अल-हदीद · 18/29
अनुवाद उच्चारण — अल-हदीद
إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ ۝١٨
Innal mussaddiqeena wal mussaddiqaati wa aqradul laaha qardan hassanany yudaa`afu lahum wa lahum ajrun kareem
📖 हिंदी अर्थ
बेशक ख़ैरात देने वाले मर्द और ख़ैरात देने वाली औरतें और (जो लोग) ख़ुदा की नीयत से ख़ालिस कर्ज़ देते हैं उनको दोगुना (अज्र) दिया जाएगा और उनका बहुत मुअज़िज़ सिला (जन्नत) तो है ही

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • المُصَّدِّقِينَ / المُصَّدِّقَاتِ: यानी सच्चे दिल से दान देने वाले पुरुष और दान देने वाली स्त्रियाँ। (मूल शब्द "المتصدقين" है, जिसमें ता को साद में मिला दिया गया है)
  • قَرْضًا حَسَنًا: अच्छा कर्ज़, यानी वह खर्च जो अल्लाह की राह में खुशी और साफ़ दिल से किया जाए, बिना किसी एहसान जताए और बिना किसी नुक़्सान के।
  • يُضَاعَفُ: कई गुना बढ़ा दिया जाता है।
  • أَجْرٌ كَرِيمٌ: बड़ा सम्मानित और उदार बदला, यानी जन्नत।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने उन बंदों की तारीफ़ कर रहा है जो अपने माल में से अल्लाह की राह में खर्च करते हैं — चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ। यहाँ अल्लाह ने "क़र्ज़-ए-हसन" (अच्छा कर्ज़) का शब्द इस्तेमाल किया है, जो बहुत ही प्यारा और दिल को छूने वाला है। यानी अल्लाह अपने बंदों से कह रहा है: "जो कुछ तुम मेरी राह में खर्च करते हो, वह मुझे कर्ज़ है, और मैं उसे लौटाने वाला हूँ — बल्कि कई गुना बढ़ाकर लौटाने वाला हूँ।" यह अल्लाह की बहुत बड़ी मेहरबानी है कि वह अपने बंदों को यह शरीफ़ और इज़्ज़त वाला मौक़ा देता है कि वे उसे कर्ज़ दें!

इस "क़र्ज़-ए-हसन" की शर्तें ये हैं: दिल की खुशी के साथ देना, नियत सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए हो, और जिसे दिया जाए वह सच में ज़रूरतमंद हो। साथ ही दान देने के बाद न तो एहसान जताया जाए और न ही किसी को तकलीफ़ पहुँचाई जाए।

अल्लाह ने वादा किया है कि ऐसे लोगों का सवाब कई गुना बढ़ाया जाएगा — एक नेकी का बदला दस गुना से लेकर सात सौ गुना तक, और अल्लाह चाहे तो उससे भी कहीं ज़्यादा। और इस सब के ऊपर उनके लिए एक और बड़ी चीज़ है — "अजरुन करीम" यानी जन्नत, जो अल्लाह की तरफ़ से सबसे बड़ा और सबसे इज़्ज़त वाला इनाम है।

यह आयत हमें सिखाती है कि दान देना कोई नुक़्सान नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के साथ एक नफ़ा वाला सौदा है। जो जितना खर्च करता है, अल्लाह उसे उतना ही नहीं, बल्कि कहीं ज़्यादा लौटाता है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने माल में से अल्लाह की राह में खर्च करने की आदत डालें, चाहे कितनी ही कम मात्रा में ही क्यों न हो। अल्लाह छोटे से छोटे दान को भी कबूल करता है और उसे बड़ा बना देता है।

याद रखिए, यह दुनिया की दौलत तो एक दिन ख़त्म हो जाने वाली है, लेकिन अल्लाह की राह में खर्च किया हुआ माल वही असली पूँजी है जो हमारे आगे के सफ़र में काम आएगी। अल्लाह हम सबको इस नेक काम की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 16-20 — अल-हदीद

16۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
क्या ईमानदारों के लिए अभी तक इसका वक्त नहीं आया कि ख़ुदा की याद और क़ुरान के लिए जो (ख़ुदा की तरफ से) नाज़िल हुआ है उनके दिल नरम हों और वह उन लोगों के से न हो जाएँ जिनको उन से पहले किताब (तौरेत, इन्जील) दी गयी थी तो (जब) एक ज़माना दराज़ गुज़र गया तो उनके दिल सख्त हो गए और इनमें से बहुतेरे बदकार हैं
17اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
जान रखो कि ख़ुदा ही ज़मीन को उसके मरने (उफ़तादा होने) के बाद ज़िन्दा (आबाद) करता है हमने तुमसे अपनी (क़ुदरत की) निशानियाँ खोल खोल कर बयान कर दी हैं ताकि तुम समझो
18إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ
बेशक ख़ैरात देने वाले मर्द और ख़ैरात देने वाली औरतें और (जो लोग) ख़ुदा की नीयत से ख़ालिस कर्ज़ देते हैं उनको दोगुना (अज्र) दिया जाएगा और उनका बहुत मुअज़िज़ सिला (जन्नत) तो है ही
19وَالَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ أُولَٰئِكَ هُمُ الصِّدِّيقُونَ ۖ وَالشُّهَدَاءُ عِندَ رَبِّهِمْ لَهُمْ أَجْرُهُمْ وَنُورُهُمْ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
और जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों पर ईमान लाए यही लोग अपने परवरदिगार के नज़दीक सिद्दीक़ों और शहीदों के दरजे में होंगे उनके लिए उन्ही (सिद्दीकों और शहीदों) का अज्र और उन्हीं का नूर होगा और जिन लोगों ने कुफ्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया वही लोग जहन्नुमी हैं
20اعْلَمُوا أَنَّمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا لَعِبٌ وَلَهْوٌ وَزِينَةٌ وَتَفَاخُرٌ بَيْنَكُمْ وَتَكَاثُرٌ فِي الْأَمْوَالِ وَالْأَوْلَادِ ۖ كَمَثَلِ غَيْثٍ أَعْجَبَ الْكُفَّارَ نَبَاتُهُ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَاهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَكُونُ حُطَامًا ۖ وَفِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ شَدِيدٌ وَمَغْفِرَةٌ مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانٌ ۚ وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا مَتَاعُ الْغُرُورِ
जान रखो कि दुनियावी ज़िन्दगी महज़ खेल और तमाशा और ज़ाहिरी ज़ीनत (व आसाइश) और आपस में एक दूसरे पर फ़ख्र क़रना और माल और औलाद की एक दूसरे से ज्यादा ख्वाहिश है (दुनयावी ज़िन्दगी की मिसाल तो) बारिश की सी मिसाल है जिस (की वजह) से किसानों की खेती (लहलहाती और) उनको ख़ुश कर देती थी फिर सूख जाती है तो तू उसको देखता है कि ज़र्द हो जाती है फिर चूर चूर हो जाती है और आख़िरत में (कुफ्फार के लिए) सख्त अज़ाब है और (मोमिनों के लिए) ख़ुदा की तरफ से बख़्शिस और ख़ुशनूदी और दुनयावी ज़िन्दगी तो बस फ़रेब का साज़ो सामान है
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अनुवाद — अल-हदीद 18

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Tuesday, August 18, 2026

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