अल-आराफ · 47/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
۞ وَإِذَا صُرِفَتْ أَبْصَارُهُمْ تِلْقَاءَ أَصْحَابِ النَّارِ قَالُوا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ۝٤٧
Wa izaa surifat absaaruhum tilqaaa`a Ashaabin Naari qaalo Rabbanaa laa taj`alnaa ma`al qawmiz zaalimneen
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनकी निगाहें पलटकर जहन्नुमी लोगों की तरफ जा पड़ेगीं (तो उनकी ख़राब हालत देखकर ख़ुदा से अर्ज़ करेगें) ऐ हमारे परवरदिगार हमें ज़ालिम लोगों का साथी न बनाना

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • صُرِفَتْ أَبْصَارُهُمْ: उनकी आँखें फेरी गईं या घुमाई गईं।
  • تِلْقَاءَ: की ओर, सामने।
  • أَصْحَابِ النَّارِ: आग (जहन्नम) वालों की ओर।
  • لَا تَجْعَلْنَا: हमें मत बनाइए या हमें मत मिलाइए।
  • الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ: अत्याचारी/ज़ालिम लोगों के साथ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों (अहल-ए-आराफ़) का हाल बयान कर रही है, जिनके पलड़े में नेकियाँ और बुराइयाँ बराबर होंगी और वे जन्नत और जहन्नम के बीच की दीवार (आराफ़) पर खड़े होंगे। जब उनकी निगाहें जहन्नम वालों की तरफ घुमाई जाएँगी और वे उन्हें देखेंगे, तो वे उन लोगों को पहचान लेंगे और उनके भयानक अज़ाब को देखकर सहम जाएँगे। उस वक़्त वे दुआ करते हुए कहेंगे: "ऐ हमारे रब! हमें इन ज़ालिमों के साथ मत मिलाना, हमें उनके साथ जहन्नम में मत डालना।" यानी वे उन लोगों से बराअत (बेज़ारी) का इज़हार करेंगे और अल्लाह से पनाह माँगेंगे कि उन्हें काफ़िरों और मुशरिकों के साथ अज़ाब में न डाला जाए। यह उनकी फ़ितरत की पाकीज़गी को दर्शाता है कि वे ज़ालिमों के साथ रहने से भी डरते हैं और अल्लाह से उसकी पनाह चाहते हैं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि मोमिन को हमेशा अल्लाह से दुआ करनी चाहिए कि वह उसे ज़ालिमों के साथ न मिलाए, चाहे दुनिया में हो या आख़िरत में।
  2. ज़ालिमों (काफ़िरों, मुशरिकों और अत्याचारियों) से दिली नफ़रत और उनसे अलग रहने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उनका साथ इंसान को अल्लाह के अज़ाब में डाल सकता है।
  3. यह आयत हमें यह भी बताती है कि आख़िरत के दिन हर इंसान अपने अमल के हिसाब से ही पहचाना जाएगा, और नेक लोग बुरे लोगों से अलग हो जाएँगे।
  4. दुआ में अल्लाह से अच्छा अंजाम माँगना और उसकी रहमत की उम्मीद रखना मोमिन की सिफ़त है, क्योंकि अल्लाह ही है जो अपने बंदों को जहन्नम से बचाकर जन्नत में दाख़िल करता है।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपनी ज़िंदगी में ऐसे कामों से बचे जो उसे ज़ालिमों के साथ खड़ा कर दें, और हमेशा नेकी और ईमान की राह पर चले ताकि आख़िरत में उसका हश्र नेक लोगों के साथ हो।


📜 आयत 45-49 — अल-आराफ

45الَّذِينَ يَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا وَهُم بِالْآخِرَةِ كَافِرُونَ
जो ख़ुदा की राह से लोगों को रोकते थे और उसमें (ख्वामख्वाह) कज़ी (टेढ़ापन) करना चाहते थे और वह रोज़े आख़ेरत से इन्कार करते थे
46وَبَيْنَهُمَا حِجَابٌ ۚ وَعَلَى الْأَعْرَافِ رِجَالٌ يَعْرِفُونَ كُلًّا بِسِيمَاهُمْ ۚ وَنَادَوْا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَن سَلَامٌ عَلَيْكُمْ ۚ لَمْ يَدْخُلُوهَا وَهُمْ يَطْمَعُونَ
और बेहश्त व दोज़ख के दरमियान एक हद फ़ासिल है और कुछ लोग आराफ़ पर होगें जो हर शख्स को (बेहिश्ती हो या जहन्नुमी) उनकी पेशानी से पहचान लेगें और वह जन्नत वालों को आवाज़ देगें कि तुम पर सलाम हो या (आराफ़ वाले) लोग अभी दाख़िले जन्नत नहीं हुए हैं मगर वह तमन्ना ज़रूर रखते हैं
47۞ وَإِذَا صُرِفَتْ أَبْصَارُهُمْ تِلْقَاءَ أَصْحَابِ النَّارِ قَالُوا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
और जब उनकी निगाहें पलटकर जहन्नुमी लोगों की तरफ जा पड़ेगीं (तो उनकी ख़राब हालत देखकर ख़ुदा से अर्ज़ करेगें) ऐ हमारे परवरदिगार हमें ज़ालिम लोगों का साथी न बनाना
48وَنَادَىٰ أَصْحَابُ الْأَعْرَافِ رِجَالًا يَعْرِفُونَهُم بِسِيمَاهُمْ قَالُوا مَا أَغْنَىٰ عَنكُمْ جَمْعُكُمْ وَمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ
और आराफ वाले कुछ (जहन्नुमी) लोगों को जिन्हें उनका चेहरा देखकर पहचान लेगें आवाज़ देगें और और कहेगें अब न तो तुम्हारा जत्था ही तुम्हारे काम आया और न तुम्हारी शेखी बाज़ी ही (सूद मन्द हुई)
49أَهَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمْتُمْ لَا يَنَالُهُمُ اللَّهُ بِرَحْمَةٍ ۚ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمْ وَلَا أَنتُمْ تَحْزَنُونَ
जो तुम दुनिया में किया करते थे यही लोग वह हैं जिनकी निस्बत तुम कसमें खाया करते थे कि उन पर ख़ुदा (अपनी) रहमत न करेगा (देखो आज वही लोग हैं जिनसे कहा गया कि बेतकल्लुफ) बेहश्त में चलो जाओ न तुम पर कोई खौफ है और न तुम किसी तरह आर्ज़ुदा ख़ातिर परेशानी होगी
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अनुवाद — अल-आराफ 47

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Tuesday, August 18, 2026

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