अल-अनआम · 68/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آيَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ ۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ الشَّيْطَانُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَىٰ مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ۝٦٨
Wa izaa ra aital lazeena yakhoodoona feee Aayaatinaa fa a`rid `anhum hattaa yakkhoodoo fee hadeesin ghairih; wa immaa yunsiyannakash Shaitaanu falaa taq`ud ba`dazzikraa ma`al qawmiz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
और ऐसे लोगों (के हिसाब किताब) का जवाब देही कुछ परहेज़गारो पर तो है नहीं मगर (सिर्फ नसीहतन) याद दिलाना (चाहिए) ताकि ये लोग भी परहेज़गार बनें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَخُوضُونَ (यखूज़ून): बातों में पड़ना, बुरी और बेकार बातें करना, मज़ाक़ उड़ाना।
  • آيَاتِنَا (आयातिना): हमारी आयतें, यानी क़ुरआन की आयतें।
  • فَأَعْرِضْ (फ़अ'रिद): उनसे मुँह मोड़ लो, उनसे अलग हो जाओ।
  • يُنسِيَنَّكَ (युन्सियन्नक): तुम्हें भुला दे।
  • الذِّكْرَى (ज़िक़्रा): याद दिलाना, नसीहत, याद आना।
  • الظَّالِمِينَ (ज़ालिमीन): अत्याचारी, ज़ालिम लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! जब तुम देखो कि कुछ लोग हमारी आयतों (क़ुरआन) के बारे में बुरी बातें कर रहे हैं, उनका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं, या उन्हें झुठला रहे हैं, तो उनसे अलग हो जाओ और उनके पास न बैठो। यह अलगाव तब तक जारी रखो जब तक वे किसी और विषय में बातचीत न करने लगें। यानी जब तक वे अपनी उस बुरी बात को छोड़कर किसी दूसरी बात में न लग जाएँ, तब तक उनकी महफ़िल से दूर रहो।

और अगर शैतान तुम्हें भुला दे और तुम भूल से उनके पास बैठ जाओ, तो जैसे ही तुम्हें याद आए कि ये लोग आयतों का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं, तो तुरंत वहाँ से उठ जाओ और उन ज़ालिम लोगों के साथ न बैठो, जो अल्लाह की आयतों को झुठलाते और उनका उपहास करते हैं।

यह हुक्म सिर्फ़ नबी ﷺ के लिए नहीं, बल्कि हर मुसलमान के लिए है कि वह ऐसी महफ़िलों से बचे रहे जहाँ अल्लाह की आयतों का मज़ाक़ उड़ाया जा रहा हो।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अल्लाह की आयतों की बेअदबी करने वालों से दूर रहना चाहिए, चाहे वे रिश्तेदार ही क्यों न हों। दीन की इज़्ज़त हर रिश्ते से बढ़कर है।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि बुरी महफ़िल में बैठना भी गुनाह है, भले ही हम ख़ुद बुरी बात न करें। ख़ामोशी से बुराई को सुनना भी उसमें शामिल होना है।
  3. अगर इंसान से कोई ग़लती हो जाए और वह किसी बुरी महफ़िल में बैठ जाए, तो जैसे ही उसे एहसास हो, उसे तुरंत वहाँ से निकल जाना चाहिए। यह तौबा और सुधार की राह है।
  4. शैतान इंसान को भुलाने की कोशिश करता है, लेकिन अल्लाह ने अपने बंदों को याद दिलाने का ज़रिया दिया है। जब इंसान को याद आ जाए, तो उसे फ़ौरन अमल करना चाहिए।
  5. यह आयत मुसलमानों को पाक और साफ़ महफ़िलें इख़्तियार करने की तरबियत देती है, ताकि उनका दिल और दीन दोनों सुरक्षित रहें।
🎧 सुनें

