अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- فَلَوْلَا: क्यों न हुआ / काश होता (यहाँ तिरस्कार और दोषारोपण के अर्थ में है)
- الْقُرُونِ: पिछली उम्मतें (समुदाय)
- أُولُو بَقِيَّةٍ: बुद्धि और समझ वाले, भलाई और सुधार के धनी लोग
- يَنْهَوْنَ: रोकते / मना करते
- الْفَسَادِ: बिगाड़, अव्यवस्था, पाप और अत्याचार
- أُتْرِفُوا: आराम-ऐश में डूबे हुए, सुख-सुविधाओं में मग्न
- مُجْرِمِينَ: अपराधी, गुनाहगार
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में पिछली उम्मतों की ओर इशारा करते हुए फ़रमाता है कि काश! तुमसे पहले गुज़री हुई उन क़ौमों में से कुछ ऐसे लोग होते जो अक़्लमंद, समझदार और नेक होते, जो ज़मीन में फैलने वाले फ़साद (बिगाड़) से रोकते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ — उन उम्मतों में से बहुत कम लोग थे जो नेकी का हुक्म देते और बुराई से रोकते थे। यही कुछ लोग थे जिन्हें अल्लाह ने उस वक़्त बचा लिया जब उनकी क़ौमों पर अज़ाब आया।
बाक़ी जो लोग ज़ालिम थे, उन्होंने उसी ऐश-ओ-आराम और दुनियावी लज़्ज़तों का पीछा किया जिनमें वे डूबे हुए थे। उन्होंने अपनी ख्वाहिशों को अपना मालिक बना लिया और हक़ को छोड़ दिया। वे अपने इसी रवैये की वजह से मुजरिम (अपराधी) बन गए और उन पर अल्लाह का अज़ाब वाजिब हो गया।
इस आयत का मक़सद यह है कि अल्लाह ने जब पिछली क़ौमों को उनके कुफ़्र और फ़साद की वजह से हलाक किया, तो इसका सबब यह था कि उनमें नेकी का हुक्म देने वाले और बुराई से रोकने वाले नहीं थे। जो थोड़े से नेक लोग थे, उन्हें अल्लाह ने बचा लिया। यह एक सबक़ है कि जब किसी समाज में अच्छे लोग चुप हो जाएँ और बुराई को रोकना छोड़ दें, तो अल्लाह की पकड़ आती है।
फ़ायदे (सीख):
- अम्र बिल-मारूफ़ और नही अनिल-मुन्कर (नेकी का हुक्म देना और बुराई से रोकना) इस्लाम का एक बुनियादी सिद्धांत है। यही वह चीज़ है जो किसी समाज को अल्लाह की पकड़ से बचाती है।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दुनियावी ऐश-ओ-आराम और सुख-सुविधाओं में डूब जाना इंसान को हक़ से दूर कर देता है। जो लोग सिर्फ़ दुनिया की ख्वाहिशों में मग्न हो जाते हैं, वे आख़िरत को भूल जाते हैं और गुनाहों में मुब्तिला हो जाते हैं।
- अल्लाह की रहमत उन लोगों के साथ होती है जो उसके दीन पर क़ायम रहते हैं, चाहे वे कितने ही कम क्यों न हों। अल्लाह ने उन थोड़े से नेक लोगों को बचा लिया, जबकि बड़ी से बड़ी क़ौमें तबाह कर दी गईं।
- यह आयत हमें चेतावनी देती है कि अगर हमारे समाज में बुराई फैल रही है और हम चुप रहेंगे, तो अल्लाह की पकड़ पूरी उम्मत पर आ सकती है। इसलिए हर मुसलमान को अपनी हैसियत के मुताबिक़ नेकी का हुक्म देना चाहिए और बुराई से रोकना चाहिए।
- इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह इंसाफ़ करने वाला है — वह नेक लोगों को उनके अमल के बदले बचाता है और ज़ालिमों को उनके कु़सूर के बदले पकड़ता है। यह अल्लाह की रहमत और अद्ल दोनों का सबूत है।
📜 आयत 114-118 — हूद
अनुवाद — हूद 116
सूरा हूद आयत 116 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनमें कुछ…सूरा आयत 116/123 — हूद هود (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: हूद सुनें, हूद अनुवाद, हूद mp3, हूद pdf. आयत 114–118. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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