अज़-ज़ारियात · 17/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
كَانُوا قَلِيلًا مِّنَ اللَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ ۝١٧
kaanoo qaleelam minal laili maa yahja`oon
📖 हिंदी अर्थ
(इबादत की वजह से) रात को बहुत ही कम सोते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • क़लीलन मिनल-लैल – रात का थोड़ा सा हिस्सा
  • मा यहजऊन – वे सोते नहीं थे (यानी बहुत कम सोते थे)

तफ़सीर:

यह आयत उन नेक और परहेज़गार बंदों की विशेषता बयान कर रही है जिन्हें अल्लाह ने अपनी रहमत से नवाज़ा है। ये वे लोग हैं जो रातों को जागकर इबादत करते हैं, अल्लाह से मुनाजात करते हैं और उसकी तारीफ़ में मशगूल रहते हैं। वे रात के केवल थोड़े से हिस्से में आराम के लिए सोते हैं, बाकी रात का अधिकांश समय नमाज़, ज़िक्र और दुआ में गुज़ारते हैं। उनकी नींद भी इबादत से भरी होती है, क्योंकि वे सोने से पहले और बाद में अल्लाह को याद करते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि रात की इबादत का बहुत बड़ा फ़ज़ीलत है। जब दुनिया वालों की आँखें नींद में होती हैं, तब ये नेक लोग अपने रब के सामने सजदे में होते हैं। अल्लाह तआला ऐसे बंदों से बेहद मुहब्बत करता है और उन्हें जन्नत की नेमतों से नवाज़ता है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें भी अपनी रातों में से कुछ हिस्सा अल्लाह की इबादत के लिए निकालना चाहिए। चाहे थोड़ी सी ही नमाज़ हो या ज़िक्र हो, लेकिन रात की इबादत की आदत डालनी चाहिए। यह हमारे दिलों को साफ़ करती है, हमारे गुनाहों को माफ़ करवाती है और हमें अल्लाह के करीब लाती है। रात की तन्हाई में की गई दुआएँ क़ुबूल होती हैं, ख़ासकर आख़िरी रात के हिस्से में जब अल्लाह अपने बंदों से पूछता है: "कौन है जो मुझसे माफ़ी माँगे, तो मैं उसे माफ़ कर दूँ?"

अल्लाह हमें भी उन नेक बंदों में शामिल करे जो रातों को जागकर उसकी इबादत करते हैं और उससे माफ़ी माँगते हैं। आमीन।



📜 आयत 15-19 — अज़-ज़ारियात

15إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ
बेशक परहेज़गार लोग (बेहिश्त के) बाग़ों और चश्मों में (ऐश करते) होगें
16آخِذِينَ مَا آتَاهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ
जो उनका परवरदिगार उन्हें अता करता है ये (ख़ुश ख़ुश) ले रहे हैं ये लोग इससे पहले (दुनिया में) नेको कार थे
17كَانُوا قَلِيلًا مِّنَ اللَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ
(इबादत की वजह से) रात को बहुत ही कम सोते थे
18وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
और पिछले पहर को अपनी मग़फ़िरत की दुआएं करते थे
19وَفِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ
और उनके माल में माँगने वाले और न माँगने वाले (दोनों) का हिस्सा था
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 17

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Tuesday, August 18, 2026

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