Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- अफ़नज'अलु (أَفَنَجْعَلُ): क्या हम बना देंगे?
- अल-मुस्लिमीन (الْمُسْلِمِينَ): अल्लाह के आज्ञाकारी, उसकी इबादत करने वाले और उसके हुक्म के सामने सिर झुकाने वाले।
- अल-मुजरिमीन (الْمُجْرِمِينَ): अपराधी, काफ़िर, वे लोग जिन्होंने अल्लाह की नाफ़रमानी की और उसके साथ कुफ़्र किया।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उस ग़लत ख़याल का जवाब देती है जो मक्का के मुशरिकीन (बहुदेववादियों) ने मुसलमानों से कहा था। उन्होंने कहा था कि अगर तुम्हारे दावे के मुताबिक़ क़ियामत के दिन दोबारा उठना होगा, तो हमें तुमसे बेहतर हालत और ऊँचा दर्जा मिलेगा। अल्लाह तआला ने उनके इस बातिल ख़याल का रद्द करते हुए फ़रमाया: "क्या हम मुसलमानों को अपराधियों के बराबर कर देंगे?" यानी क्या हम उन लोगों को, जिन्होंने मेरी इबादत की, मेरे हुक्मों को माना और मेरे रसूल की पैरवी की, उन लोगों के बराबर कर देंगे जिन्होंने मेरा इन्कार किया, मेरी नाफ़रमानी की और मेरे रसूलों को झुठलाया? हरगिज़ नहीं! यह कभी नहीं हो सकता।
यह आयत अल्लाह के इंसाफ़ और उसकी हिकमत का सबूत है। अल्लाह कभी ज़ालिम नहीं है और न ही वह नेक और बद को एक जैसा बदला दे सकता है। अगर ऐसा होता तो यह उसकी रहमत, हिकमत और अदालत के खिलाफ़ होता। मुशरिकीन का यह ख़याल बिल्कुल बेबुनियाद था, क्योंकि वे दुनिया में अपनी सूरत-ए-हाल से धोखा खा गए थे। उन्होंने सोचा कि दुनिया में जो उन्हें बड़ाई और दौलत हासिल है, वही आख़िरत में भी उनके काम आएगी। लेकिन वे भूल गए कि आख़िरत का दारुल-क़रार (ठिकाना) वहाँ की नेकियों और अमल पर निर्भर है, न कि दुनियावी ऊँचाई पर।
इस आयत में एक बड़ी दलील और सबक़ है कि अल्लाह के यहाँ इंसाफ़ है। वह किसी के साथ ज़ुल्म नहीं करेगा। नेक और बद का अंजाम एक नहीं हो सकता। यही अल्लाह की रहमत और अदालत का तक़ाज़ा है। जो लोग अल्लाह की इबादत करते हैं और उसके हुक्मों पर चलते हैं, उनके लिए जन्नत है, और जो लोग उसकी नाफ़रमानी करते हैं और उसके साथ कुफ़्र करते हैं, उनके लिए जहन्नुम की आग है।
इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें कभी अपने आपको दूसरों से बेहतर नहीं समझना चाहिए और न ही अल्लाह की रहमत से मायूस होना चाहिए। अल्लाह के यहाँ हर इंसान को उसके अमल के हिसाब से बदला मिलेगा। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों की पैरवी में गुज़ारें, ताकि आख़िरत के दिन हम उन लोगों में से हों जिन्हें अल्लाह की रहमत और जन्नत मिलेगी। यह आयत मुसलमानों के लिए ख़ुशख़बरी है और उन्हें सब्र और इस्तिक़ामत (स्थिरता) पर क़ायम रहने की तरग़ीब देती है, क्योंकि उनका अंजाम बहुत अच्छा है।
📜 आयत 33-37 — सूरा अल-क़लम
अनुवाद — अल-क़लम 35
सूरा अल-क़लम आयत 35 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो क्या हम फरमाबरदारों को नाफ़रमानो के बराबर कर देंगेसूरा आयत 35/52 — सूरा अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-क़लम सुनें, सूरा अल-क़लम अनुवाद, सूरा अल-क़लम mp3, सूरा अल-क़लम pdf. आयत 33–37. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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