Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- ظَلَمَتْ: अत्याचार किया, यहाँ अर्थ है शिर्क किया (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराया)।
- لَافْتَدَتْ بِهِ: उसके बदले में अपनी मुक्ति (छुटकारा) के लिए दे डालती।
- أَسَرُّوا النَّدَامَةَ: पछतावे को छिपाया (या कुछ व्याख्याओं के अनुसार प्रकट किया)।
- الْقِسْطِ: न्याय, इंसाफ़।
तफ़सीर (व्याख्या):
यदि हर उस व्यक्ति के पास — जिसने अल्लाह के साथ शिर्क करके अपनी आत्मा पर अत्याचार किया — धरती में जो कुछ भी है, सारा धन-दौलत और सारी चीज़ें हों, और वह उन सबको अपने उस भयानक अज़ाब से छुटकारा पाने के लिए फ़िदया (मुक्ति-मूल्य) के रूप में दे देना चाहे, तो वह उसी वक़्त वह सब कुछ दे डाले। लेकिन वहाँ कोई फ़िदया क़बूल नहीं किया जाएगा। जब ये ज़ालिम (मुशरिक) क़ियामत के दिन अल्लाह का अज़ाब अपनी आँखों से देख लेंगे, तो उन्हें अपने कु़फ़्र और शिर्क पर बहुत पछतावा होगा, और वे इस पछतावे को छिपाएँगे — अपने साथियों और पैरोकारों से भी — क्योंकि शर्मिंदगी और ख़ौफ़ उन पर हावी होगा। फिर अल्लाह तआला उन सबके बीच पूरे न्याय के साथ फ़ैसला करेगा — चाहे वे बड़े (सरदार) हों या छोटे (पैरोकार) — और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं होगा। हर शख्स को उसके अपने कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा, न कम, न ज़्यादा। यह फ़ैसला अल्लाह के पूरे इंसाफ़ पर आधारित होगा, और उसका कोई भी फ़ैसला ज़ुल्म से पाक होता है।
फ़ायदे (सबक़):
- यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का अज़ाब इतना सख्त और भयानक है कि उससे बचने के लिए इंसान अपनी सारी दुनियावी चीज़ें भी दे देने को तैयार हो जाएगा, लेकिन वहाँ कोई चीज़ काम नहीं आएगी। इसलिए हमें चाहिए कि इसी दुनिया में अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों पर चलकर उस अज़ाब से बचने का रास्ता अपनाएँ।
- पछतावा और नदामत उस वक़्त बेकार है जब वक़्त निकल चुका हो। असली समझदारी यह है कि इंसान मौत से पहले अपने गुनाहों पर तौबा कर ले और अल्लाह की रहमत का सहारा ले।
- अल्लाह तआला का फ़ैसला पूरे न्याय पर आधारित है। वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। यह हमें सिखाता है कि हमें भी अपने मामलों में इंसाफ़ को अपनाना चाहिए और किसी के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करनी चाहिए।
- यह आयत हमें शिर्क से बचने की ताकीद करती है, क्योंकि शिर्क सबसे बड़ा ज़ुल्म है और इसका अंजाम बहुत बुरा है। तौहीद (अल्लाह की एकता) ही नजात का रास्ता है।
📜 आयत 52-56 — सूरा यूनुस
अनुवाद — यूनुस 54
सूरा यूनुस आयत 54 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म…सूरा आयत 54/109 — सूरा यूनुस يونس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूनुस सुनें, सूरा यूनुस अनुवाद, सूरा यूनुस mp3, सूरा यूनुस pdf. आयत 52–56. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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