अल-आराफ · 126/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَمَا تَنقِمُ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِآيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَاءَتْنَا ۚ رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ ۝١٢٦
Wa maa tanqimu minnaaa illaaa an aamannaa bi Aayaati Rabbinaa lammaa jaaa`atnaa; Rabbanaaa afrigh `alainaa sabranw wa tawaffanaa muslimeen
📖 हिंदी अर्थ
तू हमसे उसके सिवा और काहे की अदावत रखता है कि जब हमारे पास ख़ुदा की निशानियाँ आयी तो हम उन पर ईमान लाए (और अब तो हमारी ये दुआ है कि) ऐ हमारे परवरदिगार हम पर सब्र (का मेंह बरसा)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • तनक़िमु – तुम बुरा मानते हो, दोष लगाते हो, आपत्ति करते हो।
  • आमन्ना – हम ईमान लाए, हमने विश्वास किया।
  • आयात – निशानियाँ, प्रमाण, चमत्कार।
  • अफ़रिग़ – बरसा दे, उँडेल दे, खूब प्रचुर मात्रा में दे।
  • सब्र – धैर्य, सहनशीलता, दृढ़ता।
  • तवफ़्फ़ना – हमें मौत दे, हमारी आत्मा को उठा ले।
  • मुस्लिमीन – आज्ञाकारी, इस्लाम पर स्थिर रहने वाले।

व्याख्या:

यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के सच्चे अनुयायी, जो ईमान ला चुके थे, फ़िरऔन के सामने खड़े हैं। फ़िरऔन उन्हें धमकी दे रहा है कि वह उनके हाथ-पैर काट देगा और उन्हें सूली पर चढ़ा देगा। उस ज़ुल्म और ख़ौफ़ के माहौल में ये मोमिनीन बड़े ही साहस और वफ़ादारी के साथ फ़िरऔन से कहते हैं:

"तुम हम पर कोई दोष नहीं लगा सकते, हमारे खिलाफ़ तुम्हारे पास कोई आपत्ति का कारण नहीं है, सिवाय इसके कि हमने अपने रब की आयतों पर ईमान लाया, जब वे हमारे पास आईं।" यानी तुम्हें हमारी एकमात्र 'ग़लती' यही नज़र आती है कि हमने सत्य को पहचाना और उसे क़बूल किया। यह कोई बुराई नहीं, बल्कि सबसे बड़ी नेकी है। यह तुम्हारे ज़ुल्म की इंतिहा है कि तुम सच्चाई को क़बूल करने वालों को सज़ा देना चाहते हो।

इसके बाद वे अपनी पूरी हालत अल्लाह की तरफ़ मोड़ते हैं और दुआ करते हैं: "ऐ हमारे रब! हम पर सब्र का ऐसा खज़ाना उँडेल दे जो हमारे दिलों को भर दे, हमें इतना धैर्य दे कि हम तेरी राह में हर मुसीबत को सहन कर सकें, और हमें इस हालत में मौत दे कि हम तेरे आज्ञाकारी (मुस्लिम) हों, तेरे दीन पर स्थिर रहें।"

यह दुआ सिखाती है कि सच्चे मोमिन की पहचान यह है कि वह मुसीबत के समय घबराता नहीं, बल्कि अल्लाह से सब्र और स्थिरता की दुआ माँगता है। वह दुनिया की किसी भी चीज़ से ज़्यादा इस बात की परवाह करता है कि उसकी मौत ईमान और इस्लाम की हालत में हो।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि जब हम सच्चाई पर हों, तो हमें किसी की धमकियों से नहीं डरना चाहिए। अल्लाह की राह में मुसीबतें आएँगी, लेकिन हमें सब्र और दृढ़ता से काम लेना चाहिए। और सबसे बड़ी सफलता यह है कि हम अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों तक ईमान और इस्लाम पर क़ायम रहें। यही वह दुआ है जो हर मोमिन को अपनी ज़िंदगी में दोहराते रहना चाहिए — "ऐ रब! हमें सब्र दे और हमें मुसलमान की हालत में उठा।"

यह आयत हमें यह भी बताती है कि सच्चा ईमान वही है जो आयतों (अल्लाह के प्रमाणों) के सामने आते ही फ़ौरन क़बूल कर लिया जाए, बिना किसी हिचकिचाहट के। और जब ईमान दिल में जड़ पकड़ ले, तो फिर दुनिया की कोई ताक़त उसे डिगा नहीं सकती।



📜 आयत 124-128 — सूरा अल-आराफ

124لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَافٍ ثُمَّ لَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ
मै तो यक़ीनन तुम्हारे (एक तरफ के) हाथ और दूसरी तरफ के पॉव कटवा डालूंगा फिर तुम सबके सब को सूली दे दूंगा
125قَالُوا إِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ
जादूगर कहने लगे हम को तो (आख़िर एक रोज़) अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना (मर जाना) है
126وَمَا تَنقِمُ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِآيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَاءَتْنَا ۚ رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ
तू हमसे उसके सिवा और काहे की अदावत रखता है कि जब हमारे पास ख़ुदा की निशानियाँ आयी तो हम उन पर ईमान लाए (और अब तो हमारी ये दुआ है कि) ऐ हमारे परवरदिगार हम पर सब्र (का मेंह बरसा)
127وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِ فِرْعَوْنَ أَتَذَرُ مُوسَىٰ وَقَوْمَهُ لِيُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَيَذَرَكَ وَآلِهَتَكَ ۚ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبْنَاءَهُمْ وَنَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ وَإِنَّا فَوْقَهُمْ قَاهِرُونَ
और हमने अपनी फरमाबरदारी की हालत में दुनिया से उठा ले और फिरऔन की क़ौम के चन्द सरदारों ने (फिरऔन) से कहा कि क्या आप मूसा और उसकी क़ौम को उनकी हालत पर छोड़ देंगे कि मुल्क में फ़साद करते फिरे और आपके और आपके ख़ुदाओं (की परसतिश) को छोड़ बैठें- फिरऔन कहने लगा (तुम घबराओ नहीं) हम अनक़रीब ही उनके बेटों की क़त्ल करते हैं और उनकी औरतों को (लौन्डियॉ बनाने के वास्ते) जिन्दा रखते हैं और हम तो उन पर हर तरह क़ाबू रखते हैं
128قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ اسْتَعِينُوا بِاللَّهِ وَاصْبِرُوا ۖ إِنَّ الْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ
(ये सुनकर) मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि (भाइयों) ख़ुदा से मदद माँगों और सब्र करो सारी ज़मीन तो ख़ुदा ही की है वह अपने बन्दों में जिसकी चाहे उसका वारिस (व मालिक) बनाए और ख़ातमा बिल ख़ैर तो सब परहेज़गार ही का है
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
126आयत

अनुवाद — अल-आराफ 126

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Friday, October 2, 2026

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