अल-अनआम · 81/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
وَكَيْفَ أَخَافُ مَا أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا ۚ فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ۝٨١
Wa kaifa akhaafu maaa ashraktum wa laa takhaafoona annakum ashraktum billaahi maa lam yunazzil bihee `alaikum sultaanaa; fa aiyul fareeqaini ahaqqu bil amni in kuntum ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
और जिन्हें तुम ख़ुदा का शरीक बताते हो मै उन से क्यों डरुँ जब तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने ख़ुदा का शरीक ऐसी चीज़ों को बनाया है जिनकी ख़ुदा ने कोई सनद तुम पर नहीं नाज़िल की फिर अगर तुम जानते हो तो (भला बताओ तो सही कि) हम दोनों फरीक़ (गिरोह) में अमन क़ायम रखने का ज्यादा हक़दार कौन है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • سلطانًا: प्रमाण, तर्क, या कोई ठोस दलील।
  • अशरक्तुम: तुमने साझी ठहराया।
  • अहक़्क़ु बिल-अम्न: सुरक्षा और शांति का अधिक हक़दार।

व्याख्या:

यह आयत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की वह प्रसिद्ध बात है जो उन्होंने अपनी क़ौम के मुशरिकों से कही थी। वे उनसे फ़रमा रहे हैं: "मैं उन मूर्तियों से कैसे डरूँ जिन्हें तुमने अल्लाह का साझी बनाया है, जबकि उनमें न तो कोई नुक़सान पहुँचाने की ताक़त है और न ही फ़ायदा देने की? मेरा डर तो केवल अल्लाह से है, जो सच्चा ख़ालिक़ और मालिक है। लेकिन तुम लोग उस अल्लाह से नहीं डरते, जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारी इन मूर्तियों को भी, और तुमने उसके साथ उन चीज़ों को शरीक कर दिया जिनके लिए अल्लाह ने कोई सबूत या प्रमाण नाज़िल नहीं किया।"

फिर वे उनसे पूछते हैं: "अब तुम ख़ुद फ़ैसला करो—दो फ़िर्क़ों में से कौन सा फ़िर्क़ा सुरक्षा और शांति का अधिक हक़दार है? एक वह जो अकेले अल्लाह की इबादत करता है और उसी से डरता है, या वह जो अल्लाह के साथ दूसरों को शरीक करता है और उसकी नाराज़गी की परवाह नहीं करता? अगर तुम सच्चाई जानते हो तो बताओ।"

इस सवाल का जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद साफ़ है—जो अल्लाह से डरता है और उसकी इबादत में किसी को शरीक नहीं करता, वही सच्ची सुरक्षा और अम्न का हक़दार है। मुशरिक लोग तो अपने शिर्क की वजह से अल्लाह के अज़ाब के सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं।


फ़ायदे:

  1. सच्ची सुरक्षा अल्लाह की इबादत में है: जो इंसान अकेले अल्लाह से जुड़ जाता है और उसी पर भरोसा करता है, उसका दिल हर ख़तरे से महफ़ूज़ रहता है। अल्लाह की याद और उसकी इबादत ही असली अम्न का ज़रिया है।
  2. बिना प्रमाण के किसी चीज़ को मानना गुनाह है: इस आयत से सीख मिलती है कि दीन के मामलों में हमें बिना सबूत और प्रमाण के किसी चीज़ को नहीं अपनाना चाहिए। अल्लाह ने जो हुक्म दिया है, वही सच्चा रास्ता है।
  3. बहस में नर्मी और हिकमत: हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मुशरिकों से प्यार और हिकमत के साथ बात की और उन्हें सोचने पर उकसाया। हमें भी दूसरों को समझाने के लिए नर्मी और अक़्लमंदी से काम लेना चाहिए।
  4. तौहीद ही असली निजात है: यह आयत तौहीद (अल्लाह की एकता) की अहमियत सिखाती है। जो इंसान तौहीद पर क़ायम रहता है, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में सुरक्षित रहता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 79-83 — अल-अनआम

79إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ये हरगिज़ नहीं हो सकते) मैने तो बातिल से कतराकर उसकी तरफ से मुँह कर लिया है जिसने बहुतेरे आसमान और ज़मीन पैदा किए और मैं मुशरेकीन से नहीं हूँ
80وَحَاجَّهُ قَوْمُهُ ۚ قَالَ أَتُحَاجُّونِّي فِي اللَّهِ وَقَدْ هَدَانِ ۚ وَلَا أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِ إِلَّا أَن يَشَاءَ رَبِّي شَيْئًا ۗ وَسِعَ رَبِّي كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۗ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ
और उनकी क़ौम के लोग उनसे हुज्जत करने लगे तो इबराहीम ने कहा था क्या तुम मुझसे ख़ुदा के बारे में हुज्जत करते हो हालॉकि वह यक़ीनी मेरी हिदायत कर चुका और तुम मे जिन बुतों को उसका शरीक मानते हो मै उनसे डरता (वरता) नहीं (वह मेरा कुछ नहीं कर सकते) मगर हॉ मेरा ख़ुदा खुद (करना) चाहे तो अलबत्ता कर सकता है मेरा परवरदिगार तो बाएतबार इल्म के सब पर हावी है तो क्या उस पर भी तुम नसीहत नहीं मानते
81وَكَيْفَ أَخَافُ مَا أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا ۚ فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
और जिन्हें तुम ख़ुदा का शरीक बताते हो मै उन से क्यों डरुँ जब तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने ख़ुदा का शरीक ऐसी चीज़ों को बनाया है जिनकी ख़ुदा ने कोई सनद तुम पर नहीं नाज़िल की फिर अगर तुम जानते हो तो (भला बताओ तो सही कि) हम दोनों फरीक़ (गिरोह) में अमन क़ायम रखने का ज्यादा हक़दार कौन है
82الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُم بِظُلْمٍ أُولَٰئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ
जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अपने ईमान को ज़ुल्म (शिर्क) से आलूदा नहीं किया उन्हीं लोगों के लिए अमन (व इतमिनान) है और यही लोग हिदायत याफ़ता हैं
83وَتِلْكَ حُجَّتُنَا آتَيْنَاهَا إِبْرَاهِيمَ عَلَىٰ قَوْمِهِ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَّن نَّشَاءُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ
और ये हमारी (समझाई बुझाई) दलीलें हैं जो हमने इबराहीम को अपनी क़ौम पर (ग़ालिब आने के लिए) अता की थी हम जिसके मरतबे चाहते हैं बुलन्द करते हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार हिक़मत वाला बाख़बर है
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अनुवाद — अल-अनआम 81

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Tuesday, August 18, 2026

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