इब्राहीम · 8/52
अनुवाद उच्चारण — इब्राहीम
وَقَالَ مُوسَىٰ إِن تَكْفُرُوا أَنتُمْ وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا فَإِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ حَمِيدٌ ۝٨
Wa qaala Moosaaa in takfurooo antum wa man fil ardi jamee`an fa innal laaha la Ghaniyyun Hameed
📖 हिंदी अर्थ
और मूसा ने (अपनी क़ौम से) कह दिया कि अगर और (तुम्हारे साथ) जितने रुए ज़मीन पर हैं सब के सब (मिलकर भी ख़ुदा की) नाशुक्री करो तो ख़ुदा (को ज़रा भी परवाह नहीं क्योंकि वह तो बिल्कुल) बे नियाज़ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَكْفُرُوا: कृतघ्नता करना, अविश्वास करना, इनकार करना।
  • لَغَنِيٌّ: बिल्कुल बेनियाज़, किसी का मोहताज नहीं।
  • حَمِيدٌ: हर हाल में प्रशंसा के योग्य, सभी अच्छाइयों का स्वामी।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को सम्बोधित करते हुए कहा: यदि तुम कुफ़्र करो—यानी अल्लाह की नेमतों का इनकार करो और उसकी इबादत से मुँह मोड़ो—और यदि धरती के सभी लोग भी तुम्हारे साथ मिलकर कुफ़्र कर लें, तो इससे अल्लाह को ज़रा भी नुक़्सान नहीं पहुँचेगा। क्योंकि अल्लाह तआला अपनी ज़ात में हर किसी से बेनियाज़ है; उसे किसी की इबादत की ज़रूरत नहीं, न किसी के ईमान से उसे कोई फ़ायदा पहुँचता है और न किसी के कुफ़्र से उसे कोई हानि। वह तो अपनी ज़ात और अपनी सिफ़ात की वजह से ही सभी प्रशंसाओं का हक़दार है—चाहे कोई उसकी प्रशंसा करे या न करे। उसकी हम्द (प्रशंसा) उसके लिए ज़रूरी है, क्योंकि वह हर कमाल का मालिक है। इसलिए कुफ़्र का नुक़्सान सिर्फ़ ख़ुद कुफ़्र करने वालों को ही होता है, अल्लाह को नहीं।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला किसी की इबादत का मोहताज नहीं। हमारी इबादत और ईमान हमारे अपने भले के लिए है, अल्लाह की ज़ात के लिए नहीं।
  2. अल्लाह की बेनियाज़ी और उसकी हम्द (प्रशंसा) उसकी ज़ात की सिफ़ात हैं, जो हमेशा से थीं और हमेशा रहेंगी। इससे हमें यह समझ मिलती है कि हमारा रिश्ता अल्लाह से मुहब्बत और बन्दगी का है, न कि किसी लेन-देन का।
  3. यह आयत हमें यह भी बताती है कि कुफ़्र और नाफ़रमानी का अंजाम सिर्फ़ इंसान के अपने लिए बुरा है। अल्लाह अपनी ज़ात में किसी भी हाल में कमाल पर है। इसलिए हमें अपनी ज़िन्दगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाना चाहिए, ताकि हम ख़ुद फ़ायदा उठाएँ।
  4. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की हम्द और तारीफ़ हर हाल में करनी चाहिए—चाहे हालात अच्छे हों या बुरे। क्योंकि वह हर हाल में हम्द के लायक़ है।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने ईमान और अच्छे कामों पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि हमारा ईमान अल्लाह पर कोई एहसान नहीं है। बल्कि यह अल्लाह की तौफ़ीक़ है, जो हम पर उसका फ़ज़ल है।


