ये आयत उन लोगों (यहूदियों) के बारे में है, जिनसे आपने (ऐ नबी!) संधि और समझौता किया था, जैसे बनी क़ुरैज़ा और कअब इब्न अशरफ़ और उनके साथी। उन्होंने आपसे वचन लिया था कि वे आपके विरुद्ध किसी की सहायता नहीं करेंगे और न ही आपसे युद्ध करेंगे। लेकिन वे हर बार अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ते रहे—जब भी उन्होंने कोई वचन दिया, उसे भंग कर दिया। उन्होंने मक्का के मुशरिकों को हथियार और सहायता प्रदान की, ताकि वे आपसे युद्ध कर सकें। वे अल्लाह से बिल्कुल नहीं डरते, न अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का ख़याल रखते हैं और न ही अल्लाह की पकड़ से सावधान रहते हैं। यह उनकी आदत थी कि वे हर समझौते को तोड़ देते थे, क्योंकि उनके दिलों में ईमान और अल्लाह का भय नहीं था।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि वचन और समझौते को पूरा करना इस्लाम का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह अपने वादों को पूरा करे, चाहे सामने वाला कोई भी हो।
यह आयत उन लोगों के धोखे से सावधान रहने की शिक्षा देती है जो बार-बार वचन तोड़ते हैं। हमें चाहिए कि ऐसे लोगों से निपटने में सतर्कता बरतें।
अल्लाह का भय (तक़वा) ही वह चीज़ है जो इंसान को बुरे कामों से रोकती है। जिसके दिल में अल्लाह का डर नहीं, वह किसी भी गुनाह को करने से नहीं झिझकता।
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में अमानतदारी और ईमानदारी बहुत बड़ी नेमत है। जो लोग इन गुणों से वंचित हैं, वे समाज के लिए खतरा हैं।
मुसलमान को चाहिए कि वह अपने अल्लाह से डरने वाला और अपने वादों का पक्का हो, ताकि उसका जीवन दूसरों के लिए नमूना बन सके और लोग इस्लाम की सच्चाई को समझ सकें।
(उन लोगों की हालत) क़ौम फिरऔन और उन लोगों की सी है जो उनसे पहले थे और अपने परवरदिगार की आयतों को झुठलाते थे तो हमने भी उनके गुनाहों की वजह से उनको हलाक़ कर डाला और फिरऔन की क़ौम को डुबा मारा और (ये) सब के सब ज़ालिम थे
तो अगर वह लड़ाई में तुम्हारे हाथे चढ़ जाएँ तो (ऐसी सख्त गोश्माली दो कि) उनके साथ साथ उन लोगों का तो अगर वह लड़ाई में तुम्हारे हत्थे चढ़ जाएं तो (ऐसी सजा दो की) उनके साथ उन लोगों को भी तितिर बितिर कर दो जो उन के पुश्त पर हो ताकि ये इबरत हासिल करें
और अगर तुम्हें किसी क़ौम की ख्यानत (एहद शिकनी(वादा ख़िलाफी)) का ख़ौफ हो तो तुम भी बराबर उनका एहद उन्हीं की तरफ से फेंक मारो (एहदो शिकन के साथ एहद शिकनी करो ख़ुदा हरगिज़ दग़ाबाजों को दोस्त नहीं रखता
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।