अल-अनआम · 69/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَمَا عَلَى الَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَيْءٍ وَلَٰكِن ذِكْرَىٰ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ۝٦٩
Wa maa `alal lazeena yattaqoona min hisaabihim min shai`inw wa laakin zikraa la`allahum yattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जिन लोगों ने अपने दीन को खेल और तमाशा बना रखा है और दुनिया की ज़िन्दगी ने उन को धोके में डाल रखा है ऐसे लोगों को छोड़ो और क़ुरान के ज़रिए से उनको नसीहत करते रहो (ऐसा न हो कि कोई) शख़्श अपने करतूत की बदौलत मुब्तिलाए बला हो जाए (क्योंकि उस वक्त) तो ख़ुदा के सिवा उसका न कोई सरपरस्त होगा न सिफारिशी और अगर वह अपने गुनाह के ऐवज़ सारे (जहाँन का) बदला भी दे तो भी उनमें से एक न लिया जाएगा जो लोग अपनी करनी की बदौलत मुब्तिलाए बला हुए है उनको पीने के लिए खौलता हुआ गर्म पानी (मिलेगा) और (उन पर) दर्दनाक अज़ाब होगा क्योंकर वह कुफ़्र किया करते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَتَّقُونَ: जो अल्लाह से डरते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हुए उसकी मनाही से बचते हैं।
  • حِسَابِهِم: उन (मज़ाक उड़ाने वालों) के हिसाब का, यानी उनके गुनाहों की पूछ-गछ का।
  • ذِكْرَىٰ: नसीहत और याद दिलाना।
  • لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ: ताकि वे (भी) अल्लाह से डरने वाले बन जाएँ और इस बुरे काम से बाज़ आएँ।

तफ़सीर:

यह आयत उन मोमिनों के बारे में है जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी इबादत में लगे रहते हैं। जब वे उन लोगों के पास बैठते हैं जो अल्लाह की आयतों का मज़ाक उड़ाते हैं, तो उन्हें चिंता होती है कि कहीं उन पर भी उन लोगों के गुनाहों का कुछ हिस्सा न आ जाए। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो लोग परहेज़गार हैं, उन पर उन मज़ाक उड़ाने वालों के गुनाहों का कोई हिसाब नहीं है। यानी उनके किए की सज़ा उन्हें नहीं दी जाएगी, और न ही उनसे उनके आमाल की पूछ-गछ होगी। लेकिन हाँ, उन पर यह ज़िम्मेदारी है कि जब वे ऐसे लोगों के पास हों और वे आयतों का मज़ाक उड़ाएँ, तो वे उन्हें नसीहत करें, उन्हें समझाएँ और उन्हें इस बुरे काम से रोकें। उन्हें चाहिए कि वे अपनी नाराज़गी का इज़हार करें और उन्हें याद दिलाएँ कि अल्लाह के अज़ाब से डरो। यह नसीहत इसलिए है ताकि वे लोग भी अपनी इस हरकत से बाज़ आएँ और अल्लाह से डरने वाले बन जाएँ। इसका मतलब यह नहीं कि उनके साथ बैठना जारी रखें, बल्कि जहाँ तक हो सके उन्हें समझाना और फिर अलग हो जाना चाहिए।

फ़ायदे:

  1. मोमिन को चाहिए कि वह अपने गुनाहों की फ़िक्र करे, दूसरों के गुनाहों की ज़िम्मेदारी उस पर नहीं है, बशर्ते वह उन्हें रोकने की कोशिश करे।
  2. बुराई को देखकर चुप रहना सही नहीं है; जहाँ तक मुमकिन हो, अच्छाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना हर मोमिन का फ़र्ज़ है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि नसीहत का अंदाज़ नरम और प्यार भरा होना चाहिए, ताकि सामने वाले के दिल पर असर हो और वह अपनी गलती से तौबा करे।
  4. अल्लाह तआला अपने नेक बंदों पर बहुत मेहरबान है; वह उन्हें दूसरों के गुनाहों की सज़ा नहीं देता, बल्कि उन्हें नसीहत करने का शरफ़ (सम्मान) अता करता है।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि मोमिन को चाहिए कि वह ऐसी महफ़िलों से बचे जहाँ अल्लाह की आयतों का मज़ाक उड़ाया जाता है, और अगर वहाँ पहुँच जाए तो नसीहत करके वहाँ से हट जाए।


