Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- तनक़िमु – तुम बुरा मानते हो, दोष लगाते हो, आपत्ति करते हो।
- आमन्ना – हम ईमान लाए, हमने विश्वास किया।
- आयात – निशानियाँ, प्रमाण, चमत्कार।
- अफ़रिग़ – बरसा दे, उँडेल दे, खूब प्रचुर मात्रा में दे।
- सब्र – धैर्य, सहनशीलता, दृढ़ता।
- तवफ़्फ़ना – हमें मौत दे, हमारी आत्मा को उठा ले।
- मुस्लिमीन – आज्ञाकारी, इस्लाम पर स्थिर रहने वाले।
व्याख्या:
यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के सच्चे अनुयायी, जो ईमान ला चुके थे, फ़िरऔन के सामने खड़े हैं। फ़िरऔन उन्हें धमकी दे रहा है कि वह उनके हाथ-पैर काट देगा और उन्हें सूली पर चढ़ा देगा। उस ज़ुल्म और ख़ौफ़ के माहौल में ये मोमिनीन बड़े ही साहस और वफ़ादारी के साथ फ़िरऔन से कहते हैं:
"तुम हम पर कोई दोष नहीं लगा सकते, हमारे खिलाफ़ तुम्हारे पास कोई आपत्ति का कारण नहीं है, सिवाय इसके कि हमने अपने रब की आयतों पर ईमान लाया, जब वे हमारे पास आईं।" यानी तुम्हें हमारी एकमात्र 'ग़लती' यही नज़र आती है कि हमने सत्य को पहचाना और उसे क़बूल किया। यह कोई बुराई नहीं, बल्कि सबसे बड़ी नेकी है। यह तुम्हारे ज़ुल्म की इंतिहा है कि तुम सच्चाई को क़बूल करने वालों को सज़ा देना चाहते हो।
इसके बाद वे अपनी पूरी हालत अल्लाह की तरफ़ मोड़ते हैं और दुआ करते हैं: "ऐ हमारे रब! हम पर सब्र का ऐसा खज़ाना उँडेल दे जो हमारे दिलों को भर दे, हमें इतना धैर्य दे कि हम तेरी राह में हर मुसीबत को सहन कर सकें, और हमें इस हालत में मौत दे कि हम तेरे आज्ञाकारी (मुस्लिम) हों, तेरे दीन पर स्थिर रहें।"
यह दुआ सिखाती है कि सच्चे मोमिन की पहचान यह है कि वह मुसीबत के समय घबराता नहीं, बल्कि अल्लाह से सब्र और स्थिरता की दुआ माँगता है। वह दुनिया की किसी भी चीज़ से ज़्यादा इस बात की परवाह करता है कि उसकी मौत ईमान और इस्लाम की हालत में हो।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि जब हम सच्चाई पर हों, तो हमें किसी की धमकियों से नहीं डरना चाहिए। अल्लाह की राह में मुसीबतें आएँगी, लेकिन हमें सब्र और दृढ़ता से काम लेना चाहिए। और सबसे बड़ी सफलता यह है कि हम अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों तक ईमान और इस्लाम पर क़ायम रहें। यही वह दुआ है जो हर मोमिन को अपनी ज़िंदगी में दोहराते रहना चाहिए — "ऐ रब! हमें सब्र दे और हमें मुसलमान की हालत में उठा।"
यह आयत हमें यह भी बताती है कि सच्चा ईमान वही है जो आयतों (अल्लाह के प्रमाणों) के सामने आते ही फ़ौरन क़बूल कर लिया जाए, बिना किसी हिचकिचाहट के। और जब ईमान दिल में जड़ पकड़ ले, तो फिर दुनिया की कोई ताक़त उसे डिगा नहीं सकती।
📜 आयत 124-128 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 126
सूरा अल-आराफ आयत 126 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तू हमसे उसके सिवा और काहे की अदावत रखता है…सूरा आयत 126/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 124–128. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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