अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- أَوْسَطُهُمْ: उनमें सबसे अच्छा, सबसे न्यायप्रिय और समझदार व्यक्ति।
- لَوْلَا: क्यों नहीं? / ऐसा क्यों नहीं किया?
- تُسَبِّحُونَ: अल्लाह की तस्बीह (पवित्रता) बयान करते, उसकी इबादत करते और उसकी आज्ञा का पालन करते।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब उस बाग़ के मालिकों ने अपनी ग़लती और अल्लाह की पकड़ को देखा, तो उनमें से जो सबसे अच्छा और न्यायप्रिय था, उसने उन्हें याद दिलाया: "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था? तुम्हें अल्लाह की तस्बीह क्यों नहीं करनी चाहिए थी?" यानी तुम्हें चाहिए था कि अल्लाह की पवित्रता बयान करते, उसकी इबादत करते, और अपने इरादे को उसकी रज़ा के सुपुर्द कर देते। तुम्हें अपनी ताक़त और अपने इंतज़ाम पर भरोसा नहीं करना चाहिए था, बल्कि अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए था और उससे तौफ़ीक़ माँगनी चाहिए थी।
यह नसीहत उसने उन्हें उस वक़्त दी थी जब वे ग़रीबों को बाग़ का फल देने से रोकने की साज़िश कर रहे थे। उसने उन्हें समझाया था कि अल्लाह की तस्बीह और उसकी इबादत का मतलब यह है कि उसके हुक्म को मानो, उसकी दी हुई नेमतों में उसका हक़ अदा करो, और हर मामले में "इंशा अल्लाह" कहो। लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं मानी और अपनी ग़लत योजना पर अमल किया। नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने उनका बाग़ तबाह कर दिया।
इस आयत में हमारे लिए बहुत बड़ी सीख है। हमें चाहिए कि हर काम में अल्लाह को याद रखें, उसकी तस्बीह करें, और अपने मामलों में उसकी मर्ज़ी को मुक़द्दम समझें। जब हम अल्लाह को याद करते हैं और उसकी इबादत करते हैं, तो अल्लाह हमारे कामों में बरकत देता है और हमें नुक़सान से बचाता है। याद रखिए, अल्लाह की तस्बीह सिर्फ़ ज़बान से "सुब्हान अल्लाह" कहने का नाम नहीं है, बल्कि यह है कि हम अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में अल्लाह के हुक्मों को मानें और उसकी नेमतों का सही इस्तेमाल करें।
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि अगर हम अल्लाह की नेमतों को पाकर उसमें बख़ीलगी (कंजूसी) करें और दूसरों का हक़ मारें, तो अल्लाह हमसे वह नेमत छीन सकता है। लेकिन अगर हम तौबा कर लें और अल्लाह की तरफ़ लौट आएं, तो अल्लाह बड़ा मेहरबान है, वह हमें और बेहतर अता कर सकता है। इसलिए हमेशा अल्लाह की तस्बीह करते रहें और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करें, ताकि अल्लाह हमें और ज़्यादा दे और हमें हर मुसीबत से बचाए।
📜 आयत 26-30 — अल-क़लम
अनुवाद — अल-क़लम 28
सूरा अल-क़लम आयत 28 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जो उनमें से मुनसिफ़ मिजाज़ था कहने लगा क्यों मैंने…सूरा आयत 28/52 — अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़लम सुनें, अल-क़लम अनुवाद, अल-क़लम mp3, अल-क़लम pdf. आयत 26–30. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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