यूनुस · 49/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي ضَرًّا وَلَا نَفْعًا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۗ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۚ إِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ ۝٤٩
Qul laaa amliku linafsee darranw wa laa naf`an illaa maa shaaa`al laah; likulli ummatin ajalun izaa jaaa`a ajaluhum falaaa yastaakhiroona saa`a tanw wa laa yastaqdimoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै खुद अपने वास्ते नुकसान पर क़ादिर हूँ न नफा पर मगर जो ख़ुदा चाहे हर उम्मत (के रहने) का (उसके इल्म में) एक वक्त मुक़र्रर है-जब उन का वक्त आ जाता है तो न एक घड़ी पीछे हट सकती हैं और न आगे बढ़ सकते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لا أَمْلِكُ: मैं अधिकार नहीं रखता, मेरे वश में नहीं है।
  • ضَرًّا: हानि, कष्ट, बुराई।
  • نَفْعًا: लाभ, भलाई।
  • أَجَلٌ: नियत समय, मृत्यु या विनाश का निश्चित काल।
  • يَسْتَأْخِرُونَ: पीछे हटते हैं, देर करते हैं।
  • يَسْتَقْدِمُونَ: आगे बढ़ते हैं, पहले लाते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन लोगों से कह दीजिए कि मैं स्वयं अपने लिए किसी हानि को दूर करने या किसी लाभ को प्राप्त करने का अधिकार नहीं रखता। मेरे पास जो कुछ भी है, वह केवल अल्लाह की इच्छा और उसकी मर्ज़ी से है। जब अल्लाह चाहता है तो मुझसे कोई भलाई होती है, और जब वह चाहता है तो कोई बुराई टलती है। मेरी अपनी स्थिति यह है कि मैं अपने लिए भी कुछ नहीं कर सकता, फिर मैं दूसरों के लिए क्या कर सकता हूँ? मुझे ग़ैब (छिपी हुई बातों) का ज्ञान भी नहीं है।

फिर आप उन्हें बताइए कि हर उम्मत (समुदाय) के लिए अल्लाह की ओर से एक नियत समय निर्धारित है। जब वह समय आ जाता है, तो न वह एक पल के लिए पीछे हट सकती है और न ही आगे बढ़ सकती है। यानी जब अल्लाह का फैसला आ जाता है, तो उसे टालना या जल्दी करना किसी के बस में नहीं होता। यह बात उन लोगों को समझाने के लिए कही गई है जो आपसे आज़ाब (यातना) जल्दी लाने की मांग करते थे और मज़ाक़ उड़ाते थे। उन्हें बताया जा रहा है कि अल्लाह की योजना के अनुसार हर चीज़ का एक समय है, और वह समय आकर ही रहेगा।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि नबी और रसूल भी अपनी ताक़त से कुछ नहीं कर सकते, बल्कि सब कुछ अल्लाह की मर्ज़ी से होता है। इसलिए हमें अपनी सारी उम्मीदें और भरोसा केवल अल्लाह पर रखना चाहिए।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन और मृत्यु, सुख और दुख — सब कुछ अल्लाह के हाथ में है। इसलिए हमें किसी इंसान की ताक़त पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि अल्लाह की रहमत और क़ुदरत पर आस्था रखनी चाहिए।
  3. हर उम्मत के लिए एक नियत समय होता है, यह हमें याद दिलाता है कि इस दुनिया की ज़िंदगी अस्थायी है। हमें अपने जीवन को अच्छे कर्मों से भरना चाहिए और अल्लाह की आज्ञा का पालन करना चाहिए, क्योंकि मौत का समय निश्चित है और उसे कोई टाल नहीं सकता।
  4. यह आयत हमें धैर्य और सब्र सिखाती है। जब हम किसी मुसीबत या परेशानी में हों, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि हर चीज़ का एक समय है, और अल्लाह की योजना सबसे अच्छी होती है।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह के फैसले के आगे कोई ताक़त नहीं चलती। इसलिए हमें अपने कर्मों को सुधारना चाहिए और अल्लाह की रहमत के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि वही सबसे बड़ा सहारा है।


📜 आयत 47-51 — यूनुस

47وَلِكُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ رَسُولُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और हर उम्मत का ख़ास (एक) एक रसूल हुआ है फिर जब उनका रसूल (हमारी बारगाह में) आएगा तो उनके दरमियान इन्साफ़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा
48وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
ये लोग कहा करते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो (आख़िर) ये (अज़ाब का वायदा) कब पूरा होगा
49قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي ضَرًّا وَلَا نَفْعًا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۗ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ ۚ إِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ فَلَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै खुद अपने वास्ते नुकसान पर क़ादिर हूँ न नफा पर मगर जो ख़ुदा चाहे हर उम्मत (के रहने) का (उसके इल्म में) एक वक्त मुक़र्रर है-जब उन का वक्त आ जाता है तो न एक घड़ी पीछे हट सकती हैं और न आगे बढ़ सकते हैं
50قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَتَاكُمْ عَذَابُهُ بَيَاتًا أَوْ نَهَارًا مَّاذَا يَسْتَعْجِلُ مِنْهُ الْمُجْرِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम समझते हो कि अगर उसका अज़ाब तुम पर रात को या दिन को आ जाए तो (तुम क्या करोगे) फिर गुनाहगार लोग आख़िर काहे की जल्दी मचा रहे हैं
51أَثُمَّ إِذَا مَا وَقَعَ آمَنتُم بِهِ ۚ آلْآنَ وَقَدْ كُنتُم بِهِ تَسْتَعْجِلُونَ
फिर क्या जब (तुम पर) आ चुकेगा तब उस पर ईमान लाओगे (आहा) क्या अब (ईमान लाए) हालॉकि तुम तो इसकी जल्दी मचाया करते थे
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अनुवाद — यूनुस 49

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Tuesday, August 18, 2026

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