इब्राहीम · 25/52
अनुवाद उच्चारण — इब्राहीम
تُؤْتِي أُكُلَهَا كُلَّ حِينٍ بِإِذْنِ رَبِّهَا ۗ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ۝٢٥
Tu`teee ukulahaa kulla heenim bi izni Rabbihaa; wa yadribul laahul amsaala linnaasi la`allahum yatazak karoon
📖 हिंदी अर्थ
अपने परवरदिगार के हुक्म से हर वक्त फ़ला (फूला) रहता है और ख़ुदा लोगों के वास्ते (इसलिए) मिसालें बयान फरमाता है ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تُؤْتِي أُكُلَهَا: अपना फल देती है।
  • كُلَّ حِينٍ: हर समय, हर मौसम में।
  • بِإِذْنِ رَبِّهَا: अपने रब की आज्ञा से।
  • يَضْرِبُ اللهُ الأَمْثَالَ: अल्लाह मिसालें बयान करता है।
  • لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ: ताकि वे सीख लें और समझ जाएँ।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में ईमान की मिसाल एक अच्छे (पाकीज़ा) दरख़्त से दी है। यह दरख़्त हर मौसम में अपने रब की आज्ञा से फल देता रहता है। इसी तरह ईमान की जड़ मोमिन के दिल में मज़बूती से जमी होती है, और उसकी शाखें उसके अच्छे आमाल (कर्म), अच्छे अख़लाक़ (स्वभाव) और नेक बातें होती हैं, जो हर वक़्त अल्लाह की तरफ ऊपर उठती हैं और उसे हर समय इसका सवाब और अच्छा बदला मिलता रहता है। जैसे पेड़ को जड़, तना और ऊँची शाखों की ज़रूरत होती है, उसी तरह ईमान को दिल से तस्दीक़ (सच्चा यक़ीन), ज़ुबान से इक़रार (अभिव्यक्ति) और अंगों से अमल (कर्म) की ज़रूरत होती है।

अल्लाह तआला लोगों के सामने ये मिसालें इसलिए बयान करता है ताकि वे अक़्ल से काम लें, ग़ौर करें और इनसे सबक़ हासिल करें। मिसालों के ज़रिए समझाना इसलिए बेहतर है क्योंकि इससे बात दिल में उतर जाती है और अक़्लमंद लोगों के लिए समझना आसान हो जाता है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. ईमान की हक़ीक़त एक मज़बूत दरख़्त की तरह है — जिसकी जड़ दिल में और शाखें अच्छे आमाल में होती हैं। जिसका ईमान जितना मज़बूत होगा, उसके अच्छे कर्म उतने ही ज़्यादा और लगातार होंगे।
  2. मोमिन का अमल सिर्फ़ एक मौसम या एक वक़्त तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह हर हालत में — खुशी, ग़म, आसानी और मुश्किल में — नेक काम करता रहता है।
  3. अल्लाह तआला ने क़ुरआन में मिसालें इसलिए बयान कीं ताकि इंसान उनसे सीखे। इसलिए हमें चाहिए कि क़ुरआन की आयात पर ग़ौर करें और उनसे सबक़ लें।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हमारा रिश्ता अल्लाह से जुड़ा होना चाहिए — जैसे पेड़ को पानी और मिट्टी से, वैसे ही मोमिन को अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा से ताक़त मिलती है।


📜 आयत 23-27 — इब्राहीम

23وَأُدْخِلَ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ ۖ تَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ
और जिन लोगों ने (सदक़ दिल से) ईमान क़ुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किए वह (बेहश्त के) उन बाग़ों में दाख़िल किए जाएँगें जिनके नीचे नहरे जारी होगी और वह अपने परवरदिगार के हुक्म से हमेशा उसमें रहेगें वहाँ उन (की मुलाक़ात) का तोहफा सलाम का हो
24أَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا كَلِمَةً طَيِّبَةً كَشَجَرَةٍ طَيِّبَةٍ أَصْلُهَا ثَابِتٌ وَفَرْعُهَا فِي السَّمَاءِ
(ऐ रसूल) क्या तुमने नहीं देखा कि ख़ुदा ने अच्छी बात (मसलन कलमा तौहीद की) वैसी अच्छी मिसाल बयान की है कि (अच्छी बात) गोया एक पाकीज़ा दरख्त है कि उसकी जड़ मज़बूत है और उसकी टहनियाँ आसमान में लगी हो
25تُؤْتِي أُكُلَهَا كُلَّ حِينٍ بِإِذْنِ رَبِّهَا ۗ وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
अपने परवरदिगार के हुक्म से हर वक्त फ़ला (फूला) रहता है और ख़ुदा लोगों के वास्ते (इसलिए) मिसालें बयान फरमाता है ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें
26وَمَثَلُ كَلِمَةٍ خَبِيثَةٍ كَشَجَرَةٍ خَبِيثَةٍ اجْتُثَّتْ مِن فَوْقِ الْأَرْضِ مَا لَهَا مِن قَرَارٍ
और गन्दी बात (जैसे कलमाए शिर्क) की मिसाल गोया एक गन्दे दरख्त की सी है (जिसकी जड़ ऐसी कमज़ोर हो) कि ज़मीन के ऊपर ही से उखाड़ फेंका जाए (क्योंकि) उसको कुछ ठहराओ तो है नहीं
27يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ ۖ وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ ۚ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ
जो लोग पक्की बात (कलमा तौहीद) पर (सदक़ दिल से ईमान ला चुके उनको ख़ुदा दुनिया की ज़िन्दगी में भी साबित क़दम रखता है और आख़िरत में भी साबित क़दम रखेगा (और) उन्हें सवाल व जवाब में कोई वक्त न होगा और सरकशों को ख़ुदा गुमराही में छोड़ देता है और ख़ुदा जो चाहता है करता है
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अनुवाद — इब्राहीम 25

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Tuesday, August 18, 2026

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