Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- افترينا: हमने झूठ गढ़ा या मनगढ़ंत बात बनाई।
- ملتكم: तुम्हारा धर्म, तुम्हारा पंथ (यहाँ शिर्क और कुफ्र का रास्ता)।
- نجانا: हमें मुक्त किया, बचाया।
- ما يكون لنا: हमारे लिए उचित नहीं, संभव नहीं।
- وسع: घेर लिया, अपने ज्ञान से सब कुछ शामिल कर लिया।
- افتح: फैसला कर दे, हमारे और उनके बीच न्याय कर दे।
- الفاتحين: फैसला करने वालों में सबसे बेहतर, न्याय करने वाला।
तफसीर (व्याख्या):
हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को समझाने के बाद, जब उन्होंने देखा कि वे लोग हठ और ज़िद पर अड़े हैं, तो उन्होंने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा: "अगर हम तुम्हारे धर्म (शिर्क और कुफ्र) की तरफ लौट जाएँ, जबकि अल्लाह ने हमें इससे निकालकर ईमान और तौहीद की नेमत दी है, तो यह अल्लाह पर सबसे बड़ा झूठ बोलना होगा। हम ऐसा कभी नहीं कर सकते।"
फिर उन्होंने यह भी कहा कि हमारे लिए यह संभव नहीं है कि हम अपनी मर्जी से तुम्हारे बातिल रास्ते पर लौट जाएँ, हाँ अगर अल्लाह ही चाहे (और वह कभी ऐसा नहीं चाहता क्योंकि उसने हमें हिदायत दी है), तो बात अलग है। अल्लाह का ज्ञान हर चीज़ को घेरे हुए है, उसे मालूम है कि कौन सी बात बंदों के लिए बेहतर है। हमने अपना पूरा भरोसा अल्लाह पर ही रखा है, उसी पर हमारा सहारा है, और उसी से हम मदद माँगते हैं।
आखिर में, जब उन्होंने क़ौम की तरफ से किसी भी सुधार की उम्मीद नहीं देखी, तो उन्होंने दुआ की: "ऐ हमारे रब! हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई के साथ फैसला कर दे। तू ही सबसे अच्छा फैसला करने वाला है। हमें उन लोगों पर जीत दे जो हक़ का विरोध कर रहे हैं और ज़ुल्म पर अड़े हुए हैं।"
फ़ायदे (सबक):
- ईमान की पक्की नींव: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि एक सच्चा मुसलमान कभी भी हक़ (सच्चाई) को छोड़कर बातिल (झूठ) की तरफ नहीं लौट सकता, चाहे उसे कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े। ईमान के बाद कुफ्र की तरफ लौटना अल्लाह पर झूठ बोलने के बराबर है।
- अल्लाह पर भरोसा: हमें हर मामले में अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। जब हम सच्चाई पर हों, तो अल्लाह हमारी मदद ज़रूर करेगा। तवक्कुल (भरोसा) ही मोमिन की असली ताकत है।
- न्याय की दुआ: जब हमारे और दूसरों के बीच झगड़ा हो और वे हठ करें, तो हमें अल्लाह से न्याय की दुआ करनी चाहिए, न कि खुद ज़ुल्म करना चाहिए। अल्लाह सबसे अच्छा फैसला करने वाला है और उसका फैसला हमेशा हक़ पर होता है।
- अल्लाह का ज्ञान असीमित है: अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है, वह जानता है कि हमारे लिए क्या बेहतर है। इसलिए हमें अपनी अक्ल से बड़े-बड़े फैसले नहीं करने चाहिए, बल्कि अल्लाह की हिदायत के अनुसार चलना चाहिए।
- हक़ पर डटे रहना: हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की यह दुआ हमें सिखाती है कि हक़ की राह पर डटे रहना चाहिए, भले ही पूरी क़ौम विरोध में खड़ी हो। अल्लाह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।
📜 आयत 87-91 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 89
सूरा अल-आराफ आयत 89 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : हम अगरचे तुम्हारे मज़हब से नफरत ही रखते हों (तब…सूरा आयत 89/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 87–91. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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