हूद · 117/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ ۝١١٧
Wa maa kaana Rabbuka liyuhlikal quraa bizulminw wa ahluhaa muslihoon
📖 हिंदी अर्थ
और तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता और वहाँ के लोग नेक चलन हों
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِيُهْلِكَ: विनष्ट करने के लिए, हलाक करने के लिए।
  • الْقُرَىٰ: बस्तियों को, बसाहटों को।
  • بِظُلْمٍ: अत्याचार के साथ, ज़ुल्म करते हुए।
  • مُصْلِحُونَ: सुधार करने वाले, अच्छे कर्म करने वाले, ईमानवाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! आपका रब ऐसा नहीं है कि वह किसी बस्ती को उसके निवासियों पर अत्याचार करते हुए विनष्ट कर दे, जबकि उसके लोग सुधार करने वाले हों, अपने कर्मों को अच्छा बनाने वाले हों और ईमान की राह पर चल रहे हों। अल्लाह तआला किसी पर ज़ुल्म नहीं करता और न ही उसकी सज़ा किसी बेगुनाह को मिलती है। वह तो केवल उन्हीं बस्तियों को हलाक करता है जिनके निवासी कुफ्र, शिर्क, अत्याचार और बुराइयों में डूबे हुए हों, जो ज़मीन पर फ़साद फैलाते हों। जब लोग सुधार की राह पर होते हैं, तो अल्लाह की रहमत उन्हें घेर लेती है और वह उन्हें सज़ा से बचा लेता है। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) है कि वह नेक और सुधार करने वाले लोगों को उनके पापियों की वजह से भी तब तक सज़ा नहीं देता जब तक वे स्वयं बुराई की ओर न मुड़ जाएँ।

फ़ायदे (लाभ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अत्यंत दयालु और न्यायी है, वह कभी किसी पर ज़ुल्म नहीं करता। उसकी सज़ा हमेशा इंसाफ़ पर आधारित होती है।
  2. समाज में सुधार और अच्छाई का बहुत महत्व है। जब लोग नेक काम करते हैं और आपस में भलाई फैलाते हैं, तो अल्लाह की रहमत उन पर नाज़िल होती है और वह उन्हें मुसीबतों से बचाता है।
  3. यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की पकड़ केवल उन्हीं पर आती है जो ज़ुल्म और फ़साद फैलाते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने समाज में सुधार लाने की कोशिश करें, न कि बिगाड़ पैदा करें।
  4. इससे हमें यह उम्मीद मिलती है कि अगर हम ईमान और नेक कर्मों पर स्थिर रहें, तो अल्लाह की सुरक्षा हमारे साथ है, चाहे हमारे आसपास कितनी भी बुराइयाँ क्यों न हों।
🎧 सुनें

📜 आयत 115-119 — हूद

115وَاصْبِرْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र करो क्योंकि ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता
116فَلَوْلَا كَانَ مِنَ الْقُرُونِ مِن قَبْلِكُمْ أُولُو بَقِيَّةٍ يَنْهَوْنَ عَنِ الْفَسَادِ فِي الْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًا مِّمَّنْ أَنجَيْنَا مِنْهُمْ ۗ وَاتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مَا أُتْرِفُوا فِيهِ وَكَانُوا مُجْرِمِينَ
फिर जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनमें कुछ लोग ऐसे अक़ल वाले क्यों न हुए जो (लोगों को) रुए ज़मीन पर फसाद फैलाने से रोका करते (ऐसे लोग थे तो) मगर बहुत थोड़े से और ये उन्हीं लोगों से थे जिनको हमने अज़ाब से बचा लिया और जिन लोगों ने नाफरमानी की थी वह उन्हीं (लज्ज़तों) के पीछे पड़े रहे और जो उन्हें दी गई थी और ये लोग मुजरिम थे ही
117وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ
और तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता और वहाँ के लोग नेक चलन हों
118وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ النَّاسَ أُمَّةً وَاحِدَةً ۖ وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ
और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो बेशक तमाम लोगों को एक ही (किस्म की) उम्मत बना देता (मगर) उसने न चाहा इसी (वजह से) लोग हमेशा आपस में फूट डाला करेगें
119إِلَّا مَن رَّحِمَ رَبُّكَ ۚ وَلِذَٰلِكَ خَلَقَهُمْ ۗ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
मगर जिस पर तुम्हारा परवरदिगार रहम फरमाए और इसलिए तो उसने उन लोगों को पैदा किया (और इसी वजह से तो) तुम्हारा परवरदिगार का हुक्म क़तई पूरा होकर रहा कि हम यक़ीनन जहन्नुम को तमाम जिन्नात और आदमियों से भर देगें
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अनुवाद — हूद 117

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Tuesday, August 18, 2026

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