بَقِيَّتُ اللَّهِ: अल्लाह की ओर से बचा हुआ (हलाल कमाई)।
خَيْرٌ: बेहतर, अधिक लाभदायक।
مُؤْمِنِينَ: सच्चे ईमान वाले।
بِحَفِيظٍ: निगरानी करने वाला, रक्षक (यहाँ अर्थ: तुम्हारे कर्मों का हिसाब रखने वाला)।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह के नबी शुएब (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को नाप-तौल में कमी करने और लोगों का हक़ मारने से रोका। इस आयत में वे उन्हें समझाते हैं कि जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें हलाल रूप से दिया है और उसमें से जो कुछ तुम्हारे पास बचता है—बशर्ते तुम नाप-तौल में इंसाफ़ करो और लोगों के हक़ पूरे दो—वह बचा हुआ हलाल माल उस माल से कहीं बेहतर है जो तुम नाप-तौल में कमी करके या ज़मीन में फ़साद फैलाकर हासिल करते हो। यह बेहतरी इसलिए है क्योंकि हलाल कमाई में बरकत होती है और वह आख़िरत में भी काम आएगी, जबकि हराम कमाई न तो दुनिया में सुकून देती है और न आख़िरत में। यह नसीहत उन लोगों के लिए है जो सच्चे दिल से अल्लाह पर ईमान रखते हैं, क्योंकि ईमान ही वह चीज़ है जो इंसान को अल्लाह के हुक्म पर चलने और हलाल-हराम کی تمیز کرنے کی توفیق देता है।
इसके बाद नबी शुएब (अलैहिस्सलाम) फ़रमाते हैं: "मैं तुम्हारे ऊपर कोई निगरानी करने वाला नहीं हूँ जो तुम्हारे हर काम को गिनता रहे और तुम्हें ज़बरदस्ती नेकी पर मजबूर करे। मेरा काम सिर्फ़ अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना है। हिसाब लेने वाला तो अल्लाह है, जो हर छोटे-बड़े काम को जानता है और उसका हिसाब रखता है।"
फ़ायदे (सबक):
हलाल कमाई में बरकत होती है, भले ही वह कम हो, जबकि हराम कमाई में बरकत नहीं होती, भले ही वह ज़्यादा दिखे।
ईमान की पहचान यह है कि इंसान अल्लाह के हुक्म को अपनी ख्वाहिशों पर तरजीह दे और हलाल-हराम का ख़याल रखे।
नबियों का काम सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना है; हिसाब लेने का अधिकार सिर्फ़ अल्लाह को है। यह हमें सिखाता है कि हमें दूसरों को नेकी की दावत देनी चाहिए, लेकिन ज़बरदस्ती या जासूसी नहीं करनी चाहिए।
जो इंसान अल्लाह पर भरोसा करके हलाल रोज़ी पर संतुष्ट रहता है, अल्लाह उसे अपनी तरफ़ से ऐसी बरकत देता है जो किसी हराम माल में नहीं होती।
यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की कमाई से बढ़कर आख़िरत की कमाई है, और सच्चा मुनाफ़ा वही है जो अल्लाह की रज़ा के साथ हो।
और हमने मदयन वालों के पास उनके भाई शुएब को पैग़म्बर बना कर भेजा उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा की इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं और नाप और तौल में कोई कमी न किया करो मै तो तुम को आसूदगी (ख़ुशहाली) में देख रहा हूँ (फिर घटाने की क्या ज़रुरत है) और मै तो तुम पर उस दिन के अज़ाब से डराता हूँ जो (सबको) घेर लेगा
वह लोग कहने लगे ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिश हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो
शुएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर ख़िलाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ
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