यूसुफ · 105/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَكَأَيِّن مِّنْ آيَةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ ۝١٠٥
Wa ka ayyim min Aayatin fis samaawaati wal ardi yamurroona `alaihaa wa hum `anhaa mu`ridoon
📖 हिंदी अर्थ
और आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की क़ुदरत की) कितनी निशानियाँ हैं जिन पर ये लोग (दिन रात) ग़ुज़ारा करते हैं और उससे मुँह फेरे रहते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَكَأَيِّنْ مِنْ آيَةٍ: कितनी ही निशानियाँ और प्रमाण।
  • يَمُرُّونَ عَلَيْهَا: वे उनके पास से गुज़रते हैं और उन्हें देखते हैं।
  • مُعْرِضُونَ: उनसे मुँह मोड़ने वाले, ध्यान न देने वाले।

तफ़सीर:

आसमानों और ज़मीन में अल्लाह तआला की वहदानियत (एकता) और क़ुदरत पर दलालत करने वाली कितनी ही निशानियाँ बिखरी हुई हैं — जैसे सूरज, चाँद, सितारे, पहाड़, दरख़्त, समुद्र और बेशुमार मख़लूक़ात। ये सारी चीज़ें अपनी रचना और निज़ाम से अल्लाह के वजूद, उसके इल्म और उसकी तदबीर की गवाही देती हैं। इंसान इन निशानियों के बीच रहता है, दिन-रात इन्हें देखता है, इनके पास से गुज़रता है, लेकिन अफ़सोस कि वह इन पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र नहीं करता, इनसे सबक़ नहीं लेता और इन्हें अपनी आँखों से देखकर भी इनसे आँखें बंद किए रहता है। वह इन्हें महज़ बेजान चीज़ें समझता है, जबकि ये उसे उसके रब की तरफ़ बुला रही हैं। वह इनसे इ'राज़ करता है और अपनी ग़फ़लत में डूबा रहता है, न तो इन पर सोचता है और न ही इनसे कोई नसीहत हासिल करता है।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान की मज़बूती के लिए किताब पढ़ने के साथ-साथ कायनात (ब्रह्मांड) की निशानियों पर ग़ौर करना भी बेहद ज़रूरी है। जो शख्स जितना ज़्यादा अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों पर सोचेगा, उसका ईमान उतना ही पुख्ता होगा।
  2. अल्लाह की निशानियाँ हर जगह मौजूद हैं, लेकिन फ़ायदा सिर्फ़ उन्हीं को मिलता है जो इन पर दिल लगाकर ग़ौर करते हैं। आँखों से देखना काफ़ी नहीं, बल्कि दिल की आँखों से देखना असली चीज़ है।
  3. यह आयत हमें ग़ाफ़िल (लापरवाह) ज़िंदगी से बचाती है और सिखाती है कि हर पल, हर चीज़ में अल्लाह की याद और उसकी क़ुदरत का नज़ारा है। जो शख्स इस नज़रिए से ज़िंदगी गुज़ारता है, उसका दिल हमेशा अल्लाह से जुड़ा रहता है और वह कभी अकेला महसूस नहीं करता।
  4. इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हम अपने आस-पास की चीज़ों को बेकार न समझें, बल्कि हर चीज़ में अल्लाह की हिकमत और रहमत के निशान तलाश करें। यही वह रास्ता है जो इंसान को सच्ची मुहब्बत और यक़ीन की मंज़िल तक पहुँचाता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 103-107 — यूसुफ

103وَمَا أَكْثَرُ النَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِنِينَ
तुम उनके पास मौजूद न थे और कितने ही चाहो मगर बहुतेरे लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं
104وَمَا تَسْأَلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ
हालॉकि तुम उनसे (तबलीगे रिसालत का) कोई सिला नहीं मॉगते और ये (क़ुरान) तो सारे जहाँन के वास्ते नसीहत (ही नसीहत) है
105وَكَأَيِّن مِّنْ آيَةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ
और आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की क़ुदरत की) कितनी निशानियाँ हैं जिन पर ये लोग (दिन रात) ग़ुज़ारा करते हैं और उससे मुँह फेरे रहते हैं
106وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ
और अक्सर लोगों की ये हालत है कि वह ख़ुदा पर ईमान तो नहीं लाते मगर शिर्क किए जाते हैं
107أَفَأَمِنُوا أَن تَأْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِّنْ عَذَابِ اللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या ये लोग इस बात से मुतमइन हो बैठें हैं कि उन पर ख़ुदा का अज़ाब आ पड़े जो उन पर छा जाए या उन पर अचानक क़यामत ही आ जाए और उनको कुछ ख़बर भी न हो
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अनुवाद — यूसुफ 105

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Tuesday, August 18, 2026

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