسَحُوا بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُم مِّنْهُ ۚ مَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيَجْعَلَ عَلَيْكُم مِّنْ حَرَجٍ وَلَٰكِن يُرِيدُ لِيُطَهِّرَكُمْ وَلِيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
ऐ ईमानदारों जब तुम नमाज़ के लिये आमादा हो तो अपने मुंह और कोहनियों तक हाथ धो लिया करो और अपने सरों का और टखनों तक पॉवों का मसाह कर लिया करो और अगर तुम हालते जनाबत में हो तो तुम तहारत (ग़ुस्ल) कर लो (हॉ) और अगर तुम बीमार हो या सफ़र में हो या तुममें से किसी को पैख़ाना निकल आए या औरतों से हमबिस्तरी की हो और तुमको पानी न मिल सके तो पाक ख़ाक से तैमूम कर लो यानि (दोनों हाथ मारकर) उससे अपने मुंह और अपने हाथों का मसा कर लो (देखो तो ख़ुदा ने कैसी आसानी कर दी) ख़ुदा तो ये चाहता ही नहीं कि तुम पर किसी तरह की तंगी करे बल्कि वो ये चाहता है कि पाक व पाकीज़ा कर दे और तुमपर अपनी नेअमते पूरी कर दे ताकि तुम शुक्रगुज़ार बन जाओ
7وَاذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمِيثَاقَهُ الَّذِي وَاثَقَكُم بِهِ إِذْ قُلْتُمْ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
और जो एहसानात ख़ुदा ने तुमपर किए हैं उनको और उस (एहद व पैमान) को याद करो जिसका तुमसे पक्का इक़रार ले चुका है जब तुमने कहा था कि हमने (एहकामे ख़ुदा को) सुना और दिल से मान लिया और ख़ुदा से डरते रहो क्योंकि इसमें ज़रा भी शक नहीं कि ख़ुदा दिलों के राज़ से भी बाख़बर है
8يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा (की ख़ुशनूदी) के लिए इन्साफ़ के साथ गवाही देने के लिए तैयार रहो और तुम्हें किसी क़बीले की अदावत इस जुर्म में न फॅसवा दे कि तुम नाइन्साफी करने लगो (ख़बरदार बल्कि) तुम (हर हाल में) इन्साफ़ करो यही परहेज़गारी से बहुत क़रीब है और ख़ुदा से डरो क्योंकि जो कुछ तुम करते हो (अच्छा या बुरा) ख़ुदा उसे ज़रूर जानता है
9وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ۙ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए ख़ुदा ने वायदा किया है कि उनके लिए (आख़िरत में) मग़फेरत और बड़ा सवाब है
10وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया वह जहन्नुमी हैं (
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीअवतरण स्थान
8आयत

अनुवाद — अल-माइदा 8

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Wednesday, September 30, 2026

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