अर-राद · 19/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
۞ أَفَمَن يَعْلَمُ أَنَّمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ الْحَقُّ كَمَنْ هُوَ أَعْمَىٰ ۚ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ ۝١٩
Afamai ya`lamu annamaaa unzila ilaika mir Rabbikal haqqu kaman huwa a`maa; innamaa yatazakkaru ulul albaab
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) भला वह शख़्श जो ये जानता है कि जो कुछ तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हुआ है बिल्कुल ठीक है कभी उस शख़्श के बराबर हो सकता है जो मुत्तलिक़ (पूरा) अंधा है (हरगिज़ नहीं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَعْمَىٰ (अंधा): यहाँ इसका अर्थ है हृदय का अंधा, अर्थात जो सत्य को देखने और समझने की क्षमता से वंचित हो।
  • يَتَذَكَّرُ (शिक्षा ग्रहण करना): ध्यान से सोचना, सीख लेना और नसीहत पकड़ना।
  • أُولُو الْأَلْبَابِ (बुद्धिमान लोग): वे लोग जिनके पास सही समझ और खुला दिमाग हो, जो सत्य को स्वीकार करने की क्षमता रखते हों।

आयत की व्याख्या:

यह आयत एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है: क्या वह व्यक्ति जो जानता है कि आप (हे पैगंबर) पर जो कुछ उतारा गया है, वह आपके रब की ओर से सत्य है, और जो उस पर ईमान लाता है, उस व्यक्ति के समान हो सकता है जो सत्य से अंधा है और उसे स्वीकार नहीं करता? बिल्कुल नहीं! दोनों कभी बराबर नहीं हो सकते। जो सत्य को जानता है और उस पर चलता है, वह ज्ञान और मार्गदर्शन की रोशनी में होता है, जबकि दूसरा अज्ञान और गुमराही के अंधेरे में भटकता है।

फिर अल्लाह तआला बताता है कि इस सत्य से शिक्षा और नसीहत केवल वही लोग ग्रहण करते हैं जिनके पास सही अक्ल और समझ होती है। वे सोचते-विचारते हैं, सत्य को पहचानते हैं और उसके अनुसार अपने जीवन को ढालते हैं। यही लोग हैं जो अल्लाह के साथ किए गए वादे को निभाते हैं और उसे तोड़ते नहीं।

आयत से मिलने वाली शिक्षाएँ:

  1. सत्य का ज्ञान होना और उस पर ईमान लाना ही सबसे बड़ी नेमत है, और यही इंसान को अंधों से अलग करता है।
  2. अल्लाह ने इंसान को अक्ल दी है ताकि वह सत्य को पहचाने और उस पर चले — यही अक्ल का सही उपयोग है।
  3. जो लोग अपनी अक्ल का इस्तेमाल करके सत्य को स्वीकार करते हैं, वे अल्लाह के यहाँ उच्च दर्जे के हकदार हैं।
  4. यह आयत हमें प्रोत्साहित करती है कि हम कुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें, क्योंकि यही सफलता का रास्ता है।


📜 आयत 17-21 — अर-राद

17أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَالَتْ أَوْدِيَةٌ بِقَدَرِهَا فَاحْتَمَلَ السَّيْلُ زَبَدًا رَّابِيًا ۚ وَمِمَّا يُوقِدُونَ عَلَيْهِ فِي النَّارِ ابْتِغَاءَ حِلْيَةٍ أَوْ مَتَاعٍ زَبَدٌ مِّثْلُهُ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْحَقَّ وَالْبَاطِلَ ۚ فَأَمَّا الزَّبَدُ فَيَذْهَبُ جُفَاءً ۖ وَأَمَّا مَا يَنفَعُ النَّاسَ فَيَمْكُثُ فِي الْأَرْضِ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ
उसी ने आसमान से पानी बरसाया फिर अपने अपने अन्दाज़े से नाले बह निकले फिर पानी के रेले पर (जोश खाकर) फूला हुआ झाग (फेन) आ गया और उस चीज़ (धातु) से भी जिसे ये लोग ज़ेवर या कोई असबाब बनाने की ग़रज़ से आग में तपाते हैं इसी तरह फेन आ जाता है (फिर अलग हो जाता है) युं ख़ुदा हक़ व बातिल की मसले बयान फरमाता है (कि पानी हक़ की मिसाल और फेन बातिल की) ग़रज़ फेन तो खुश्क होकर ग़ायब हो जाता है जिससे लोगों को नफा पहुँचता है (पानी) वह ज़मीन में ठहरा रहता है युं ख़ुदा (लोगों के समझाने के वास्ते) मसले बयान फरमाता है
18لِلَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَالَّذِينَ لَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُ لَوْ أَنَّ لَهُم مَّا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لَافْتَدَوْا بِهِ ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ سُوءُ الْحِسَابِ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَبِئْسَ الْمِهَادُ
जिन लोगों ने अपने परवरदिगार का कहना माना उनके लिए बहुत बेहतरी है और जिन लोगों ने उसका कहा न माना (क़यामत में उनकी ये हालत होगी) कि अगर उन्हें रुए ज़मीन के सब ख़ज़ाने बल्कि उसके साथ इतना और मिल जाए तो ये लोग अपनी नजात के बदले उसको (ये खुशी) दे डालें (मगर फिर भी कोई फायदा नहीं) यही लोग हैं जिनसे बुरी तरह हिसाब लिया जाएगा और आख़िर उन का ठिकाना जहन्नुम है और वह क्या बुरी जगह है
19۞ أَفَمَن يَعْلَمُ أَنَّمَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ الْحَقُّ كَمَنْ هُوَ أَعْمَىٰ ۚ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ
(ऐ रसूल) भला वह शख़्श जो ये जानता है कि जो कुछ तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हुआ है बिल्कुल ठीक है कभी उस शख़्श के बराबर हो सकता है जो मुत्तलिक़ (पूरा) अंधा है (हरगिज़ नहीं)
20الَّذِينَ يُوفُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَلَا يَنقُضُونَ الْمِيثَاقَ
इससे तो बस कुछ समझदार लोग ही नसीहत हासिल करते हैं वह लोग है कि ख़ुदा से जो एहद किया उसे पूरा करते हैं और अपने पैमान को नहीं तोड़ते
21وَالَّذِينَ يَصِلُونَ مَا أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَن يُوصَلَ وَيَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ وَيَخَافُونَ سُوءَ الْحِسَابِ
(ये) वह लोग हैं कि जिन (ताल्लुक़ात) के क़ायम रखने का ख़ुदा ने हुक्म दिया उन्हें क़ायम रखते हैं और अपने परवरदिगार से डरते हैं और (क़यामत के दिन) बुरी तरह हिसाब लिए जाने से ख़ौफ खाते हैं
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अनुवाद — अर-राद 19

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Tuesday, August 18, 2026

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