Wa law anna likulli nafsin zalamat maa fil ardi laftadat bih; wa asarrun nadaamata lammaa ra awul `azaab, wa qudiya bainahum bilqist; wa hum laa yuzlamoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म किया है (क़यामत के दिन) अगर तमाम ख़ज़ाने जो जमीन में हैं उसे मिल जाएँ तो अपने गुनाह के बदले ज़रुर फिदया दे निकले और जब वह लोग अज़ाब को देखेगें तो इज़हारे निदामत करेगें (शर्मिंदा होंगे) और उनमें बाहम इन्साफ़ के साथ हुक्म दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा (बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور اگر ہر ایک نافرمان شخص کے پاس روئے زمین کی تمام چیزیں ہوں تو (عذاب سے بچنے کے) بدلے میں (سب) دے ڈالے اور جب وہ عذاب کو دیکھیں گے تو (پچھتائیں گے اور) ندامت کو چھپائیں گے۔ اور ان میں انصاف کے ساتھ فیصلہ کر دیا جائے گا اور (کسی طرح کا) ان پر ظلم نہیں ہوگا
ظَلَمَتْ: अत्याचार किया, यहाँ अर्थ है शिर्क किया (अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराया)।
لَافْتَدَتْ بِهِ: उसके बदले में अपनी मुक्ति (छुटकारा) के लिए दे डालती।
أَسَرُّوا النَّدَامَةَ: पछतावे को छिपाया (या कुछ व्याख्याओं के अनुसार प्रकट किया)।
الْقِسْطِ: न्याय, इंसाफ़।
तफ़सीर (व्याख्या):
यदि हर उस व्यक्ति के पास — जिसने अल्लाह के साथ शिर्क करके अपनी आत्मा पर अत्याचार किया — धरती में जो कुछ भी है, सारा धन-दौलत और सारी चीज़ें हों, और वह उन सबको अपने उस भयानक अज़ाब से छुटकारा पाने के लिए फ़िदया (मुक्ति-मूल्य) के रूप में दे देना चाहे, तो वह उसी वक़्त वह सब कुछ दे डाले। लेकिन वहाँ कोई फ़िदया क़बूल नहीं किया जाएगा। जब ये ज़ालिम (मुशरिक) क़ियामत के दिन अल्लाह का अज़ाब अपनी आँखों से देख लेंगे, तो उन्हें अपने कु़फ़्र और शिर्क पर बहुत पछतावा होगा, और वे इस पछतावे को छिपाएँगे — अपने साथियों और पैरोकारों से भी — क्योंकि शर्मिंदगी और ख़ौफ़ उन पर हावी होगा। फिर अल्लाह तआला उन सबके बीच पूरे न्याय के साथ फ़ैसला करेगा — चाहे वे बड़े (सरदार) हों या छोटे (पैरोकार) — और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं होगा। हर शख्स को उसके अपने कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा, न कम, न ज़्यादा। यह फ़ैसला अल्लाह के पूरे इंसाफ़ पर आधारित होगा, और उसका कोई भी फ़ैसला ज़ुल्म से पाक होता है।
फ़ायदे (सबक़):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का अज़ाब इतना सख्त और भयानक है कि उससे बचने के लिए इंसान अपनी सारी दुनियावी चीज़ें भी दे देने को तैयार हो जाएगा, लेकिन वहाँ कोई चीज़ काम नहीं आएगी। इसलिए हमें चाहिए कि इसी दुनिया में अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों पर चलकर उस अज़ाब से बचने का रास्ता अपनाएँ।
पछतावा और नदामत उस वक़्त बेकार है जब वक़्त निकल चुका हो। असली समझदारी यह है कि इंसान मौत से पहले अपने गुनाहों पर तौबा कर ले और अल्लाह की रहमत का सहारा ले।
अल्लाह तआला का फ़ैसला पूरे न्याय पर आधारित है। वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। यह हमें सिखाता है कि हमें भी अपने मामलों में इंसाफ़ को अपनाना चाहिए और किसी के साथ नाइंसाफ़ी नहीं करनी चाहिए।
यह आयत हमें शिर्क से बचने की ताकीद करती है, क्योंकि शिर्क सबसे बड़ा ज़ुल्म है और इसका अंजाम बहुत बुरा है। तौहीद (अल्लाह की एकता) ही नजात का रास्ता है।
और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म किया है (क़यामत के दिन) अगर तमाम ख़ज़ाने जो जमीन में हैं उसे मिल जाएँ तो अपने गुनाह के बदले ज़रुर फिदया दे निकले और जब वह लोग अज़ाब को देखेगें तो इज़हारे निदामत करेगें (शर्मिंदा होंगे) और उनमें बाहम इन्साफ़ के साथ हुक्म दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा (बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा
फिर (क़यामत के दिन) ज़ालिम लोगों से कहा जाएगा कि (अब हमेशा के अज़ाब के मजे चखो (दुनिया में) जैसी तुम्हारी करतूतें तुम्हें (आख़िरत में) वैसा ही बदला दिया जाएगा
और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म किया है (क़यामत के दिन) अगर तमाम ख़ज़ाने जो जमीन में हैं उसे मिल जाएँ तो अपने गुनाह के बदले ज़रुर फिदया दे निकले और जब वह लोग अज़ाब को देखेगें तो इज़हारे निदामत करेगें (शर्मिंदा होंगे) और उनमें बाहम इन्साफ़ के साथ हुक्म दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा (बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।