अज़-ज़ारियात · 31/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
۞ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ ۝٣١
Qaala famaa khatbukum ayyuhal mursaloon
📖 हिंदी अर्थ
तब इबराहीम ने पूछा कि (ऐ ख़ुदा के) भेजे हुए फरिश्तों आख़िर तुम्हें क्या मुहिम दर पेश है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَطْبُكُمْ (ख़त्बुकुम): तुम्हारा महत्वपूर्ण मामला, वह बड़ा कार्य जिसके लिए तुम आए हो।
  • الْمُرْسَلُونَ (अल-मुरसलून): भेजे गए फ़रिश्ते।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने देखा कि ये मेहमान फ़रिश्ते हैं और वे खाना नहीं खा रहे हैं, और उन्होंने पहले ही उन्हें सलाम किया था और उनका स्वागत किया था, तो उन्होंने उनसे पूछा: "ऐ अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्तों! तुम्हारा महत्वपूर्ण मामला क्या है? तुम किस कार्य के लिए भेजे गए हो?"

यह प्रश्न उन्होंने इसलिए किया क्योंकि फ़रिश्तों का आना किसी साधारण बात के लिए नहीं होता। वे हमेशा किसी महत्वपूर्ण आदेश या बड़ी घटना के साथ आते हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने अतिथियों का सम्मान कर चुके थे, और अब वे जानना चाहते थे कि उनके आने का असली उद्देश्य क्या है।

फ़रिश्तों ने उत्तर दिया: "हम तो उन लोगों की ओर भेजे गए हैं जो अपराधी हैं, अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाले हैं। हम उन्हें पक्की मिट्टी के पत्थरों से हलाक करने के लिए आए हैं, जो तुम्हारे रब की ओर से निशान लगाए हुए हैं, उन हद से गुज़र जाने वालों के लिए तैयार किए गए हैं।"

यह वाक्य हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए एक बड़ी ख़बर थी, क्योंकि उन्हें यह भी पता चला कि उनकी दुआ और उनके भतीजे हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम पर अल्लाह का अज़ाब आने वाला है। यह घटना हमें सिखाती है कि अल्लाह के फ़रिश्ते हमेशा उसके आदेश पर चलते हैं, और अल्लाह की ओर से जो भी फ़ैसला आता है, वह उसकी हिकमत और इंसाफ़ पर आधारित होता है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि हमें हमेशा अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए, लेकिन साथ ही उसके अज़ाब से भी डरना चाहिए। अल्लाह अपने नेक बंदों की इज़्ज़त करता है और उन्हें अपने फ़रिश्तों के ज़रिए ख़बरें देता है। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में नेकी अपनाएं और अल्लाह की नाफ़रमानी से बचें, ताकि हम उसकी रहमत के हक़दार बनें और उसके अज़ाब से महफ़ूज़ रहें।



📜 आयत 29-33 — अज़-ज़ारियात

29فَأَقْبَلَتِ امْرَأَتُهُ فِي صَرَّةٍ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌ
तो (ये सुनते ही) इबराहीम की बीवी (सारा) चिल्लाती हुई उनके सामने आयीं और अपना मुँह पीट लिया कहने लगीं (ऐ है) एक तो (मैं) बुढ़िया (उस पर) बांझ
30قَالُوا كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُ هُوَ الْحَكِيمُ الْعَلِيمُ
लड़का क्यों कर होगा फ़रिश्ते बोले तुम्हारे परवरदिगार ने यूँ ही फरमाया है वह बेशक हिकमत वाला वाक़िफ़कार है
31۞ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ
तब इबराहीम ने पूछा कि (ऐ ख़ुदा के) भेजे हुए फरिश्तों आख़िर तुम्हें क्या मुहिम दर पेश है
32قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمٍ مُّجْرِمِينَ
वह बोले हम तो गुनाहगारों (क़ौमे लूत) की तरफ भेजे गए हैं
33لِنُرْسِلَ عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِّن طِينٍ
ताकि उन पर मिटटी के पथरीले खरन्जे बरसाएँ
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 31

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Tuesday, August 18, 2026

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