(ग़रज़) जब फिर ये लोग (मय याकूब के) चले और यूसुफ शहर के बाहर लेने आए तो जब ये लोग यूसुफ के पास पहुँचे तो यूसुफ ने अपने माँ बाप को अपने पास जगह दी और (उनसे) कहा कि अब इन्शा अल्लाह बड़े इत्मिनान से मिस्र में चलिए
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جب یہ (سب لوگ) یوسف کے پاس پہنچے تو یوسف نے اپنے والدین کو اپنے پاس بٹھایا اور کہا مصر میں داخل ہو جائیے خدا نے چاہا تو جمع خاطر سے رہیئے گا
آوَى: गले लगाया, अपने पास जगह दी, प्यार से अपनी ओर खींच लिया।
أَبَوَيْهِ: उसके माता-पिता (याकूब और उनकी पत्नी/चाची)।
آمِنِينَ: निडर, सुरक्षित, किसी भी भय या कष्ट से मुक्त।
तफसीर (व्याख्या):
जब याकूब (अलैहिस्सलाम) और उनका पूरा परिवार मिस्र की ओर रवाना हुआ और यूसुफ (अलैहिस्सलाम) के पास पहुँचा, तो यूसुफ ने अपने माता-पिता को अपने सीने से लगाया और उन्हें अपने पास बिठाया। यह मुलाकात बरसों की जुदाई के बाद हुई थी, इसलिए यह दृश्य अत्यंत भावुक और प्रेमपूर्ण था। यूसुफ ने अपने माता-पिता और पूरे परिवार का स्वागत किया और उनसे कहा: "मिस्र में प्रवेश करो, अल्लाह की इच्छा से, पूर्ण सुरक्षा के साथ।" यहाँ "इन शा अल्लाह" (यदि अल्लाह चाहे) कहकर यूसुफ ने अल्लाह की मर्जी पर भरोसा जताया और यह भी सिखाया कि हर मामले में अल्लाह की इच्छा को आगे रखना चाहिए। उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि अब उन्हें भूख, कष्ट, या किसी भी प्रकार के भय से डरने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे अल्लाह की पनाह में हैं और यूसुफ उनके साथ हैं। यह अल्लाह की उस महान कृपा का प्रतीक था जो उसने यूसुफ और उनके परिवार को दी, जब उन्होंने सब्र और धैर्य से काम लिया था।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
माता-पिता का सम्मान और प्रेम: यूसुफ (अलैहिस्सलाम) ने अपने माता-पिता को सबसे पहले गले लगाया और उन्हें अपने पास बिठाया। यह हमें सिखाता है कि चाहे हम कितनी भी ऊँचाई पर पहुँच जाएँ, माता-पिता का सम्मान और उनके प्रति प्रेम हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
अल्लाह पर भरोसा: यूसुफ ने "इन शा अल्लाह" कहकर यह सिखाया कि हर काम में अल्लाह की इच्छा को शामिल करना चाहिए। यह एक मुसलमान की पहचान है कि वह अपने हर कदम में अल्लाह पर निर्भर रहे।
सब्र का फल: बरसों की जुदाई और कष्टों के बाद अल्लाह ने यूसुफ और उनके परिवार को ऐसी मुलाकात दी जो सुख और शांति से भरी थी। यह हमें सिखाता है कि सब्र और अल्लाह पर भरोसा रखने वालों का अंजाम हमेशा अच्छा होता है।
सुरक्षा और शांति की दुआ: यूसुफ ने अपने परिवार के लिए सुरक्षा और शांति की दुआ की। यह हमें सिखाता है कि अपने परिवार और प्रियजनों के लिए दुआ करना और उन्हें अल्लाह की पनाह में सौंपना चाहिए।
परिवार का महत्व: इस्लाम में परिवार को बहुत अहमियत दी गई है। यूसुफ ने अपने पूरे परिवार को मिस्र में बुलाकर उन्हें एकजुट किया, जो दिखाता है कि परिवार के बंधनों को मजबूत रखना चाहिए।
(ग़रज़) जब फिर ये लोग (मय याकूब के) चले और यूसुफ शहर के बाहर लेने आए तो जब ये लोग यूसुफ के पास पहुँचे तो यूसुफ ने अपने माँ बाप को अपने पास जगह दी और (उनसे) कहा कि अब इन्शा अल्लाह बड़े इत्मिनान से मिस्र में चलिए
(ग़रज़) जब फिर ये लोग (मय याकूब के) चले और यूसुफ शहर के बाहर लेने आए तो जब ये लोग यूसुफ के पास पहुँचे तो यूसुफ ने अपने माँ बाप को अपने पास जगह दी और (उनसे) कहा कि अब इन्शा अल्लाह बड़े इत्मिनान से मिस्र में चलिए
(ग़रज़) पहुँचकर यूसुफ ने अपने माँ बाप को तख्त पर बिठाया और सब के सब यूसुफ की ताज़ीम के वास्ते उनके सामने सजदे में गिर पड़े (उस वक्त) यूसुफ ने कहा ऐ अब्बा ये ताबीर है मेरे उस पहले ख्वाब की कि मेरे परवरदिगार ने उसे सच कर दिखाया बेशक उसने मेरे साथ एहसान किया जब उसने मुझे क़ैद ख़ाने से निकाला और बावजूद कि मुझ में और मेरे भाईयों में शैतान ने फसाद डाल दिया था उसके बाद भी आप लोगों को गाँव से (शहर में) ले आया (और मुझसे मिला दिया) बेशक मेरा परवरदिगार जो कुछ करता है उसकी तद्बीर खूब जानता है बेशक वह बड़ा वाकिफकार हकीम है
(उसके बाद यूसुफ ने दुआ की ऐ परवरदिगार तूने मुझे मुल्क भी अता फरमाया और मुझे ख्वाब की बातों की ताबीर भी सिखाई ऐ आसमान और ज़मीन के पैदा करने वाले तू ही मेरा मालिक सरपरस्त है दुनिया में भी और आख़िरत में भी तू मुझे (दुनिया से) मुसलमान उठाये और मुझे नेको कारों में शामिल फरमा
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