अत-तौबा · 106/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَآخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِأَمْرِ اللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝١٠٦
Wa aakharoona murjawna li amril laahi imaa yu`az zibuhum wa immaa yatoobu `alaihim; wallaahu `Aleemun Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
और कुछ लोग हैं जो हुक्मे ख़ुदा के उम्मीदवार किए गए हैं (उसको अख्तेयार है) ख्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और ख़ुदा (तो) बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُرْجَوْنَ (मुर्जौन): टाल दिए गए, स्थगित किए गए, जिनके मामले को अल्लाह के फैसले पर छोड़ दिया गया हो।
  • لِأَمْرِ اللَّهِ (लि-अम्रिल्लाह): अल्लाह के आदेश और फैसले के लिए।
  • إِمَّا (इम्मा): या तो... या फिर (दो विकल्पों में से एक)।
  • يَتُوبُ عَلَيْهِمْ (यतूबु अलैहिम): उन पर दया करके उनकी तौबा क़बूल करे।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमानवालों! उन लोगों में से जो (ग़ज़वा-ए-तबूक में) पीछे रह गए थे, कुछ और लोग भी हैं जिनका मामला अल्लाह के हुक्म पर टाल दिया गया है। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी ग़लती पर पछतावा तो किया, लेकिन उनकी तौबा का फ़ैसला अभी अल्लाह ने सुनाया नहीं था। अल्लाह ने उनके मामले को अपनी मर्ज़ी पर छोड़ दिया है—या तो वह उन्हें उनके कुसूर (कसूर) की सज़ा में अज़ाब देगा, या फिर उनकी तौबा क़बूल करके उन्हें माफ़ कर देगा। ये तीन सहाबी थे: मुरारा इब्न रबीअ, कअब इब्न मालिक और हिलाल इब्न उमय्या। उन्होंने ग़ज़वा-ए-तबूक में जाने से पीछे रहने पर सच्ची तौबा की थी, लेकिन अल्लाह ने उनकी परीक्षा के लिए उनका फ़ैसला पचास दिनों तक टाल दिया। इस दौरान वे बड़ी मुश्किल और बेचैनी में रहे। अल्लाह उनके दिलों की हालत को भली-भाँति जानता है कि कौन सच्चे दिल से तौबा कर रहा है और कौन नहीं। वह अपने फ़ैसले में पूरा हकीम (तत्वदर्शी) है—हर काम बुद्धिमानी और न्याय के साथ करता है। आख़िरकार अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल की और उन्हें माफ़ कर दिया।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह का फैसला टल सकता है, लेकिन उसकी रहमत कभी बंद नहीं होती: जब इंसान सच्चे दिल से तौबा करता है, तो अल्लाह चाहे तो उसे तुरंत माफ़ कर दे, चाहे तो उसकी परीक्षा के लिए देर करे—लेकिन अंत में उसकी रहमत ही जीतती है। इससे हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
  2. सच्ची तौबा की ताक़त: कअब इब्न मालिक और उनके साथियों ने पचास दिनों तक मुश्किलें झेलीं, लेकिन उन्होंने झूठा बहाना नहीं बनाया। सच्चाई और ईमानदारी पर डटे रहे। यह हमें सिखाता है कि ग़लती के बाद सच्चाई से पलटना और अल्लाह के सामने झुकना सबसे बड़ी जीत है।
  3. अल्लाह का इल्म और हिकमत: अल्लाह हर दिल का हाल जानता है। वह जानता है कि कौन सच्चा है और कौन दिखावा कर रहा है। इसलिए हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए—वह कभी ज़ुल्म नहीं करता, और उसका हर फैसला हिकमत से भरा होता है।
  4. गुनाह के बाद निराशा नहीं: यह आयत उन लोगों के लिए बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी है जिनसे गुनाह हो जाता है। अल्लाह का दरवाज़ा तौबा के लिए हमेशा खुला है। चाहे गुनाह कितना भी बड़ा हो, अल्लाह की रहमत उससे कहीं बड़ी है। बस शर्त है—दिल से तौबा करो और अल्लाह की तरफ़ लौट आओ।
  5. समाज में इज़्ज़त अल्लाह के फैसले से है: इन सहाबियों को समाज से अलग कर दिया गया था, लेकिन जब अल्लाह ने उन्हें माफ़ किया, तो उनकी इज़्ज़त और भी बढ़ गई। यह सिखाता है कि असली इज़्ज़त अल्लाह के पास है—वही उठाता है और वही गिराता है।


📜 आयत 104-108 — अत-तौबा

104أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ هُوَ يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَأْخُذُ الصَّدَقَاتِ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ
क्या इन लोगों ने इतने भी नहीं जाना यक़ीनन ख़ुदा बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और वही ख़ैरातें (भी) लेता है और इसमें शक़ नहीं कि वही तौबा का बड़ा कुबूल करने वाला मेहरबान है
105وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَ ۖ وَسَتُرَدُّونَ إِلَىٰ عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
और (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम लोग अपने अपने काम किए जाओ अभी तो ख़ुदा और उसका रसूल और मोमिनीन तुम्हारे कामों को देखेगें और बहुत जल्द (क़यामत में) ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटाए जाऎंगे तब वह जो कुछ भी तुम करते थे तुम्हें बता देगा
106وَآخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِأَمْرِ اللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और कुछ लोग हैं जो हुक्मे ख़ुदा के उम्मीदवार किए गए हैं (उसको अख्तेयार है) ख्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और ख़ुदा (तो) बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है
107وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مَسْجِدًا ضِرَارًا وَكُفْرًا وَتَفْرِيقًا بَيْنَ الْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًا لِّمَنْ حَارَبَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ مِن قَبْلُ ۚ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا الْحُسْنَىٰ ۖ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
और (वह लोग भी मुनाफिक़ हैं) जिन्होने (मुसलमानों के) नुकसान पहुंचाने और कुफ़्र करने वाले और मोमिनीन के दरमियान तफरक़ा (फूट) डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो ख़ुदा और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है (और लुत्फ़ तो ये है कि) ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और ख़ुदा ख़ुद गवाही देता है
108لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًا ۚ لَّمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَىٰ مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَن تَقُومَ فِيهِ ۚ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُوا ۚ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ
ये लोग यक़ीनन झूठे है (ऐ रसूल) तुम इस (मस्जिद) में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे होकर (नमाज़ पढ़ो क्योंकि) उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और ख़ुदा भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है
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अनुवाद — अत-तौबा 106

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Tuesday, August 18, 2026

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