📜 आयत 67-71 — अल-अनआम

67لِّكُلِّ نَبَإٍ مُّسْتَقَرٌّ ۚ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
और जब तुम उन लोगों को देखो जो हमारी आयतों में बेहूदा बहस कर रहे हैं तो उन (के पास) से टल जाओ यहाँ तक कि वह लोग उसके सिवा किसी और बात में बहस करने लगें और अगर (हमारा ये हुक्म) तुम्हें शैतान भुला दे तो याद आने के बाद ज़ालिम लोगों के साथ हरगिज़ न बैठना
68وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آيَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ ۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ الشَّيْطَانُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَىٰ مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
और ऐसे लोगों (के हिसाब किताब) का जवाब देही कुछ परहेज़गारो पर तो है नहीं मगर (सिर्फ नसीहतन) याद दिलाना (चाहिए) ताकि ये लोग भी परहेज़गार बनें
69وَمَا عَلَى الَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَيْءٍ وَلَٰكِن ذِكْرَىٰ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
और जिन लोगों ने अपने दीन को खेल और तमाशा बना रखा है और दुनिया की ज़िन्दगी ने उन को धोके में डाल रखा है ऐसे लोगों को छोड़ो और क़ुरान के ज़रिए से उनको नसीहत करते रहो (ऐसा न हो कि कोई) शख़्श अपने करतूत की बदौलत मुब्तिलाए बला हो जाए (क्योंकि उस वक्त) तो ख़ुदा के सिवा उसका न कोई सरपरस्त होगा न सिफारिशी और अगर वह अपने गुनाह के ऐवज़ सारे (जहाँन का) बदला भी दे तो भी उनमें से एक न लिया जाएगा जो लोग अपनी करनी की बदौलत मुब्तिलाए बला हुए है उनको पीने के लिए खौलता हुआ गर्म पानी (मिलेगा) और (उन पर) दर्दनाक अज़ाब होगा क्योंकर वह कुफ़्र किया करते थे
70وَذَرِ الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَهُمْ لَعِبًا وَلَهْوًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا ۚ وَذَكِّرْ بِهِ أَن تُبْسَلَ نَفْسٌ بِمَا كَسَبَتْ لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ اللَّهِ وَلِيٌّ وَلَا شَفِيعٌ وَإِن تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لَّا يُؤْخَذْ مِنْهَا ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ أُبْسِلُوا بِمَا كَسَبُوا ۖ لَهُمْ شَرَابٌ مِّنْ حَمِيمٍ وَعَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या हम लोग ख़ुदा को छोड़कर उन (माबूदों) से मुनाज़ात (दुआ) करे जो न तो हमें नफ़ा पहुंचा सकते हैं न हमारा कुछ बिगाड़ ही सकते हैं- और जब ख़ुदा हमारी हिदायत कर चुका) उसके बाद उल्टे पावँ कुफ्र की तरफ उस शख़्श की तरह फिर जाएं जिसे शैतानों ने जंगल में भटका दिया हो और वह हैरान (परेशान) हो (कि कहा जाए क्या करें) और उसके कुछ रफीक़ हो कि उसे राहे रास्त (सीधे रास्ते) की तरफ पुकारते रह जाएं कि (उधर) हमारे पास आओ और वह एक न सुने (ऐ रसूल) तुम कह दो कि हिदायत तो बस ख़ुदा की हिदायत है और हमें तो हुक्म ही दिया गया है कि हम सारे जहॉन के परवरदिगार ख़ुदा के फरमाबरदार हैं
71قُلْ أَنَدْعُو مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلَىٰ أَعْقَابِنَا بَعْدَ إِذْ هَدَانَا اللَّهُ كَالَّذِي اسْتَهْوَتْهُ الشَّيَاطِينُ فِي الْأَرْضِ حَيْرَانَ لَهُ أَصْحَابٌ يَدْعُونَهُ إِلَى الْهُدَى ائْتِنَا ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدَىٰ ۖ وَأُمِرْنَا لِنُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ
और ये (भी हुक्म हुआ है) कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करो और उसी से डरते रहो और वही तो वह (ख़ुदा) है जिसके हुज़ूर में तुम सब के सब हाज़िर किए जाओगे
अल-अनआमकुरान सूची
165आयत
मक्कीRevelation
69आयत

अनुवाद — अल-अनआम 69

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Tuesday, August 18, 2026

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