📜 आयत 6-10 — इब्राहीम

6وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ أَنجَاكُم مِّنْ آلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوءَ الْعَذَابِ وَيُذَبِّحُونَ أَبْنَاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَاءَكُمْ ۚ وَفِي ذَٰلِكُم بَلَاءٌ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌ
और वह (वक्त याद दिलाओ) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ख़ुदा ने जो एहसान तुम पर किए हैं उनको याद करो जब अकेले तुमको फिरऔन के लोगों (के ज़ुल्म) से नजात दी कि वह तुम को बहुत बड़े बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारा लड़कों को जबाह कर डालते थे और तुम्हारी औरतों को (अपनी ख़िदमत के वास्ते) जिन्दा रहने देते थे और इसमें तुम्हारा परवरदिगार की तरफ से (तुम्हारा सब्र की) बड़ी (सख्त) आज़माइश थी
7وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِن شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ ۖ وَلَئِن كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِي لَشَدِيدٌ
और (वह वक्त याद दिलाओ) जब तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें जता दिया कि अगर (मेरा) शुक्र करोगें तो मै यक़ीनन तुम पर (नेअमत की) ज्यादती करुँगा और अगर कहीं तुमने नाशुक्री की तो (याद रखो कि) यक़ीनन मेरा अज़ाब सख्त है
8وَقَالَ مُوسَىٰ إِن تَكْفُرُوا أَنتُمْ وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا فَإِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ حَمِيدٌ
और मूसा ने (अपनी क़ौम से) कह दिया कि अगर और (तुम्हारे साथ) जितने रुए ज़मीन पर हैं सब के सब (मिलकर भी ख़ुदा की) नाशुक्री करो तो ख़ुदा (को ज़रा भी परवाह नहीं क्योंकि वह तो बिल्कुल) बे नियाज़ है
9أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَبَأُ الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ ۛ وَالَّذِينَ مِن بَعْدِهِمْ ۛ لَا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا اللَّهُ ۚ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَرَدُّوا أَيْدِيَهُمْ فِي أَفْوَاهِهِمْ وَقَالُوا إِنَّا كَفَرْنَا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ وَإِنَّا لَفِي شَكٍّ مِّمَّا تَدْعُونَنَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ
और हम्द है क्या तुम्हारे पास उन लोगों की ख़बर नहीं पहुँची जो तुमसे पहले थे (जैसे) नूह की क़ौम और आद व समूद और (दूसरे लोग) जो उनके बाद हुए (क्योकर ख़बर होती) उनको ख़ुदा के सिवा कोई जानता ही नहीं उनके पास उनके (वक्त क़े) पैग़म्बर मौजिज़े लेकर आए (और समझाने लगे) तो उन लोगों ने उन पैग़म्बरों के हाथों को उनके मुँह पर उलटा मार दिया और कहने लगे कि जो (हुक्म लेकर) तुम ख़ुदा की तरफ से भेजे गए हो हम तो उसको नहीं मानते और जिस (दीन) की तरफ तुम हमको बुलाते हो बड़े गहरे शक़ में पड़े है
10۞ قَالَتْ رُسُلُهُمْ أَفِي اللَّهِ شَكٌّ فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ يَدْعُوكُمْ لِيَغْفِرَ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرَكُمْ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ۚ قَالُوا إِنْ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَا تُرِيدُونَ أَن تَصُدُّونَا عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُنَا فَأْتُونَا بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
(तब) उनके पैग़म्बरों ने (उनसे) कहा क्या तुम को ख़ुदा के बारे में शक़ है जो सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (और) वह तुमको अपनी तरफ बुलाता भी है तो इसलिए कि तुम्हारे गुनाह माफ कर दे और एक वक्त मुक़र्रर तक तुमको (दुनिया में चैन से) रहने दे वह लोग बोल उठे कि तुम भी बस हमारे ही से आदमी हो (अच्छा) अब समझे तुम ये चाहते हो कि जिन माबूदों की हमारे बाप दादा परसतिश करते थे तुम हमको उनसे बाज़ रखो अच्छा अगर तुम सच्चे हो तो कोई साफ खुला हुआ सरीही मौजिज़ा हमे ला दिखाओ
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Tuesday, August 18, 2026

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