यूनुस · 36/109
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूनुस
وَمَا يَتَّبِعُ أَكْثَرُهُمْ إِلَّا ظَنًّا ۚ إِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ ۝٣٦
Wa maa yattabi`u aksaruhum illaa zannaa; innaz zanna laa yughnee minal haqqi shai`aa; innal laaha `Aleemum bimaa yaf`aloon
📖 हिंदी अर्थ
तुम कैसे हुक्म लगाते हो और उनमें के अक्सर तो बस अपने गुमान पर चलते हैं (हालॉकि) गुमान यक़ीन के मुक़ाबले में हरगिज़ कुछ भी काम नहीं आ सकता बेशक वह लोग जो कुछ (भी) कर रहे हैं खुदा उसे खूब जानता है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ظَنًّا (ज़न्नन): अनुमान, अटकल, बिना प्रमाण के धारणा, संदेह और भ्रम।
  • لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا (ला युग्नी मिनल हक़्क़ि शै'अ): सत्य के मुकाबले में कुछ भी काम नहीं आता, अर्थात यह सत्य का विकल्प नहीं बन सकता।
  • عَلِيمٌ (अलीम): सब कुछ जानने वाला, पूर्ण ज्ञान रखने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की स्थिति को स्पष्ट करती है जो बिना किसी ठोस ज्ञान और प्रमाण के, केवल अपने पूर्वजों की अंधी परंपरा, मनगढ़ंत कल्पनाओं और निराधार अनुमानों के आधार पर झूठे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उनका यह मानना कि ये मूर्तियाँ उन्हें अल्लाह के करीब लाएँगी या उनकी सिफ़ारिश करेंगी, महज़ एक खोखला अनुमान है, जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह अनुमान और अटकल सत्य के मुकाबले में किसी काम की नहीं है। सत्य तो वही है जो प्रमाण और यक़ीन पर आधारित हो, और यक़ीन केवल अल्लाह की वही और उसके पैग़म्बरों की शिक्षाओं से ही मिल सकता है। जो लोग केवल अनुमानों पर चलते हैं, वे हक़ (सत्य) से वंचित रहते हैं, क्योंकि अनुमान कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकता।

अंत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि वह उन सब कामों से पूर्ण रूप से अवगत है जो ये लोग करते हैं। उसके ज्ञान से कोई भी बात छिपी नहीं है — न उनका कुफ़्र, न उनका झूठ, न उनकी बुरी नीयतें। और यही ज्ञान उनके लिए चेतावनी है कि वे अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतेंगे।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अनुमान और अटकल से बचना: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि धर्म और आस्था के मामलों में केवल अनुमान, अंधी परंपरा या पूर्वजों की नक़ल पर चलना सरासर गुमराही है। हमें हर बात को ज्ञान और प्रमाण के आधार पर समझना चाहिए।
  2. सत्य की पहचान: सत्य केवल वही है जो अल्लाह की वही (प्रकाशितवाक्य) और उसके रसूल की शिक्षा से साबित हो। अनुमान और कल्पना कभी भी सत्य का विकल्प नहीं बन सकते। यह हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन के हर पहलू में सत्य की तलाश करें, न कि केवल अपनी मनमानी धारणाओं पर चलें।
  3. अल्लाह की निगरानी का एहसास: यह आयत हमें याद दिलाती है कि अल्लाह हमारे हर काम, हर नीयत और हर विचार से पूर्ण रूप से वाक़िफ़ है। यह एहसास हमें ग़लत कामों से रोकता है और अच्छे कामों की तरफ़ प्रेरित करता है। जब हमें यक़ीन हो कि अल्लाह सब देख रहा है, तो हम अपने आचरण को सुधारने की कोशिश करते हैं।
  4. ज्ञान की अहमियत: इस आयत में ज्ञान (इल्म) की अहमियत को रेखांकित किया गया है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह अपने दीन को समझे, उसका ज्ञान हासिल करे और बिना ज्ञान के किसी भी मामले में फ़ैसला न करे। यही वह रास्ता है जो इंसान को हक़ तक पहुँचाता है।


📜 आयत 34-38 — सूरा यूनुस

34قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ۚ قُلِ اللَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि तुम ने जिन लोगों को (ख़ुदा का) शरीक बनाया है कोई भी ऐसा है जो मख़लूकात को पहली बार पैदा करे फिर उन को (मरने के बाद) दोबारा ज़िन्दा करे (तो क्या जवाब देगें) तुम्ही कहो कि ख़ुदा ही पहले भी पैदा करता है फिर वही दोबारा ज़िन्दा करता है तो किधर तुम उल्टे जा रहे हो
35قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ ۚ قُلِ اللَّهُ يَهْدِي لِلْحَقِّ ۗ أَفَمَن يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ أَحَقُّ أَن يُتَّبَعَ أَمَّن لَّا يَهِدِّي إِلَّا أَن يُهْدَىٰ ۖ فَمَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
(ऐ रसूल उनसे) कहो तो कि तुम्हारे (बनाए हुए) शरीकों में से कोई ऐसा भी है जो तुम्हें (दीन) हक़ की राह दिखा सके तुम ही कह दो कि (ख़ुदा) दीन की राह दिखाता है तो जो तुम्हे दीने हक़ की राह दिखाता है क्या वह ज्यादा हक़दार है कि उसके हुक्म की पैरवी की जाए या वह शख़्श जो (दूसरे) की हिदायत तो दर किनार खुद ही जब तक दूसरा उसको राह न दिखाए राह नही देख पाता तो तुम लोगों को क्या हो गया है
36وَمَا يَتَّبِعُ أَكْثَرُهُمْ إِلَّا ظَنًّا ۚ إِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ
तुम कैसे हुक्म लगाते हो और उनमें के अक्सर तो बस अपने गुमान पर चलते हैं (हालॉकि) गुमान यक़ीन के मुक़ाबले में हरगिज़ कुछ भी काम नहीं आ सकता बेशक वह लोग जो कुछ (भी) कर रहे हैं खुदा उसे खूब जानता है
37وَمَا كَانَ هَٰذَا الْقُرْآنُ أَن يُفْتَرَىٰ مِن دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِن تَصْدِيقَ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ الْكِتَابِ لَا رَيْبَ فِيهِ مِن رَّبِّ الْعَالَمِينَ
और ये कुरान ऐसा नहीं कि खुदा के सिवा कोई और अपनी तरफ से झूठ मूठ बना डाले बल्कि (ये तो) जो (किताबें) पहले की उसके सामने मौजूद हैं उसकी तसदीक़ और (उन) किताबों की तफ़सील है उसमें कुछ भी शक़ नहीं कि ये सारे जहाँन के परवरदिगार की तरफ से है
38أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ فَأْتُوا بِسُورَةٍ مِّثْلِهِ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
क्या ये लोग कहते हैं कि इसको रसूल ने खुद झूठ मूठ बना लिया है (ऐ रसूल) तुम कहो कि (अच्छा) तो तुम अगर (अपने दावे में) सच्चे हो तो (भला) एक ही सूरा उसके बराबर का बना लाओ और ख़ुदा के सिवा जिसको तुम्हें (मदद के वास्ते) बुलाते बन पड़े बुला लो
यूनुसकुरान सूची
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36आयत

अनुवाद — यूनुस 36

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Thursday, October 1, 2026

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