अल-आराफ · 132/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَقَالُوا مَهْمَا تَأْتِنَا بِهِ مِنْ آيَةٍ لِّتَسْحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ ۝١٣٢
Wa qaaloo mahmaa taatinaa bihee min Aayatil litasharanaa bihaa famaa nahnu laka bimu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और फिरऔन के लोग मूसा से एक मरतबा कहने लगे कि तुम हम पर जादू करने के लिए चाहे जितनी निशानियाँ लाओ मगर हम तुम पर किसी तरह ईमान नहीं लाएँगें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَهْمَا: जो कुछ भी, कोई भी चीज़।
  • آيَةٍ: निशानी, चमत्कार, प्रमाण।
  • لِتَسْحَرَنَا: ताकि तू हमें अपने जादू से बहका दे (यानी हमें हमारे धर्म से फेर दे)।
  • بِمُؤْمِنِينَ: ईमान लाने वाले, तुझे सच्चा मानने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

फ़िरऔन की क़ौम (क़िब्ती लोग) ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से हठधर्मी और सरकशी के साथ कहा: "तू चाहे जो भी निशानी या चमत्कार हमारे सामने लेकर आए, जिससे तू हमें हमारे दीन (फ़िरऔन की पूजा और उसकी बात मानने) से हटाना चाहता है, हम तो तुझ पर कभी ईमान नहीं लाएँगे और न ही तुझे सच्चा मानेंगे।" उन्होंने उसकी लाई हुई निशानियों को चमत्कार नहीं, बल्कि जादू कहकर उसका मज़ाक उड़ाया और पहले ही से ठान लिया कि वे किसी भी हालत में उसकी बात नहीं मानेंगे। यह उनका पूर्वाग्रह और सत्य के प्रति अंध विरोध था, क्योंकि वे जानते थे कि ये निशानियाँ सच्ची हैं, लेकिन अपनी बड़ाई और दुनियावी सुख-सुविधाओं के कारण उन्हें मानने से इनकार कर रहे थे।

फ़ायदे (सीख):

  1. सत्य को स्वीकार करने में सबसे बड़ी रुकावट अहंकार और हठधर्मिता है। जब इंसान पहले से ही ठान ले कि वह मानेगा नहीं, तो कोई भी चमत्कार या प्रमाण उसके दिल को नरम नहीं कर सकता।
  2. नबियों और सच्चे दावेदारों के साथ मज़ाक करना और उनकी निशानियों को जादू कहना, मुनाफ़िक़ों और काफ़िरों की पुरानी आदत रही है। इससे हमें सीखना चाहिए कि हम सत्य के प्रति विनम्र रहें और उसे खुले दिल से स्वीकार करें।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि जब हमारे पास सच्चाई हो, तो हमें उस पर डटे रहना चाहिए, भले ही लोग हमें ठुकराएँ या मज़ाक उड़ाएँ। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने इसके बावजूद अपना प्रचार जारी रखा और अंततः सत्य की जीत हुई।
  4. ईमान दिल की चीज़ है, जो अल्लाह की तौफ़ीक़ से आता है। जिसे अल्लाह ने हिदायत न दी, उसे दुनिया की तमाम निशानियाँ भी हिदायत नहीं दे सकतीं। इसलिए हमें अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह हमें सत्य को स्वीकार करने की तौफ़ीक़ दे।
🎧 सुनें

📜 आयत 130-134 — अल-आराफ

130وَلَقَدْ أَخَذْنَا آلَ فِرْعَوْنَ بِالسِّنِينَ وَنَقْصٍ مِّنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
और बेशक हमने फिरऔन के लोगों को बरसों से कहत और फलों की कम पैदावार (के अज़ाब) में गिरफ्तार किया ताकि वह इबरत हासिल करें
131فَإِذَا جَاءَتْهُمُ الْحَسَنَةُ قَالُوا لَنَا هَٰذِهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَطَّيَّرُوا بِمُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُ ۗ أَلَا إِنَّمَا طَائِرُهُمْ عِندَ اللَّهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
तो जब उन्हें कोई राहत मिलती तो कहने लगते कि ये तो हमारे लिए सज़ावार ही है और जब उन्हें कोई मुसीबत पहुँचती तो मूसा और उनके साथियों की बदशुगूनी समझते देखो उनकी बदशुगूनी तो ख़ुदा के हा (लिखी जा चुकी) थी मगर बहुतेरे लोग नही जानते हैं
132وَقَالُوا مَهْمَا تَأْتِنَا بِهِ مِنْ آيَةٍ لِّتَسْحَرَنَا بِهَا فَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ
और फिरऔन के लोग मूसा से एक मरतबा कहने लगे कि तुम हम पर जादू करने के लिए चाहे जितनी निशानियाँ लाओ मगर हम तुम पर किसी तरह ईमान नहीं लाएँगें
133فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ الطُّوفَانَ وَالْجَرَادَ وَالْقُمَّلَ وَالضَّفَادِعَ وَالدَّمَ آيَاتٍ مُّفَصَّلَاتٍ فَاسْتَكْبَرُوا وَكَانُوا قَوْمًا مُّجْرِمِينَ
तब हमने उन पर (पानी को) तूफान और टिड़डियाँ और जुएं और मेंढ़कों और खून (का अज़ाब भेजा कि सब जुदा जुदा (हमारी कुदरत की) निशानियाँ थी उस पर भी वह लोग तकब्बुर ही करते रहें और वह लोग गुनेहगार तो थे ही
134وَلَمَّا وَقَعَ عَلَيْهِمُ الرِّجْزُ قَالُوا يَا مُوسَى ادْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ ۖ لَئِن كَشَفْتَ عَنَّا الرِّجْزَ لَنُؤْمِنَنَّ لَكَ وَلَنُرْسِلَنَّ مَعَكَ بَنِي إِسْرَائِيلَ
(और जब उन पर अज़ाब आ पड़ता तो कहने लगते कि ऐ मूसा तुम से जो ख़ुदा ने (क़बूल दुआ का) अहद किया है उसी की उम्मीद पर अपने ख़ुदा से दुआ माँगों और अगर तुमने हम से अज़ाब को टाल दिया तो हम ज़रूर भेज देगें
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अनुवाद — अल-आराफ 132

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Tuesday, August 18, 2026

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