अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- سُبْحَانَ رَبِّنَا: हमारे रब की पाकी बयान करते हैं, वह हर ऐब और कमी से पाक है।
- ظَالِمِينَ: अत्याचारी, अपनी जानों पर ज़ुल्म करने वाले।
तफ़सीर:
जब उन लोगों ने अपना बाग़ जला हुआ देखा तो पहले तो वह हैरान रह गए और बोले: "हम तो रास्ता भूल गए हैं, यह हमारा बाग़ नहीं है।" लेकिन जब उन्होंने अच्छी तरह पहचान लिया कि यह उन्हीं का बाग़ है और वह बर्बाद हो चुका है, तो उनकी आँखें खुलीं और ज़मीर जागा। उनमें से जो सबसे अच्छा और समझदार था, उसने उन्हें वह बात याद दिलाई जो उसने पहले कही थी: "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि 'इंशा अल्लाह' कहो (यानी अल्लाह की मर्ज़ी पर भरोसा रखो)?"
इस पर उन सबको अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वे अपने रब की तरफ़ लौट आए। उन्होंने कहा: "पाक है हमारा रब! बेशक हम ही ज़ालिम थे।" यानी हमने अपने रब पर इल्ज़ाम नहीं लगाया कि उसने हमारे साथ ज़ुल्म किया, बल्कि हमने खुद अपनी जानों पर ज़ुल्म किया। हमने ग़रीबों और मिस्कीनों का हक़ रोका, अल्लाह की मर्ज़ी को अपनी ख्वाहिश पर तरजीह दी, और 'इंशा अल्लाह' कहना भूल गए। यह सब हमारी अपनी कमी और ग़लती थी, अल्लाह तो हर ऐब से पाक है, वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता।
फिर वे एक-दूसरे को मलामत करने लगे और कहने लगे: "हाय हमारी बर्बादी! हम हद से बढ़ गए थे, हमने ग़रीबों को देना बंद कर दिया था और अल्लाह के हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी की।" उन्होंने तौबा की और अल्लाह से दुआ की: "उम्मीद है हमारा रब हमें इस बाग़ से बेहतर इनाम देगा, हम अपने रब की तरफ़ ही रुजू करते हैं, उसी से उम्मीद रखते हैं और उसी से माफ़ी चाहते हैं।"
इस क़िस्से में हमारे लिए बड़ी सीख है। अल्लाह तआला ने यह क़िस्सा इसलिए सुनाया ताकि हम समझें कि जो लोग अल्लाह के हुक्म की ख़िलाफ़वरज़ी करते हैं और उसकी नेअमतों में उसका हक़ अदा नहीं करते, उन्हें दुनिया में भी सज़ा मिलती है। और आख़िरत की सज़ा तो इससे कहीं बड़ी और सख्त है। काश! लोग इन नसीहतों से सबक़ लेते और उन कामों से बचते जो अल्लाह के ग़ज़ब का सबब बनते हैं।
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि जब इंसान ग़लती कर बैठे तो उसे चाहिए कि वह अल्लाह की तरफ़ लौटे, अपनी ग़लती का इक़रार करे और तौबा करे। अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला और रहम करने वाला है। वह अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उन्हें बेहतर इनाम देता है। हमें भी चाहिए कि अपनी ज़िंदगी में अल्लाह के हुक्मों की पैरवी करें, ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ अदा करें, और हर काम में 'इंशा अल्लाह' कहकर अल्लाह पर भरोसा रखें। यही कामयाबी की राह है।
📜 आयत 27-31 — अल-क़लम
अनुवाद — अल-क़लम 29
सूरा अल-क़लम आयत 29 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : वह बोले हमारा परवरदिगार पाक है बेशक हमीं ही कुसूरवार…सूरा आयत 29/52 — अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़लम सुनें, अल-क़लम अनुवाद, अल-क़लम mp3, अल-क़लम pdf. आयत 27–31. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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