अल-क़लम · 36/52
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़लम
مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ ۝٣٦
Maa lakum kaifa tahhkumoon
📖 हिंदी अर्थ
(हरगिज़ नहीं) तुम्हें क्या हो गया है तुम तुम कैसा हुक्म लगाते हो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا لَكُمْ: तुम्हें क्या हो गया? यानी तुम्हारा क्या हाल है?
  • كَيْفَ تَحْكُمُونَ: तुम कैसा फैसला करते हो? यानी तुम किस आधार पर यह निर्णय देते हो?

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकीन (बहुदेववादियों) को सम्बोधित करते हुए उनके बेतुके और बुनियाद से गिरे हुए फैसले पर अचरज और हैरानी का इज़हार कर रहा है। यह पूछताछ एक ऐसा सवाल है जिसका कोई जवाब नहीं बनता — "तुम्हें क्या हो गया? तुम कैसा फैसला करते हो?" यानी तुम किस मापदंड और किस तर्क के आधार पर यह फैसला दे रहे हो कि अल्लाह के आज्ञाकारी और वफ़ादार बंदे, जो उसकी इबादत में झुकते हैं, और काफिर, जो उसकी नाफ़रमानी करते हैं, दोनों को एक ही दर्जा दिया जाए? क्या तुम्हारी अक्ल और समझ इस क़दर कमज़ोर हो गई है कि तुमने नेक और बदकार को एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया? यह कैसा इन्साफ़ है?

यह आयत उन लोगों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो अल्लाह के दीन के मामले में अपनी राय और अपने फैसले को हक़ीक़त पर तरजीह देते हैं। अल्लाह तआला फरमाता है कि जो लोग उसकी इबादत में सिर झुकाते हैं, वह उन्हें कभी उन लोगों के बराबर नहीं करेगा जो उसके साथ कुफ्र करते हैं। यह अल्लाह का इन्साफ़ है कि वह हर एक को उसके अमल के हिसाब से बदला देगा।

इस आयत से हमें सबक लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में कभी भी नेकी और गुनाह को एक नज़र से न देखें। अल्लाह तआला ने जो फैसले क़ुरआन में बताए हैं, वही सच्चे और अदल वाले हैं। हमें अपनी सोच, अपने फैसले और अपने अंदाज़ को अल्लाह की बताई हुई कसौटी पर परखना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह की रहमत और उसका इन्साफ़ उसके आज्ञाकारी बंदों के साथ है, और वह कभी ज़ालिमों को नेकों के बराबर नहीं करेगा। यही अल्लाह का वादा है, और अल्लाह का वादा कभी नहीं बदलता।



📜 आयत 34-38 — सूरा अल-क़लम

34إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ
बेशक परहेज़गार लोग अपने परवरदिगार के यहाँ ऐशो आराम के बाग़ों में होंगे
35أَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِمِينَ كَالْمُجْرِمِينَ
तो क्या हम फरमाबरदारों को नाफ़रमानो के बराबर कर देंगे
36مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
(हरगिज़ नहीं) तुम्हें क्या हो गया है तुम तुम कैसा हुक्म लगाते हो
37أَمْ لَكُمْ كِتَابٌ فِيهِ تَدْرُسُونَ
या तुम्हारे पास कोई ईमानी किताब है जिसमें तुम पढ़ लेते हो
38إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ
कि जो चीज़ पसन्द करोगे तुम को वहाँ ज़रूर मिलेगी
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36आयत

अनुवाद — अल-क़लम 36

सूरा अल-क़लम आयत 36 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (हरगिज़ नहीं) तुम्हें क्या हो गया है तुम तुम कैसा…

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Thursday, October 1, 2026

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