अल-आराफ · 170/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَالَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُصْلِحِينَ ۝١٧٠
Wallazeena yumas sikoona bil Kitaabi wa aqaamus Salaata innaa laa nudee`uajral musliheen
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग किताब (ख़ुदा) को मज़बूती से पकड़े हुए हैं और पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं (उन्हें उसका सवाब ज़रूर मिलेगा क्योंकि) हम हरगिज़ नेकोकारो का सवाब बरबाद नहीं करते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُمَسِّكُونَ: मजबूती से थामे रहना, दृढ़ता से पकड़ना।
  • بِالْكِتَابِ: से तात्पर्य उस दिव्य पुस्तक (तौरात) से है जो मूसा (अलैहिस्सलाम) पर उतारी गई थी।
  • أَقَامُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके नियमों, शर्तों, समय और आदाब के साथ स्थापित करना।
  • الْمُصْلِحِينَ: सुधार करने वाले, अच्छे कर्म करने वाले लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की प्रशंसा करती है जो अल्लाह की किताब को मजबूती से थामे रहते हैं और उस पर अमल करते हैं। इसमें विशेष रूप से उन ईमानवालों का ज़िक्र है जो अहले-किताब में से थे, जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथी, जिन्होंने तौरात को न तो बदला और न ही छुपाया, बल्कि उस पर ईमान लाए और उसके अनुसार चले।

इस आयत में दो मुख्य गुण बताए गए हैं: पहला, किताब को मजबूती से थामना यानी उसकी शिक्षाओं, आदेशों और निषेधों पर दृढ़ता से अमल करना, और दूसरा, नमाज़ की स्थापना करना यानी उसे उसके सही समय, शर्तों, वाजिबात और सुन्नतों के साथ अदा करना। नमाज़ का विशेष रूप से ज़िक्र इसलिए किया गया क्योंकि यह दीन का स्तंभ है और ईमान की सबसे बड़ी निशानी है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐसे लोगों का अज्र (प्रतिफल) वह हरगिज़ ज़ाइल नहीं करेगा। जो लोग अपने कर्मों को सुधारते हैं, अपने ईमान को सच्चा बनाते हैं और अपने अमल को अल्लाह की रज़ा के अनुसार ढालते हैं, उनका अज्र अल्लाह के पास सुरक्षित है और उसे पूरा-पूरा दिया जाएगा। यह अल्लाह का वादा है, और अल्लाह अपने वादे के खिलाफ़ नहीं करता।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की किताब को थामना और उस पर अमल करना ही सच्ची कामयाबी का रास्ता है। जो व्यक्ति किताब को अपना रहनुमा बनाता है, वह गुमराही से बचा रहता है।
  2. नमाज़ की स्थापना का विशेष महत्व है — यह ईमान की निशानी है और अल्लाह से रिश्ते को मजबूत करती है। जो नमाज़ की पाबंदी करता है, वह दूसरे अच्छे कर्मों की ओर भी आसानी से बढ़ता है।
  3. अल्लाह किसी भी नेक काम को ज़ाइल नहीं करता, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो। यह आयत मुसलमानों को उम्मीद और हौसला देती है कि उनकी मेहनत और अच्छे कर्म कभी बेकार नहीं जाएँगे।
  4. इस आयत से यह भी सीख मिलती है कि सुधार (इस्लाह) का काम बहुत पसंदीदा है — चाहे वह अपने नफ्स की सुधार हो, अपने घर की, या समाज की। अल्लाह सुधार करने वालों के साथ है और उनका अज्र उसे बहुत प्यारा है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि पिछली किताबों पर ईमान लाना और उनके सच्चे पैग़म्बरों की तालीमात को मानना भी ईमान का हिस्सा है, और जो लोग ऐसा करते हैं, वे अल्लाह के करीबी बंदे हैं।


