अल-आराफ · 89/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا إِنْ عُدْنَا فِي مِلَّتِكُم بَعْدَ إِذْ نَجَّانَا اللَّهُ مِنْهَا ۚ وَمَا يَكُونُ لَنَا أَن نَّعُودَ فِيهَا إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّنَا ۚ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۚ عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا ۚ رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَأَنتَ خَيْرُ الْفَاتِحِينَ ۝٨٩
Qadif tarainaa `alal laahi kaziban in `udnaa fee millatikum ba`da iz najjaanal laahu minhaa; wa maa yakoonu lanaaa an na`ooda feehaaa illaaa ai yashaaa`al laahu Rabbunaa; wasi`a Rabbunaa kulla shai`in `ilmaa; `alal laahi tawakkalnaa; Rabbanaf tah bainanaa wa baina qawminaa bilhaqqi wa Anta khairul faatiheen
📖 हिंदी अर्थ
हम अगरचे तुम्हारे मज़हब से नफरत ही रखते हों (तब भी लौट जाएं माज़अल्लाह) जब तुम्हारे बातिल दीन से ख़ुदा ने मुझे नजात दी उसके बाद भी अब अगर हम तुम्हारे मज़हब मे लौट जाएं तब हमने ख़ुदा पर बड़ा झूठा बोहतान बॉधा (ना) और हमारे वास्ते तो किसी तरह जायज़ नहीं कि हम तुम्हारे मज़हब की तरफ लौट जाएँ मगर हाँ जब मेरा परवरदिगार अल्लाह चाहे तो हमारा परवरदिगार तो (अपने) इल्म से तमाम (आलम की) चीज़ों को घेरे हुए है हमने तो ख़ुदा ही पर भरोसा कर लिया ऐ हमारे परवरदिगार तू ही हमारे और हमारी क़ौम के दरमियान ठीक ठीक फैसला कर दे और तू सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • افترينا: हमने झूठ गढ़ा या मनगढ़ंत बात बनाई।
  • ملتكم: तुम्हारा धर्म, तुम्हारा पंथ (यहाँ शिर्क और कुफ्र का रास्ता)।
  • نجانا: हमें मुक्त किया, बचाया।
  • ما يكون لنا: हमारे लिए उचित नहीं, संभव नहीं।
  • وسع: घेर लिया, अपने ज्ञान से सब कुछ शामिल कर लिया।
  • افتح: फैसला कर दे, हमारे और उनके बीच न्याय कर दे।
  • الفاتحين: फैसला करने वालों में सबसे बेहतर, न्याय करने वाला।

तफसीर (व्याख्या):

हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को समझाने के बाद, जब उन्होंने देखा कि वे लोग हठ और ज़िद पर अड़े हैं, तो उन्होंने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा: "अगर हम तुम्हारे धर्म (शिर्क और कुफ्र) की तरफ लौट जाएँ, जबकि अल्लाह ने हमें इससे निकालकर ईमान और तौहीद की नेमत दी है, तो यह अल्लाह पर सबसे बड़ा झूठ बोलना होगा। हम ऐसा कभी नहीं कर सकते।"

फिर उन्होंने यह भी कहा कि हमारे लिए यह संभव नहीं है कि हम अपनी मर्जी से तुम्हारे बातिल रास्ते पर लौट जाएँ, हाँ अगर अल्लाह ही चाहे (और वह कभी ऐसा नहीं चाहता क्योंकि उसने हमें हिदायत दी है), तो बात अलग है। अल्लाह का ज्ञान हर चीज़ को घेरे हुए है, उसे मालूम है कि कौन सी बात बंदों के लिए बेहतर है। हमने अपना पूरा भरोसा अल्लाह पर ही रखा है, उसी पर हमारा सहारा है, और उसी से हम मदद माँगते हैं।

आखिर में, जब उन्होंने क़ौम की तरफ से किसी भी सुधार की उम्मीद नहीं देखी, तो उन्होंने दुआ की: "ऐ हमारे रब! हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई के साथ फैसला कर दे। तू ही सबसे अच्छा फैसला करने वाला है। हमें उन लोगों पर जीत दे जो हक़ का विरोध कर रहे हैं और ज़ुल्म पर अड़े हुए हैं।"

फ़ायदे (सबक):

