यूनुस · 53/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
۞ وَيَسْتَنبِئُونَكَ أَحَقٌّ هُوَ ۖ قُلْ إِي وَرَبِّي إِنَّهُ لَحَقٌّ ۖ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ ۝٥٣
Wa yastambi`oonaka ahaqqun huwa qul ee wa Rabbeee innahoo lahaqq; wa maaa antum bimu`jizeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम से लोग पूछतें हैं कि क्या (जो कुछ तुम कहते हो) वह सब ठीक है तुम कह दो (हाँ) अपने परवरदिगार की कसम ठीक है और तुम (ख़ुदा को) हरा नहीं सकते
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَسْتَنبِئُونَكَ: वे आपसे पूछते हैं, आपसे जानकारी माँगते हैं।
  • أَحَقٌّ هُوَ: क्या यह (चेतावनी दिया गया अज़ाब या क़ियामत) सच है?
  • إِي: हाँ (क़सम के साथ पुष्टि करने के लिए)।
  • بِمُعْجِزِينَ: अल्लाह को विवश करने वाले, उससे बच निकलने वाले।

विस्तृत व्याख्या:

ये मुश्किलें (मक्का के मुशरिकीन) आपसे, ऐ नबी! पूछते हैं कि क्या वह अज़ाब जिसकी हमें धमकी दी जाती है—चाहे वह क़ियामत का अज़ाब हो या दुनिया में आने वाली सज़ा—सचमुच सच है? वे यह प्रश्न मज़ाक़ और उपहास के रूप में पूछते हैं, न कि सच्चाई जानने के लिए। अल्लाह आपको आदेश देता है कि आप उन्हें दृढ़ता और विश्वास के साथ उत्तर दें: "हाँ! मेरे रब की क़सम! यह निश्चित रूप से सच है, इसमें कोई संदेह नहीं है।" यह उत्तर किसी भी प्रकार की झिझक या कमज़ोरी से खाली होना चाहिए, क्योंकि यह अल्लाह का वादा है जो अवश्य पूरा होगा। फिर अल्लाह उन्हें चेतावनी देता है: "तुम अल्लाह को विवश करने वाले नहीं हो, न ही तुम उसकी पकड़ से बच सकते हो। तुम उसकी शक्ति और अधिकार में हो, और वह तुम्हें पुनर्जीवित करके तुम्हारे कर्मों का बदला देने पर पूर्ण सक्षम है।"


शिक्षाएँ और लाभ:

  1. सत्य की घोषणा में दृढ़ता: जब बात अल्लाह के वादों और चेतावनियों की हो, तो मुसलमान को बिना किसी हिचकिचाहट के स्पष्ट और दृढ़ उत्तर देना चाहिए, चाहे सामने वाला मज़ाक़ ही क्यों न कर रहा हो।
  2. अल्लाह की शक्ति की याद: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ से कोई नहीं बच सकता। यह विश्वास इंसान को गुनाहों से दूर रखता है और उसे अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है।
  3. क़सम का महत्व: अल्लाह के नाम की क़सम खाकर सत्य की पुष्टि करना इस्लामी तरीक़ा है, जो बात के महत्व को बढ़ाता है और सुनने वाले के दिल पर गहरा असर डालता है।
  4. मज़ाक़ का उत्तर: जो लोग धर्म की बातों का मज़ाक़ उड़ाते हैं, उनसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें गंभीरता और विश्वास के साथ सत्य से अवगत कराना चाहिए।
  5. आख़िरत पर ईमान: यह आयत क़ियामत और उसके अज़ाब पर ईमान लाने की ताकीद करती है, जो मुसलमान के जीवन को उद्देश्य और ज़िम्मेदारी प्रदान करता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 51-55 — यूनुस

51أَثُمَّ إِذَا مَا وَقَعَ آمَنتُم بِهِ ۚ آلْآنَ وَقَدْ كُنتُم بِهِ تَسْتَعْجِلُونَ
फिर क्या जब (तुम पर) आ चुकेगा तब उस पर ईमान लाओगे (आहा) क्या अब (ईमान लाए) हालॉकि तुम तो इसकी जल्दी मचाया करते थे
52ثُمَّ قِيلَ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا بِمَا كُنتُمْ تَكْسِبُونَ
फिर (क़यामत के दिन) ज़ालिम लोगों से कहा जाएगा कि (अब हमेशा के अज़ाब के मजे चखो (दुनिया में) जैसी तुम्हारी करतूतें तुम्हें (आख़िरत में) वैसा ही बदला दिया जाएगा
53۞ وَيَسْتَنبِئُونَكَ أَحَقٌّ هُوَ ۖ قُلْ إِي وَرَبِّي إِنَّهُ لَحَقٌّ ۖ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
(ऐ रसूल) तुम से लोग पूछतें हैं कि क्या (जो कुछ तुम कहते हो) वह सब ठीक है तुम कह दो (हाँ) अपने परवरदिगार की कसम ठीक है और तुम (ख़ुदा को) हरा नहीं सकते
54وَلَوْ أَنَّ لِكُلِّ نَفْسٍ ظَلَمَتْ مَا فِي الْأَرْضِ لَافْتَدَتْ بِهِ ۗ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ ۖ وَقُضِيَ بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म किया है (क़यामत के दिन) अगर तमाम ख़ज़ाने जो जमीन में हैं उसे मिल जाएँ तो अपने गुनाह के बदले ज़रुर फिदया दे निकले और जब वह लोग अज़ाब को देखेगें तो इज़हारे निदामत करेगें (शर्मिंदा होंगे) और उनमें बाहम इन्साफ़ के साथ हुक्म दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा (बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा
55أَلَا إِنَّ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ أَلَا إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
आगाह रहो कि जो कुछ आसमानों में और ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है आग़ाह राहे कि ख़ुदा का वायदा यक़ीनी ठीक है मगर उनमें के अक्सर नहीं जानते हैं
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अनुवाद — यूनुस 53

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Tuesday, August 18, 2026

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