यूसुफ · 106/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ ۝١٠٦
Wa maa yu`minu aksaru hum billaahi illaa wa hum mushrikoon
📖 हिंदी अर्थ
और अक्सर लोगों की ये हालत है कि वह ख़ुदा पर ईमान तो नहीं लाते मगर शिर्क किए जाते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُؤْمِنُ: ईमान लाना, स्वीकार करना, मानना।
  • أَكْثَرُهُمْ: उनमें से अधिकतर लोग।
  • مُشْرِكُونَ: शिर्क करने वाले, अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार ठहराने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की हालत बयान करती है जो अल्लाह को तो मानते हैं कि वही उनका रब और रिज़्क़ देने वाला है, लेकिन साथ ही वे उसके साथ दूसरों की इबादत भी करते हैं। अधिकतर लोग अल्लाह पर ईमान तो रखते हैं, लेकिन उनका ईमान खालिस और पूर्ण नहीं होता। वे यह मानते हुए कि अल्लाह ही सृष्टिकर्ता और प्रदाता है, फिर भी मूर्तियों और देवताओं की पूजा करते हैं, और उन्हें अल्लाह का साझीदार ठहराते हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक दावा करते हैं कि अल्लाह की कोई संतान है — यह उसकी पवित्रता के खिलाफ है। यह ईमान और शिर्क का मिश्रण है, जो उनके ईमान को अशुद्ध कर देता है। अल्लाह इन सब बातों से बहुत ऊपर और पाक है।

फ़ायदे (सीख):

  1. सच्चा ईमान वही है जो पूर्ण रूप से अल्लाह के लिए हो, बिना किसी साझीदार के। ईमान के साथ शिर्क का मिश्रण उसे बेकार कर देता है।
  2. यह आयत हमें चेतावनी देती है कि केवल अल्लाह को रब मान लेना काफी नहीं, बल्कि उसकी इबादत भी अकेले उसी की होनी चाहिए।
  3. मुसलमान को चाहिए कि वह अपने ईमान को हर प्रकार के शिर्क से पाक रखे — चाहे वह बड़ा शिर्क हो या छोटा, जैसे रिया (दिखावा) या किसी और पर भरोसा रखना।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की तौहीद (एकता) ही सच्ची नजात का रास्ता है, और यही वह पैगाम है जो सभी नबियों ने दिया।
  5. हमें अपने ईमान की जाँच करते रहना चाहिए कि कहीं हमारे अंदर भी ऐसा मिश्रण तो नहीं जो हमारे ईमान को कमजोर कर रहा है।
🎧 सुनें

📜 आयत 104-108 — यूसुफ

104وَمَا تَسْأَلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ
हालॉकि तुम उनसे (तबलीगे रिसालत का) कोई सिला नहीं मॉगते और ये (क़ुरान) तो सारे जहाँन के वास्ते नसीहत (ही नसीहत) है
105وَكَأَيِّن مِّنْ آيَةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ
और आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की क़ुदरत की) कितनी निशानियाँ हैं जिन पर ये लोग (दिन रात) ग़ुज़ारा करते हैं और उससे मुँह फेरे रहते हैं
106وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ
और अक्सर लोगों की ये हालत है कि वह ख़ुदा पर ईमान तो नहीं लाते मगर शिर्क किए जाते हैं
107أَفَأَمِنُوا أَن تَأْتِيَهُمْ غَاشِيَةٌ مِّنْ عَذَابِ اللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या ये लोग इस बात से मुतमइन हो बैठें हैं कि उन पर ख़ुदा का अज़ाब आ पड़े जो उन पर छा जाए या उन पर अचानक क़यामत ही आ जाए और उनको कुछ ख़बर भी न हो
108قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي ۖ وَسُبْحَانَ اللَّهِ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) उन से कह दो कि मेरा तरीका तो ये है कि मै (लोगों) को ख़ुदा की तरफ बुलाता हूँ मैं और मेरा पैरव (पीछे चलने वाले) (दोनों) मज़बूत दलील पर हैं और ख़ुदा (हर ऐब व नुक़स से) पाक व पाकीज़ा है और मै मुशरेकीन से नहीं हूँ
यूसुफकुरान सूची
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मक्कीRevelation
106आयत

अनुवाद — यूसुफ 106

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Tuesday, August 18, 2026

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