  1. ईमान की पक्की नींव: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि एक सच्चा मुसलमान कभी भी हक़ (सच्चाई) को छोड़कर बातिल (झूठ) की तरफ नहीं लौट सकता, चाहे उसे कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े। ईमान के बाद कुफ्र की तरफ लौटना अल्लाह पर झूठ बोलने के बराबर है।
  2. अल्लाह पर भरोसा: हमें हर मामले में अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। जब हम सच्चाई पर हों, तो अल्लाह हमारी मदद ज़रूर करेगा। तवक्कुल (भरोसा) ही मोमिन की असली ताकत है।
  3. न्याय की दुआ: जब हमारे और दूसरों के बीच झगड़ा हो और वे हठ करें, तो हमें अल्लाह से न्याय की दुआ करनी चाहिए, न कि खुद ज़ुल्म करना चाहिए। अल्लाह सबसे अच्छा फैसला करने वाला है और उसका फैसला हमेशा हक़ पर होता है।
  4. अल्लाह का ज्ञान असीमित है: अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है, वह जानता है कि हमारे लिए क्या बेहतर है। इसलिए हमें अपनी अक्ल से बड़े-बड़े फैसले नहीं करने चाहिए, बल्कि अल्लाह की हिदायत के अनुसार चलना चाहिए।
  5. हक़ पर डटे रहना: हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की यह दुआ हमें सिखाती है कि हक़ की राह पर डटे रहना चाहिए, भले ही पूरी क़ौम विरोध में खड़ी हो। अल्लाह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।
🎧 सुनें

📜 आयत 87-91 — अल-आराफ

87وَإِن كَانَ طَائِفَةٌ مِّنكُمْ آمَنُوا بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ وَطَائِفَةٌ لَّمْ يُؤْمِنُوا فَاصْبِرُوا حَتَّىٰ يَحْكُمَ اللَّهُ بَيْنَنَا ۚ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ
और जिन बातों का मै पैग़ाम लेकर आया हूँ अगर तुममें से एक गिरोह ने उनको मान लिया और एक गिरोह ने नहीं माना तो (कुछ परवाह नहीं) तो तुम सब्र से बैठे (देखते) रहो यहाँ तक कि ख़ुदा (खुद) हमारे दरमियान फैसला कर दे, वह तो सबसे बेहतर फैसला करने वाला है
88۞ قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِن قَوْمِهِ لَنُخْرِجَنَّكَ يَا شُعَيْبُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَكَ مِن قَرْيَتِنَا أَوْ لَتَعُودُنَّ فِي مِلَّتِنَا ۚ قَالَ أَوَلَوْ كُنَّا كَارِهِينَ
तो उनकी क़ौम में से जिन लोगों को (अपनी हशमत (दुनिया पर) बड़ा घमण्ड था कहने लगे कि ऐ शुएब हम तुम्हारे साथ ईमान लाने वालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर कर देगें मगर जबकि तुम भी हमारे उसी मज़हब मिल्लत में लौट कर आ जाओ
89قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا إِنْ عُدْنَا فِي مِلَّتِكُم بَعْدَ إِذْ نَجَّانَا اللَّهُ مِنْهَا ۚ وَمَا يَكُونُ لَنَا أَن نَّعُودَ فِيهَا إِلَّا أَن يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّنَا ۚ وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۚ عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا ۚ رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَأَنتَ خَيْرُ الْفَاتِحِينَ
हम अगरचे तुम्हारे मज़हब से नफरत ही रखते हों (तब भी लौट जाएं माज़अल्लाह) जब तुम्हारे बातिल दीन से ख़ुदा ने मुझे नजात दी उसके बाद भी अब अगर हम तुम्हारे मज़हब मे लौट जाएं तब हमने ख़ुदा पर बड़ा झूठा बोहतान बॉधा (ना) और हमारे वास्ते तो किसी तरह जायज़ नहीं कि हम तुम्हारे मज़हब की तरफ लौट जाएँ मगर हाँ जब मेरा परवरदिगार अल्लाह चाहे तो हमारा परवरदिगार तो (अपने) इल्म से तमाम (आलम की) चीज़ों को घेरे हुए है हमने तो ख़ुदा ही पर भरोसा कर लिया ऐ हमारे परवरदिगार तू ही हमारे और हमारी क़ौम के दरमियान ठीक ठीक फैसला कर दे और तू सबसे बेहतर फ़ैसला करने वाला है
90وَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ لَئِنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ
और उनकी क़ौम के चन्द सरदार जो काफिर थे (लोगों से) कहने लगे कि अगर तुम लोगों ने शुएब की पैरवी की तो उसमें शक़ ही नहीं कि तुम सख्त घाटे में रहोगे
91فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ
ग़रज़ उन लोगों को ज़लज़ले ने ले डाला बस तो वह अपने घरों में औन्धे पड़े रह गए
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अनुवाद — अल-आराफ 89

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Tuesday, August 18, 2026

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