अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- يُمَسِّكُونَ: मजबूती से थामे रहना, दृढ़ता से पकड़ना।
- بِالْكِتَابِ: से तात्पर्य उस दिव्य पुस्तक (तौरात) से है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) पर उतारी गई थी।
- أَقَامُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके नियमों, शर्तों, समय और आदाब के साथ स्थापित करना।
- الْمُصْلِحِينَ: सुधार करने वाले, अच्छे कर्म करने वाले लोग।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों की प्रशंसा करती है जो अल्लाह की किताब को मजबूती से थामे रहते हैं और उस पर अमल करते हैं। इसमें विशेष रूप से उन ईमानवालों का ज़िक्र है जो अहले-किताब में से थे, जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी, जिन्होंने तौरात को न तो बदला और न ही छुपाया, बल्कि उस पर ईमान लाए और उसके अनुसार चले।
इस आयत में दो मुख्य गुण बताए गए हैं: पहला, किताब को मजबूती से थामना यानी उसकी शिक्षाओं, आदेशों और निषेधों पर दृढ़ता से अमल करना, और दूसरा, नमाज़ की स्थापना करना यानी उसे उसके सही समय, शर्तों, वाजिबात और सुन्नतों के साथ अदा करना। नमाज़ का विशेष रूप से ज़िक्र इसलिए किया गया क्योंकि यह दीन का स्तंभ है और ईमान की सबसे बड़ी निशानी है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐसे लोगों का अज्र (प्रतिफल) वह हरगिज़ ज़ाइल नहीं करेगा। जो लोग अपने कर्मों को सुधारते हैं, अपने ईमान को सच्चा बनाते हैं और अपने अमल को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालते हैं, उनका अज्र अल्लाह के पास सुरक्षित है और उसे पूरा-पूरा दिया जाएगा। यह अल्लाह का वादा है, और अल्लाह अपने वादे के खिलाफ़ नहीं करता।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- अल्लाह की किताब को थामना और उस पर अमल करना ही सच्ची कामयाबी का रास्ता है। जो व्यक्ति किताब को अपना रहनुमा बनाता है, वह गुमराही से बचा रहता है।
- नमाज़ की स्थापना का विशेष महत्व है — यह ईमान की निशानी है और अल्लाह से रिश्ते को मजबूत करती है। जो नमाज़ की पाबंदी करता है, वह दूसरे अच्छे कर्मों की ओर भी आसानी से बढ़ता है।
- अल्लाह किसी भी नेक काम को ज़ाइल नहीं करता, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो। यह आयत मुसलमानों को उम्मीद और हौसला देती है कि उनकी मेहनत और अच्छे कर्म कभी बेकार नहीं जाएँगे।
- इस आयत से यह भी सीख मिलती है कि सुधार (इस्लाह) का काम बहुत पसंदीदा है — चाहे वह अपने नफ्स की सुधार हो, अपने घर की, या समाज की। अल्लाह सुधार करने वालों के साथ है और उनका अज्र उसे बहुत प्यारा है।
- यह आयत हमें सिखाती है कि पिछली किताबों पर ईमान लाना और उनके सच्चे पैग़म्बरों की तालीमात को मानना भी ईमान का हिस्सा है, और जो लोग ऐसा करते हैं, वे अल्लाह के करीबी बंदे हैं।
📜 आयत 168-172 — अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 170
सूरा अल-आराफ आयत 170 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जो लोग किताब (ख़ुदा) को मज़बूती से पकड़े हुए…सूरा आयत 170/206 — अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-आराफ सुनें, अल-आराफ अनुवाद, अल-आराफ mp3, अल-आराफ pdf. आयत 168–172. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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