📜 आयत 168-172 — अल-आराफ

168وَقَطَّعْنَاهُمْ فِي الْأَرْضِ أُمَمًا ۖ مِّنْهُمُ الصَّالِحُونَ وَمِنْهُمْ دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَبَلَوْنَاهُم بِالْحَسَنَاتِ وَالسَّيِّئَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और हमने उनको रूए ज़मीन में गिरोह गिरोह तितिर बितिर कर दिया उनमें के कुछ लोग तो नेक हैं और कुछ लोग और तरह के (बदकार) हैं और हमने उन्हें सुख और दुख (दोनो तरह) से आज़माया ताकि वह (शरारत से) बाज़ आए
169فَخَلَفَ مِن بَعْدِهِمْ خَلْفٌ وَرِثُوا الْكِتَابَ يَأْخُذُونَ عَرَضَ هَٰذَا الْأَدْنَىٰ وَيَقُولُونَ سَيُغْفَرُ لَنَا وَإِن يَأْتِهِمْ عَرَضٌ مِّثْلُهُ يَأْخُذُوهُ ۚ أَلَمْ يُؤْخَذْ عَلَيْهِم مِّيثَاقُ الْكِتَابِ أَن لَّا يَقُولُوا عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ وَدَرَسُوا مَا فِيهِ ۗ وَالدَّارُ الْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
फिर उनके बाद कुछ जानशीन हुए जो किताब (ख़ुदा तौरैत) के तो वारिस बने (मगर लोगों के कहने से एहकामे ख़ुदा को बदलकर (उसके ऐवज़) नापाक कमीनी दुनिया के सामान ले लेते हैं (और लुत्फ तो ये है) कहते हैं कि हम तो अनक़रीब बख्श दिए जाएंगें (और जो लोग उन पर तान करते हैं) अगर उनके पास भी वैसा ही (दूसरा सामान आ जाए तो उसे ये भी न छोड़े और) ले ही लें क्या उनसे किताब (ख़ुदा तौरैत) का एहदो पैमान नहीं लिया गया था कि ख़ुदा पर सच के सिवा (झूठ कभी) नहीं कहेगें और जो कुछ उस किताब में है उन्होनें (अच्छी तरह) पढ़ लिया है और आख़िर का घर तो उन्हीं लोगों के वास्ते ख़ास है जो परहेज़गार हैं तो क्या तुम (इतना भी नहीं समझते)
170وَالَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُصْلِحِينَ
और जो लोग किताब (ख़ुदा) को मज़बूती से पकड़े हुए हैं और पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं (उन्हें उसका सवाब ज़रूर मिलेगा क्योंकि) हम हरगिज़ नेकोकारो का सवाब बरबाद नहीं करते
171۞ وَإِذْ نَتَقْنَا الْجَبَلَ فَوْقَهُمْ كَأَنَّهُ ظُلَّةٌ وَظَنُّوا أَنَّهُ وَاقِعٌ بِهِمْ خُذُوا مَا آتَيْنَاكُم بِقُوَّةٍ وَاذْكُرُوا مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
तो (ऐ रसूल यहूद को याद दिलाओ) जब हम ने उन (के सरों) पर पहाड़ को इस तरह लटका दिया कि गोया साएबान (छप्पर) था और वह लोग समझ चुके थे कि उन पर अब गिरा और हमने उनको हुक्म दिया कि जो कुछ हमने तुम्हें अता किया है उसे मज़बूती से पकड़ लो और जो कुछ उसमें लिखा है याद रखो ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ
172وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِن بَنِي آدَمَ مِن ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ ۛ شَهِدْنَا ۛ أَن تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَٰذَا غَافِلِينَ
और उसे रसूल वह वक्त भी याद (दिलाओ) जब तुम्हारे परवरदिगार ने आदम की औलाद से बस्तियों से (बाहर निकाल कर) उनकी औलाद से खुद उनके मुक़ाबले में एक़रार कर लिया (पूछा) कि क्या मैं तुम्हारा परवरदिगार नहीं हूँ तो सब के सब बोले हाँ हम उसके गवाह हैं ये हमने इसलिए कहा कि ऐसा न हो कहीं तुम क़यामत के दिन बोल उठो कि हम तो उससे बिल्कुल बे ख़बर थे
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अनुवाद — अल-आराफ 170

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Tuesday, August 18, 2026

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