अल-आराफ · 20/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
فَوَسْوَسَ لَهُمَا الشَّيْطَانُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وُورِيَ عَنْهُمَا مِن سَوْآتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَاكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَٰذِهِ الشَّجَرَةِ إِلَّا أَن تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ الْخَالِدِينَ ۝٢٠
Fawaswasa lahumash Shaitaanu liyubdiya lahumaa maa wooriya `anhumaa min saw aatihimaa wa qaala maa nahaakumaa Rabbukumaa `an haazihish shajarati illaaa an takoonaa malakaini aw takoonaa minal khaalideen
📖 हिंदी अर्थ
फिर शैतान ने उन दोनों को वसवसा (शक) दिलाया ताकि (नाफरमानी की वजह से) उनके अस्तर की चीज़े जो उनकी नज़र से बेहश्ती लिबास की वजह से पोशीदा थी खोल डाले कहने लगा कि तुम्हारे परवरदिगार ने दोनों को दरख्त (के फल खाने) से सिर्फ इसलिए मना किया है (कि मुबादा) तुम दोनों फरिश्ते बन जाओ या हमेशा (ज़िन्दा) रह जाओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَوَسْوَسَ: छुपाकर बुरा विचार डालना, दिल में खोटा ख्याल डालना।
  • لِيُبْدِيَ: प्रकट करने के लिए, खोलने के लिए।
  • وُورِيَ: छिपाया गया।
  • سَوْآتِهِمَا: उनके शर्म के स्थान (सतर)।
  • مَلَكَيْنِ: दो फ़रिश्ते।
  • الْخَالِدِينَ: हमेशा रहने वाले (अमर)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला हमें शैतान की उस चाल के बारे में बताते हैं जो उसने हज़रत आदम और हव्वा (अलैहिमास्सलाम) के साथ की। शैतान ने उन दोनों के दिलों में धीरे-धीरे बुरा विचार डाला, ताकि उनके सामने उनके वे अंग प्रकट कर दे जो अल्लाह ने उनसे छिपाए थे। यानी उसका मक़सद उनकी शर्मगाहों को खोलना और उन्हें उस चीज़ की तरफ ले जाना था जिससे अल्लाह ने उन्हें रोका था।

फिर शैतान ने उनसे कहा: "तुम्हारे रब ने तुम्हें इस पेड़ के पास जाने से सिर्फ इसलिए मना किया है कि कहीं तुम दो फ़रिश्ते न बन जाओ या कहीं तुम हमेशा ज़िंदा रहने वालों में से न हो जाओ।" यानी उसने अल्लाह की मनाही को उलटा पेश किया। उसने उन्हें यक़ीन दिलाया कि अल्लाह ने तुम्हें इसलिए रोका है ताकि तुम आगे न बढ़ सको, तुम्हारी तरक्की न हो, तुम फ़रिश्तों के दर्जे तक न पहुँच सको और हमेशा की ज़िंदगी हासिल न कर सको। इस तरह उसने झूठ और धोखे से उन्हें भटकाने की कोशिश की।

यहाँ से हमें सबक़ मिलता है कि शैतान हमेशा से इंसान का खुला दुश्मन है। वह कभी सीधे रास्ते से नहीं आता, बल्कि बहानों और झूठी बातों से इंसान को गुमराह करता है। वह बुरे कामों को अच्छे रूप में पेश करता है और अल्लाह के हुक्मों को बोझ या रुकावट के तौर पर दिखाता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अल्लाह के हुक्मों पर पूरा भरोसा करें और शैतान के बहकावे में न आएँ। अल्लाह ने जो भी चीज़ हमारे लिए मना की है, उसमें हमारी ही भलाई है, भले ही हमें उसका कारण समझ न आए।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि शर्म और हया इंसान की फ़ितरत (स्वभाव) है। अल्लाह ने इंसान को सतर ढकने की ताक़त दी थी, और शैतान की कोशिश यही है कि इंसान की हया छीन ले और उसे बेशर्म बना दे। इसलिए हमें अपनी शर्म और हया की हिफ़ाज़त करनी चाहिए और उन चीज़ों से बचना चाहिए जो हमें बेशर्मी की तरफ ले जाएँ।

अल्लाह तआला हमें शैतान के मकर से बचाए और हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 18-22 — सूरा अल-आराफ

18قَالَ اخْرُجْ مِنْهَا مَذْءُومًا مَّدْحُورًا ۖ لَّمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكُمْ أَجْمَعِينَ
ख़ुदा ने फरमाया यहाँ से बुरे हाल में (राइन्दा होकर निकल) (दूर) जा उन लोगों से जो तेरा कहा मानेगा तो मैं यक़ीनन तुम (और उन) सबको जहन्नुम में भर दूंगा
19وَيَا آدَمُ اسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَٰذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ الظَّالِمِينَ
और (आदम से कहा) ऐ आदम तुम और तुम्हारी बीबी (दोनों) बेहश्त में रहा सहा करो और जहाँ से चाहो खाओ (पियो) मगर (ख़बरदार) उस दरख्त के करीब न जाना वरना तुम अपना आप नुक़सान करोगे
20فَوَسْوَسَ لَهُمَا الشَّيْطَانُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وُورِيَ عَنْهُمَا مِن سَوْآتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَاكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَٰذِهِ الشَّجَرَةِ إِلَّا أَن تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ الْخَالِدِينَ
फिर शैतान ने उन दोनों को वसवसा (शक) दिलाया ताकि (नाफरमानी की वजह से) उनके अस्तर की चीज़े जो उनकी नज़र से बेहश्ती लिबास की वजह से पोशीदा थी खोल डाले कहने लगा कि तुम्हारे परवरदिगार ने दोनों को दरख्त (के फल खाने) से सिर्फ इसलिए मना किया है (कि मुबादा) तुम दोनों फरिश्ते बन जाओ या हमेशा (ज़िन्दा) रह जाओ
21وَقَاسَمَهُمَا إِنِّي لَكُمَا لَمِنَ النَّاصِحِينَ
और उन दोनों के सामने क़समें खायीं कि मैं यक़ीनन तुम्हारा ख़ैर ख्वाह हूँ
22فَدَلَّاهُمَا بِغُرُورٍ ۚ فَلَمَّا ذَاقَا الشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْآتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ الْجَنَّةِ ۖ وَنَادَاهُمَا رَبُّهُمَا أَلَمْ أَنْهَكُمَا عَن تِلْكُمَا الشَّجَرَةِ وَأَقُل لَّكُمَا إِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُّبِينٌ
ग़रज़ धोखे से उन दोनों को उस (के खाने) की तरफ ले गया ग़रज़ जो ही उन दोनों ने इस दरख्त (के फल) को चखा कि (बेहश्ती लिबास गिर गया और समझ पैदा हुई) उन पर उनकी शर्मगाहें ज़ाहिर हो गयीं और बेहश्त के पत्ते (तोड़ जोड़ कर) अपने ऊपर ढापने लगे तब उनको परवरदिगार ने उनको आवाज़ दी कि क्यों मैंने तुम दोनों को इस दरख्त के पास (जाने) से मना नहीं किया था और (क्या) ये न जता दिया था कि शैतान तुम्हारा यक़ीनन खुला हुआ दुश्मन है
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
20आयत

अनुवाद — अल-आराफ 20

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Wednesday, September 30, 2026

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