📜 आयत 66-70 — अल-अनआम

66وَكَذَّبَ بِهِ قَوْمُكَ وَهُوَ الْحَقُّ ۚ قُل لَّسْتُ عَلَيْكُم بِوَكِيلٍ
और उसी (क़ुरान) को तुम्हारी क़ौम ने झुठला दिया हालॉकि वह बरहक़ है (ऐ रसूल) तुम उनसे कहो कि मैं तुम पर कुछ निगेहबान तो हूं नहीं हर ख़बर (के पूरा होने) का एक ख़ास वक्त मुक़र्रर है और अनक़रीब (जल्दी) ही तुम जान लोगे
67لِّكُلِّ نَبَإٍ مُّسْتَقَرٌّ ۚ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
और जब तुम उन लोगों को देखो जो हमारी आयतों में बेहूदा बहस कर रहे हैं तो उन (के पास) से टल जाओ यहाँ तक कि वह लोग उसके सिवा किसी और बात में बहस करने लगें और अगर (हमारा ये हुक्म) तुम्हें शैतान भुला दे तो याद आने के बाद ज़ालिम लोगों के साथ हरगिज़ न बैठना
68وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آيَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ ۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ الشَّيْطَانُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَىٰ مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
और ऐसे लोगों (के हिसाब किताब) का जवाब देही कुछ परहेज़गारो पर तो है नहीं मगर (सिर्फ नसीहतन) याद दिलाना (चाहिए) ताकि ये लोग भी परहेज़गार बनें
69وَمَا عَلَى الَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَيْءٍ وَلَٰكِن ذِكْرَىٰ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
और जिन लोगों ने अपने दीन को खेल और तमाशा बना रखा है और दुनिया की ज़िन्दगी ने उन को धोके में डाल रखा है ऐसे लोगों को छोड़ो और क़ुरान के ज़रिए से उनको नसीहत करते रहो (ऐसा न हो कि कोई) शख़्श अपने करतूत की बदौलत मुब्तिलाए बला हो जाए (क्योंकि उस वक्त) तो ख़ुदा के सिवा उसका न कोई सरपरस्त होगा न सिफारिशी और अगर वह अपने गुनाह के ऐवज़ सारे (जहाँन का) बदला भी दे तो भी उनमें से एक न लिया जाएगा जो लोग अपनी करनी की बदौलत मुब्तिलाए बला हुए है उनको पीने के लिए खौलता हुआ गर्म पानी (मिलेगा) और (उन पर) दर्दनाक अज़ाब होगा क्योंकर वह कुफ़्र किया करते थे
70وَذَرِ الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَهُمْ لَعِبًا وَلَهْوًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا ۚ وَذَكِّرْ بِهِ أَن تُبْسَلَ نَفْسٌ بِمَا كَسَبَتْ لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ اللَّهِ وَلِيٌّ وَلَا شَفِيعٌ وَإِن تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لَّا يُؤْخَذْ مِنْهَا ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ أُبْسِلُوا بِمَا كَسَبُوا ۖ لَهُمْ شَرَابٌ مِّنْ حَمِيمٍ وَعَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या हम लोग ख़ुदा को छोड़कर उन (माबूदों) से मुनाज़ात (दुआ) करे जो न तो हमें नफ़ा पहुंचा सकते हैं न हमारा कुछ बिगाड़ ही सकते हैं- और जब ख़ुदा हमारी हिदायत कर चुका) उसके बाद उल्टे पावँ कुफ्र की तरफ उस शख़्श की तरह फिर जाएं जिसे शैतानों ने जंगल में भटका दिया हो और वह हैरान (परेशान) हो (कि कहा जाए क्या करें) और उसके कुछ रफीक़ हो कि उसे राहे रास्त (सीधे रास्ते) की तरफ पुकारते रह जाएं कि (उधर) हमारे पास आओ और वह एक न सुने (ऐ रसूल) तुम कह दो कि हिदायत तो बस ख़ुदा की हिदायत है और हमें तो हुक्म ही दिया गया है कि हम सारे जहॉन के परवरदिगार ख़ुदा के फरमाबरदार हैं
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अनुवाद — अल-अनआम 68

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Tuesday, August 18, 2026

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