अज़-ज़ारियात · 18/60
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ारियात
وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ ۝١٨
Wa bilashaari hum yastaghfiroon
📖 हिंदी अर्थ
और पिछले पहर को अपनी मग़फ़िरत की दुआएं करते थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • بِالْأَسْحَارِ: "सहर" का बहुवचन, अर्थात रात के आखिरी हिस्से, सुबह सादिक़ से पहले का समय।
  • يَسْتَغْفِرُونَ: अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते हैं।

तफ़सीर:

यह आयत उन नेक लोगों का ज़िक्र कर रही है जिन्हें अल्लाह ने अपनी रहमत से नवाज़ा है। ये वो लोग हैं जो रात को कम सोते हैं और अल्लाह की इबादत में बिताते हैं। उनकी एक खास आदत यह है कि वे रात के आखिरी हिस्से में, यानी सहर के वक्त, उठकर अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते हैं। यह वह समय होता है जब अल्लाह अपने बंदों के बहुत करीब होता है, दुआएँ क़ुबूल करता है और अपनी रहमत के दरवाज़े खोल देता है।

सहर का यह वक्त बहुत ही बरकत वाला है। इसी वक्त अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाता है और पुकारता है: "कोई है जो मुझसे माफ़ी माँगे, तो मैं उसे माफ़ कर दूँ? कोई है जो दुआ करे, तो मैं उसे अता करूँ?" यही वह समय है जब दिल साफ़ होते हैं, दुनिया के शोर-ग़ुल से दूर होकर इंसान अपने रब के सामने सजदे में झुकता है और अपनी कमज़ोरियों, गुनाहों और ख़ताओं का इज़हार करता है।

यह आयत हमें सिखाती है कि सिर्फ़ इबादत करना ही काफ़ी नहीं, बल्कि इबादत के साथ-साथ अपने गुनाहों से तौबा करना और अल्लाह से माफ़ी माँगना भी ज़रूरी है। इंसान जितना बड़ा गुनाहगार हो, अल्लाह की रहमत उससे कहीं बड़ी है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "ऐ मेरे बंदों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया है, अल्लाह की रहमत से निराश मत होना। बेशक अल्लाह सारे गुनाह माफ़ कर देता है।"

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें भी अपनी ज़िंदगी में सहर के वक्त को ग़नीमत समझना चाहिए। यह वक्त दुआओं की क़बूलियत का है, रहमतों के नुज़ूल का है और गुनाहों की माफ़ी का है। जो इंसान इस वक्त उठकर अल्लाह से माफ़ी माँगता है, उसके लिए अल्लाह के यहाँ बड़ा अज्र और इनाम है। यही वो लोग हैं जिनके बारे में अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया कि वे जन्नत के हक़दार हैं और उनके लिए हर तरह की खुशियाँ और रहमतें तैयार हैं।

आओ, हम भी अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा इस पाक वक्त के लिए निकालें, ताकि हम भी उन नेक बंदों में शामिल हो सकें जिनके बारे में अल्लाह ने यह आयत नाज़िल की है। यह वक्त हमारे लिए अल्लाह की तरफ से एक तोहफ़ा है, जिसे गंवाना बड़ी नुक़सान की बात है।



📜 आयत 16-20 — सूरा अज़-ज़ारियात

16آخِذِينَ مَا آتَاهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ
जो उनका परवरदिगार उन्हें अता करता है ये (ख़ुश ख़ुश) ले रहे हैं ये लोग इससे पहले (दुनिया में) नेको कार थे
17كَانُوا قَلِيلًا مِّنَ اللَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ
(इबादत की वजह से) रात को बहुत ही कम सोते थे
18وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
और पिछले पहर को अपनी मग़फ़िरत की दुआएं करते थे
19وَفِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ
और उनके माल में माँगने वाले और न माँगने वाले (दोनों) का हिस्सा था
20وَفِي الْأَرْضِ آيَاتٌ لِّلْمُوقِنِينَ
और यक़ीन करने वालों के लिए ज़मीन में (क़ुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
अज़-ज़ारियातकुरान सूची
60आयत
मक्कीअवतरण स्थान
18आयत

अनुवाद — अज़-ज़ारियात 18

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Saturday, October 3, 2026

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