हूद · 115/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَاصْبِرْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ ۝١١٥
Wasbir fa innal laaha laa yudee`u ajral muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र करो क्योंकि ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَاصْبِرْ: धैर्य रखें, सब्र करें।
  • لَا يُضِيعُ: बर्बाद नहीं करता, अकारण नहीं करता।
  • أَجْرَ: बदला, प्रतिफल।
  • الْمُحْسِنِينَ: नेकी करने वाले, भलाई करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप धैर्य और सब्र को अपनाएँ — चाहे वह नमाज़ और इबादत पर स्थिर रहने के लिए हो, चाहे अपनी क़ौम के मुशरिकों की ओर से मिलने वाली तकलीफ़ों और अज़िय्यतों को सहने के लिए हो, और चाहे उन सारी बातों पर अमल करने के लिए हो जिनका आपको आदेश दिया गया है। साथ ही, उन कामों से बचने के लिए भी सब्र ज़रूरी है जिनसे रोका गया है, जैसे ज़ुल्म करने वालों की तरफ़ झुकाव या उनके साथ मिलकर चलना। यह सब्र इसलिए है क्योंकि अल्लाह तआला नेकी करने वालों का अज्र (प्रतिफल) कभी बर्बाद नहीं करता। वह उनके अच्छे कर्मों को क़बूल करता है और उन्हें उनके सबसे अच्छे कामों के बदले में पूरा-पूरा बदला देता है। उसकी दृष्टि में किसी भी नेक काम की कोई छोटी सी भी क़ीमत अकारण नहीं जाती।

फ़ायदे (सीख):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सब्र और धैर्य हर हाल में ज़रूरी है — चाहे इबादत में मुशिबत आए, चाहे लोगों की तरफ़ से तकलीफ़ मिले, या गुनाह से बचने में दिक्कत हो।
  2. अल्लाह का वादा है कि वह नेकी करने वालों का अज्र कभी ज़ाया नहीं करता। यह हमें भलाई के कामों पर स्थिर रहने की तरग़ीब देता है, चाहे फ़ौरन नतीजा न दिखे।
  3. इस आयत से हमें यह उम्मीद मिलती है कि अल्लाह की रहमत और इन्साफ़ हमारे हर अच्छे काम को देखता है और उसका हक़ देगा — भले ही दुनिया में लोग उसे न पहचानें।
  4. यहाँ "मुहसिनीन" (नेकी करने वालों) का ज़िक्र बताता है कि सब्र के साथ अच्छे कर्मों का होना ज़रूरी है — सिर्फ़ सब्र ही काफ़ी नहीं, बल्कि सब्र के साथ अमल भी होना चाहिए।
  5. यह आयत हमें तसल्ली देती है कि अल्लाह के दीन पर चलने में जो मुश्किलें आती हैं, वह उन्हें बेकार नहीं जाने देगा, बल्कि उनका बेहतरीन बदला देगा।


📜 आयत 113-117 — हूद

113وَلَا تَرْكَنُوا إِلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِيَاءَ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ
और (मुसलमानों) जिन लोगों ने (हमारी नाफरमानी करके) अपने ऊपर ज़ुल्म किया है उनकी तरफ माएल (झुकना) न होना और वरना तुम तक भी (दोज़ख़) की आग आ लपटेगी और ख़ुदा के सिवा और लोग तुम्हारे सरपरस्त भी नहीं हैं फिर तुम्हारी मदद कोई भी नहीं करेगा
114وَأَقِمِ الصَّلَاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِّنَ اللَّيْلِ ۚ إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ ۚ ذَٰلِكَ ذِكْرَىٰ لِلذَّاكِرِينَ
और (ऐ रसूल) दिन के दोनो किनारे और कुछ रात गए नमाज़ पढ़ा करो (क्योंकि) नेकियाँ यक़ीनन गुनाहों को दूर कर देती हैं और (हमारी) याद करने वालो के लिए ये (बातें) नसीहत व इबरत हैं
115وَاصْبِرْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ
और (ऐ रसूल) तुम सब्र करो क्योंकि ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता
116فَلَوْلَا كَانَ مِنَ الْقُرُونِ مِن قَبْلِكُمْ أُولُو بَقِيَّةٍ يَنْهَوْنَ عَنِ الْفَسَادِ فِي الْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًا مِّمَّنْ أَنجَيْنَا مِنْهُمْ ۗ وَاتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مَا أُتْرِفُوا فِيهِ وَكَانُوا مُجْرِمِينَ
फिर जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनमें कुछ लोग ऐसे अक़ल वाले क्यों न हुए जो (लोगों को) रुए ज़मीन पर फसाद फैलाने से रोका करते (ऐसे लोग थे तो) मगर बहुत थोड़े से और ये उन्हीं लोगों से थे जिनको हमने अज़ाब से बचा लिया और जिन लोगों ने नाफरमानी की थी वह उन्हीं (लज्ज़तों) के पीछे पड़े रहे और जो उन्हें दी गई थी और ये लोग मुजरिम थे ही
117وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرَىٰ بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ
और तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता और वहाँ के लोग नेक चलन हों
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अनुवाद — हूद 115

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Tuesday, August 18, 2026

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